19 मई 2014
संपादकीय
कांग्रेस पार्टी की बैठक आज दोपहर बाद होने जा रही है, और इस्तीफों की चर्चा से परे यह चर्चा भी अभी चल रही है कि कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य मनोनीत करने के बजाय चुनाव से जीतकर आने चाहिए। दूसरी तरफ बिहार में जदयू के भीतर खींचतान और आत्ममंथन दोनों जारी है। समाजवादी पार्टी का सिर्फ एक कुनबा ही चुनाव जीत पाया है, और आज उसके भी उम्मीदवारों की एक बैठक है। राजद में लालू यादव की बीवी और बेटी दोनों चुनाव हार चुके हैं और उसमें भी आत्ममंथन की जरूरत तो है, लेकिन उसके विधायक आज पार्टी छोड़ रहे हैं, और तकरीबन डूब चुके इस जहाज के कप्तान के पांव अभी भी जमीन पर पड़ नहीं रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी का इस चुनाव में सफाया हो गया है, लेकिन इस पार्टी में आत्ममंथन का मतलब अकेली मायावती की आत्मा के भीतर मंथन होता है, इसलिए अभी यह खबर नहीं है कि वैसा कुछ चल रहा है या नहीं। कश्मीर में तीसरी पीढ़ी की सत्ता की राजनीति जारी है, और इसमें मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सीट से भी उनके पिता फारूख अब्दुल्ला हार चुके हैं, लेकिन यहां कम से कम उमर अब्दुल्ला ने आत्ममंथन की बात ट्वीट की है, यह एक और बात है कि कश्मीर में पहली बार बज रहे भाजपा के नगाड़ों के शोर में वे कितना सोच पाएंगे।
भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव में देश की अधिकतर पार्टियों का जो हाल किया है, उसके चलते इन सबको बहुत सोचने-विचारने की जरूरत है। और सबसे अधिक जरूरत कांग्रेस पार्टी को है, जिसमें सब कुछ चले गया दिख रहा है। हम इसी हफ्ते एक से ज्यादा बार कांग्रेस की आज की जरूरतों के बारे में लिख चुके हैं, लेकिन आज बाकी पार्टियों को मिलाकर इस मुद्दे पर फिर कुछ चर्चा की गुंजाइश है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कुर्सी छोड़कर राज्य में गैरभाजपा गठबंधन की एक संभावना खड़ी की है, इस पर लालू यादव और कांग्रेस पार्टी के साथ शरद यादव क्या तालमेल बिठा सकते हैं, यह देखने की बात है। लेकिन इससे परे विपक्ष में बैठकर बहुत सी पार्टियों को यह सोचना होगा कि देश में बुरी तरह से बंटे गैर-भाजपाई वोट क्या गैरभाजपा दलों को जिंदा रहने देंगे? भाजपा ने संसद के भीतर 1984 की अपनी दो सीटों से बढ़ाकर आज अपने आपको स्पष्ट बहुमत तक पहुंचाया है और एक-एक करके कई राज्यों पर उसका जो कब्जा हुआ है, और जिस तरह से उन राज्यों में उसका वह कब्जा बरकरार है, वह देखने लायक है। उसकी बढ़ती हुई ताकत को अनदेखा करके इस चुनाव में बंगाल में ममता और तमिलनाडू में जया तो बच गए हैं, लेकिन बाकी हिन्दुस्तान भाजपा के असर में आया हुआ दिख रहा है। ये दो राज्य भी कब तक भाजपा के असर से बचे रहेंगे, इसका अंदाज लगाना मुश्किल है। ऐसे में कांग्रेस जैसे अपने आपको राष्ट्रीय दल कहने वाले को, और बहुत से क्षेत्रीय दलों को न सिर्फ अपने अस्तित्व के बारे में सोचना होगा, बल्कि उन्हें भारतीय लोकतंत्र गैरभाजपाई राजनीति के बारे में भी सोचना होगा।
आज यह बात साफ है कि अगर गैरभाजपाई, भाजपा-विरोधी दल एक-दूसरे से बिना किसी तालमेल के इसी तरह अपनी-अपनी बददिमागी में अपनी खो चुकी जागीर की हकीकत को अनदेखा करते हुए महज बयानबाजी करते रहेंगे, तो कल उनके बयान भी छपना बंद हो जाएंगे। दरअसल इस लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी और भाजपा की साफ-साफ दिख रही ताकत, और मोदी की लहर को बयानों से खारिज करते हुए गैरभाजपाई लोगों ने वोटों की गिनती के दिन अपना सब कुछ खो दिया। ऐसी नौबत में इन तमाम पार्टियों और नेताओं को बैठकर उसी तरह बात करने की जरूरत है जिस तरह अंतिम संस्कार के दौरान श्मशान में परस्पर असहमत लोगों को भी बात करने का मौका मिलता है। आज देश के सामने ऐसी नौबत है कि जैसे गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में भाजपा की राज्य सरकारें तीन-तीन बार चुनकर आ गई हैं, और लोकसभा चुनावों में भी इन राज्यों में भाजपा की ही लहर रही है, ऐसी नौबत अगर देश में मोदी सरकार की भी रहेगी, तो भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष कहां बचेगा? इसलिए सत्ता में आने के लिए न सही, विपक्ष में जिंदा रहने के लिए भी गैरभाजपाई दलों को चुनावी राजनीति से परे भी आपसी बातचीत, तालमेल, और विपक्ष की भूमिका में सहमति की जरूरत है। स्पष्ट बहुमत के साथ आई हुई एक स्थायी, और मजबूत सरकार एक नामौजूद विपक्ष की नौबत में लोकतंत्र को मजबूत नहीं कर सकती, इसलिए विपक्ष को अपना जिम्मा पूरा करना चाहिए।
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