23 मई 2014
संपादकीय
दो दिनों से फिर हिन्दुस्तानी मीडिया आम आदमी पार्टी के बदहवास नेता अरविंद केजरीवाल की बेसिर-पैर की हरकतें देख रहा है। पहले उन्होंने भाजपा अध्यक्ष रहे नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, और जब गडकरी ने इसके खिलाफ अदालत में मानहानि का आपराधिक मुकदमा चलाया, तो जमानत लेने के बजाय अरविंद केजरीवाल अपनी मर्जी से जेल गए, और उनके साथी दिल्ली के फुटपाथों पर फिर प्रदर्शन पर उतर आए। अपने आपको राजनीतिक कार्यकर्ता बताते हुए अदालत में केजरीवाल का तर्क रहा कि वे कहीं भाग नहीं जा रहे, इसलिए उन्हें निजी मुचलके पर छोडऩा चाहिए, और अदालत इस बात से सहमत नहीं थी। तब से अब तक इसे मुद्दा बनाकर आप पार्टी के बाकी नेता और उसके बड़े वकील प्रशांत भूषण मीडिया में छाए हुए हैं।
भारत में कानून का जो इंतजाम है, उसे बदले बिना अपनी मर्जी से उसके तहत मौजूद रास्तों में से एक छांटकर केजरीवाल जेल गए, और उनकी भीड़ दिल्ली के रास्तों को रोकने में लगी है। पिछले आम चुनाव में सफाया हो जाने के बाद यह केजरीवाल का आखिरी तीन शो वाला दौर दिख रहा है। आने वाले दिनों में कोई जादू हो जाए, और केजरीवाल फिर से मशहूर हो जाएं, कामयाब हो जाएं, तो एक अलग बात है, लेकिन आज तो वे खबरों में बने रहने के लिए किस्म-किस्म की बेवकूफी की बातें कर रहे हैं, और हर किस्म की अराजकता को अपना लोकतांत्रिक अधिकार साबित कर रहे हैं। दिक्कत यह है कि उनके साथ एक वक्त बड़े समझदार रहे विचारक योगेंद्र यादव जैसे लोग हैं, दूसरी तरफ प्रशांत भूषण और शांतिभूषण जैसे संविधान के जानकार वकील हैं, और इन सबसे ऊपर उनके मन में मौजूदा लोकतंत्र के लिए परले दर्जे की हिकारत भरी हुई है। वे देश के बाकी लोगों के लिए एक संविधान चाहते हैं, और अपने लिए एक अलग किस्म का खास दर्जे वाला संविधान चाहते हैं, और इसे वे आम आदमी का हक कहते हैं।
केजरीवाल के तौर-तरीके शुरू से भारी तानाशाही के रहे, और हमने समय-समय पर इसके बारे में लिखा भी। लेकिन अब वे सार्वजनिक जीवन में एक सिरदर्द बनते जा रहे हैं, और लोकतंत्र में उनको ऐसा करने का उतना ही हक है, जितना कि हक इस देश की जनता को उनके उम्मीदवारों को खारिज करने का था। केजरीवाल इस अंदाज और हड़बड़ी में आंदोलन कर रहे हैं कि मानो वे अपनी जिंदगी की आखिरी खंदक की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके मुकाबले बहुत ही छोटी सी जमीन से काम शुरू करके ममता बैनर्जी जैसे लोगों ने एक लंबी राजनीतिक जिंदगी साबित की है, और ऐसा भी नहीं कि ममता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों। सच तो यह है कि केजरीवाल जैसी नौटंकी के बिना ममता हकीकत में सादगी से जी लेती है, और अपने आपको आम कहते हुए सादगी का नाटक भी नहीं करतीं। ऐसी और भी मिसालें हैं जिनमें लोगों ने लंबे अरसे तक राजनीतिक संघर्ष किया और जनता के बीच एक विश्वसनीयता जीती। केजरीवाल के साथ दिक्कत यह रही कि अन्ना हजारे के साथ जनआंदोलन शुरू करके उन्होंने विश्वसनीयता पहले पा ली, राजनीति में बाद में पहुंचे। इसके बाद उन्होंने उस पाई हुई विश्वसनीयता को खोने के लिए मानो ओवरटाईम किया।
अब अरविंद केजरीवाल अपनी अराजक हरकतों के चलते पूरी तरह खारिज कर देने के लायक हैं। उनको आज फायदा इस बात का है कि हिन्दुस्तानी इलेक्ट्रॅानिक मीडिया खबरों के अपने अकाल के चलते किसी भी बेहूदी हरकत को खबर बनाने और दिखाने की हड़बड़ी में रहता है। ऐसे मीडिया और ऐेसे केजरीवाल बारी-बारी से एक-दूसरे की पीठ पर सवार होकर एक-दूसरे का पेट भी भरते हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और चुनावों से खारिज होने के बाद अब केजरीवाल को खबरों से भी खारिज किया जाना चाहिए। आज उनका मकसद सिर्फ हंगामा खड़ा करना है, लोकतंत्र उनको इसकी छूट तो देता है, लेकिन मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझना चाहिए, और केजरीवाल की अराजकता उजागर की जानी चाहिए।

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