इनके खिलाफ हर उसको वोट देना चाहिए, जिसने महिला से जन्म लिया हो


संपादकीय
31 मई 2014
पाकिस्तान के साथ जब कभी किसी मुद्दे पर भारत की तुलना की जाए, तो भारत में बहुत से लोगों को लगता है कि पाकिस्तान अधिक पिछड़ा हुआ, अधिक दकियानूसी, अधिक हिंसक, और अधिक कट्टरपंथी देश है। हो सकता है कि आंकड़े इस बात को सही साबित भी करें, लेकिन एक दूसरी बात यह है कि हिंदुस्तान में भी लोगों की सोच उसी तरह की है, वैसी ही, और उतनी ही हिंसक है, फर्क महज यह है कि हिंदुस्तान में कानून का राज पाकिस्तान के मुकाबले कुछ बेहतर है, इसलिए लोग अपने मन की पूरी हिंसा का इस्तेमाल नहीं कर पाते। 
चार दिन पहले ही पाकिस्तान के लाहौर में हाईकोर्ट खुलने का इंतजार करते हुए उसके बाहर खड़ी एक गर्भवती युवती को उसके घरवालों ने ईंट-पत्थर से मार-मारकर मार डाला। घरवालों ने उसकी शादी एक रिश्तेदार से तय की थी, और उसने उनकी मर्जी के खिलाफ जाकर बाहर शादी की थी। घरवालों ने इसे इज्जत की बात मानकर उसे मार डाला। अब सरहद के दूसरी तरफ, हिंदुस्तान में, एक दूसरे मजहब के हिंदू लोग हरियाणा और उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्सों में हर कुछ हफ्तों में ऐसी वारदात करते दिखते हैं। लेकिन आज इन मामलों पर लिखने की वजह थोड़ी सी अलग, और खासी एक सी है। उत्तरप्रदेश में जिस तरह दो नाबालिग दलित बहनों के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ, और उसके बाद बलात्कारियों ने उनकी हत्या करके लाशों पर पेड़ पर टांग दिया, उस पर संयुक्त राष्ट्र संघ से भी फिक्र जाहिर की गई है। हम पाकिस्तान और भारत दोनों जगहों पर लोगों की हिंसक सोच पर लिखना चाहते हैं कि उत्तरप्रदेश के इस बलात्कार में तीन भाई शामिल थे, और भाईयों को एक साथ बलात्कार करने से एक-दूसरे से कोई हिचक भी नहीं थी। इन बलात्कारियों में पुलिस भी थी, और अपने पुलिस होने की वजह से ही ऐसे जुर्म से उनको हिचक नहीं थी। सब कुछ हो जाने के बाद बलात्कारियों की ओर से मारी गई लड़कियों की मां पर मुंह बंद रखने के लिए हिंसक हमला किया गया, और पुलिस ने बचाने की कोई कोशिश नहीं की। आज जब यह पूरा मामला पूरी दुनिया को हिला रहा है, तो उत्तरप्रदेश के विदेश-शिक्षित, नौजवान, कथित समाजवादी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी हिंसक बेशर्मी के साथ एक महिला पत्रकार से कहते हैं कि वह तो अब तक सुरक्षित है, उसे तो खतरा नहीं हुआ है। 
समाजवाद के नाम पर एक कुनबे का यह राज अब अलोकतांत्रिक होने के साथ-साथ, सामंती होने के साथ-साथ, बेशर्म होने के साथ-साथ, एक मुजरिम-दर्जे का निर्वाचित राज हो गया है, और इसका कोई तुरत-इलाज भारतीय लोकतंत्र में नहीं है। प्राकृतिक न्याय तो आज यही सुझाता है कि उत्तरप्रदेश सरकार के बाप मुलायम सिंह यादव जब बलात्कारियों के साथ नरमी दिखाते हुए सार्वजनिक बयान देते हैं कि लड़कों से गलतियां हो जाती है, और जब उनके बेटे के राज में ऐसी वारदातें बढ़ती चलती हैं, पुलिस उनमें शामिल रहती हैं, तो ऐसी सरकार खत्म हो जाना चाहिए। लेकिन लोकतंत्र प्राकृतिक न्याय के मुकाबले अधिक लचीला है, और अधिक रियायत देता है। बाप-बेटे की नालायक सरकार हिंसा को बढ़ावा दे रही है, और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर, साम्प्रदायिकता-विरोध के नाम पर, समाजवाद के नाम पर, मुलायम सिंह यादव जिस तरह की अराजकता को बढ़ावा दे रहे हैं, उत्तरप्रदेश को जितना बर्बाद कर चुके हैं, लोकतांत्रिक मूल्यों के मुंह पर जिस तरह रात-दिन थूक रहे हैं, उससे यह बात जाहिर है कि उनको सत्ता पर बने रहने का कोई हक नहीं है। लेकिन लोकतंत्र के भीतर जिस तरह एक मुजरिम भी अकसर पूरी जिंदगी कानूनी छेदों में से कूद-फांदकर सजा से बचे रहता है, उसी तरह यह बाप-बेटे भी सत्ता पर बचे हुए हैं। इनकी बातें और सरकार चलाने का इनका तौर-तरीका जितनी हैवानियत का है, इनके खिलाफ अगले किसी भी चुनाव में हर उस वोटर को वोट देना चाहिए जिसने किसी महिला से जन्म लिया हो।

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