छोटी सी बात


छोटी सी बात
16 फरवरी
किसी का नाम रखने के बारे में हम पहले भी यह सलाह देते आए हैं कि उसकी कोई गलत व्याख्या न हो सके। किसी ऐतिहासिक, सामाजिक संदर्भ में उसका खराब या नकारात्मक मतलब न निकले। इसी तरह जिन नामों को लेकर अंतरराष्ट्रीय या विदेशी संभावनाएं हों, उनके अंग्रेजी हिज्जों को लेकर सावधान रहें। कोलगेट ब्रांड ने सोचा नहीं होगा कि स्पेन में उस नाम का एक मतलब होता है- ''जा, जाकर फांसी लगा ले।ÓÓ जहां लोग स्पेनिश बोलते हैं वहां मामला गड़बड़ है।
इसी तरह एक फैशन ब्रांड- ''फ्रेंच कनेक्शन यू केÓÓ, को शायद एक गाली से मिलता-जुलता बनाया गया है, लेकिन भारत में मां-बाप बच्चों के कपड़ों पर एफसीयूके लिखा देखना पसंद नहीं करेंगे।
पूरी दुनिया का ख्याल तो नहीं रखा जा सकता, लेकिन जहां तक संभावनाएं दिखें, उनका ख्याल रखना चाहिए। अब पौन सदी पहले मेरी मां का नाम 'फूलÓ रखते हुए मेरे नानी-नाना को यह पता तो नहीं होगा कि अंग्रेजी में इस शब्द के क्या मायने होंगे। और शायद इस अंग्रेजी मतलब को जाने बिना ही मां गुजर गई। आज किसी लड़की का नाम 'फूलÓ रखें, तो अंग्रेजी के चलन के कारण उसे स्कूल कॉलेज में कुछ दिक्कत हो सकती है।
कुछ लोगों के नाम बहुत निराशा वाले होते हैं। एक-दो लड़कियां ऐसी भी देखने में आईं, जिनका नाम ही निराशा है। एकांत या विकल नाम भी कोई सकारात्मक तस्वीर नहीं बनाते। मेरा निजी मानना यह है कि इसका अच्छा असर नहीं पड़ता।
कुछ लोग दूकानों के नाम ऐसे रखते हैं जिनको उस इलाके के लोग ठीक से पढ़ नहीं पाते या बोल नहीं पाते। इन्द्रधनुष के रंगों के पहले अक्षरों से बना एक नाम मेरे जैसे साधारण पढ़े-लिखे से भी पढ़ते-बोलते नहीं बनता। अंग्रेजी कम बोलने वाले इलाके में अंग्रेजी के 'जीÓ से होने वाले दो उच्चारणों 'गÓ और 'जÓ की दिक्कत को भी समझना चाहिए।

उत्तरप्रदेश और मुंबई


संपादकीय
16 फरवरी 12
उत्तरप्रदेश के विधानसभा के चुनाव में अब तब 55-60 फीसदी वोट डले हैं। इसमें भी उन सीटों पर अधिक वोट डले हैं जहां से गुंडे-बदमाश चुनाव लड़ रहे हैं या फिर जो नक्सल इलाकों की सीटें हैं। मतलब यह कि आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन वाले उत्तरप्रदेश के मतदाता अधिक वोट डाल रहे हैं। दूसरी तरफ इस वक्त मुंबई में म्युनिसिपल चुनावों के वोट डल रहे हैं, और घनी शहरी आबादी की वजह से कुछ कदमों की दूरी पर जो पोलिंग बूथ हैं वहां तक भी पहुंचने में लोग ठंडे बैठे हुए हैं। इस पल ट्विटर पर बहुत से जाने-माने लोग लिख रहे हैं कि जो लोग आज वोट डालने नहीं निकलें, वे लोग पांच बरस तक सड़क, नाली, पानी की कोई शिकायत न करें।
न सिर्फ चुनावों में वोट डालने की जागरूकता बल्कि बहुत सी दूसरी तरह की जागरूकता को लेकर हिन्दुस्तान का एक शहरी, पढ़ा-लिखा या दौलतमंद तबका, गरीबों,  गांववालों और अनपढ़ों को तरह-तरह से कोसते रहता है और हर किस्म के पिछड़ेपन के लिए उनको जवाबदेह मानता है। भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इस बात का गवाह है कि राजनीतिक चेतना, सामाजिक चेतना और सुधार का इन बातों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। शराब को बुरी चीज मानने वाले लोग अपनी इस नापसंद को पल भर के लिए अगर अलग रखने को तैयार हों, तो देश के बहुत से आदिवासी इलाकों में आदमियों के साथ-साथ औरतों को भी बराबरी से शराब पीने का हक मिला हुआ है। शराब की अच्छाई और बुराई पर चर्चा किसी दूसरी जगह हो सकती है, इस बात को कहने का हमारा मकसद यह बताना है कि शहर, संपन्नता और पढ़ाई से दूर का आदिवासी समाज किस तरह औरत-मर्द की समानता पर अधिक भरोसा रखता है। भारत के शहरी मध्यम और उच्च वर्ग में क्या महानगरों से परे इस बात की कल्पना की जा सकती है कि औरतें भी बराबरी से बैठकर पी सकें? शुद्धतावादियों को यह लग सकता है कि पीना खराब है और हम यहां पीने की वकालत कर रहे हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि औरत-मर्द के बीच का भेदभाव पीने के मुकाबले भी कहीं अधिक बुरी बात है। 
आदिवासियों के बारे में हम एक बात यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि बिना पढ़ाई-लिखाई और बिना टेलीविजन वाले दिनों में, भारत के आपातकाल के अंत में हुए आम चुनावों में आदिवासियों ने नेहरू की बेटी को खारिज कर दिया था। जब भारत का शहरी तबका आपातकाल के सारे महीनों में वक्त पर चलने लगी रेलगाडिय़ों पर मुग्ध होकर 'अनुशासन पर्वÓ मना रहा था, तब जंगलों में बसे, शहरी जुबान में कहें तो, अनपढ़ आदिवासियों ने इंदिरा-संजय को एकमुश्त खारिज कर दिया था। ऐसे आदिवासियों को आज हिंदुस्तान में उनके अपने किस्म के धर्म और ईश्वर की धारणा के साथ जीने भी नहीं दिया जा रहा और उन्हें एक शहरी-संगठित धर्म का बताने का काम चल रहा है। लेकिन यह एक अलग मुद्दा है जिस पर बात कभी और।
इसी तरह इस देश में एक यह सोच बनी हुई है कि लोग गरीबी की वजह से भ्रष्ट हो जाते हैं। कोई गरीबी की बेबसी में हो सकता है कि कोई पहला भ्रष्टाचार कर लेता हो। लेकिन इस भ्रष्टाचार की संपन्नता के बाद तो वह उतना गरीब भी नहीं रहता, और आगे के तमाम भ्रष्टाचार तो ऐसे लोग संपन्नता आ जाने के बाद भी जारी रखते हैं। दूसरी तरफ जब दूसरी-तीसरी और चौथी पीढ़ी के दौलतमंद लोग हर किस्म की बेईमानी और जालसाजी करते हुए पैसा कमाते हैं, तो वे गरीबों के लिए संपन्न तबके द्वारा सहेजकर रखी गई गालियों गलत साबित करते हैं। हमारा लंबा अनुभव यह है कि संपन्न लोग अधिक बेईमान होते हैं, वे अधिक अपराध करते हैं, वे अधिक गलत काम करते हैं, क्योंकि उनके पास इन कामों की सजा से बच निकलने के लिए पैसों की ताकत होती है। गरीब क्या खाकर ऐसे काम करने का हौसला करेगा जिससे कि बच निकलने के लिए उसके पास न तो जमानत की रकम होती, न रिश्वत होती, और न ही महंगे वकील की फीस उसके पास होती। जो इंसाफ को खरीद नहीं सकता वह जुर्म करने के पहले कई बार ठिठकता होगा।
उत्तरप्रदेश के चुनाव में नक्सली इलाकों में गांवों के मतदाता और आदिवासी मतदाता जिस बड़ी संख्या में पहुंचे हैं, वे मुंबई जैसे महानगर के मतदाताओं के मुंह पर एक तमाचे की तरह हैं जिनको मुंबई सिर्फ दूधवाले भैया की तरह जानता है। इस वक्त आ रही खबरें बताती हैं कि मुंबई में जो दौलतमंद इलाके हैं वहां किसी को वोट डालने की परवाह कम ही है। 
भारत में सामाजिक बोलचाल की जुबान में, और बहुत से गैरजिम्मेदार मीडिया में भी एक संपन्न परिवार से जुड़ी खबरों में उसे अच्छे और प्रतिष्ठित परिवार जैसे शब्दों के साथ पेश किया जाता है। मानो दौलत अच्छाई का दूसरा नाम हो और दौलत प्रतिष्ठा का प्रतीक हो। इसी तरह गंवईयां शब्द को या देहाती शब्द को कम समझदार, अनजान और पिछड़े हुए के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मेहनतकश और ईमानदार गरीब को भी कंगले और दो कौड़ी के इंसान की तरह गिना जाता है, मानो चोरी की गिन्नियों से लदे इंसान बेहतर होते हों और पसीने की कौडिय़ां कोई दाग हों।
ऐसी गाली-गलौज की जुबान इस्तेमाल करने वाले लोग मतदान के दिन अपने-आपको बेहतर तो साबित करके दिखाएं। 

छोटी सी बात


छोटी सी बात
15 फरवरी
अपने बच्चों को बचपन से ही रहमदिली, इंसाफ, और शुक्रगुजार होना सिखाएं। उनकी ऐसी खूबियां दुनिया को एक बेहतर जगह बनाएगी। (और आपके बुढ़ापे को भी... :-) )

महंगा रोए एक बार...


संपादकीय
15 फरवरी 12
देश में जगह-जगह आए दिन सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर हड़ताल पर जाते दिखते हैं। छत्तीसगढ़ में बहुत बरस हुए ऐसी नौबत नहीं आई लेकिन एक दूसरी दिक्कत इस राज्य में बहुत बड़ी यह है कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कुर्सियां खाली पड़ी हैं और लोग नौकरी के लिए मिल नहीं रहे। सरकार के पास अस्पतालों या स्वास्थ्य केंद्रों का अपना ढांचा है और उसके पास डॉक्टरों की तनख्वाह का पैसा भी है लेकिन लोग यह नौकरी करना नहीं चाह रहे। यहां पर दो अलग-अलग बातों के बारे में सोचना होगा, एक तो यह कि आज की खुली बाजार व्यवस्था में जब डॉक्टरों को निजी काम में अधिक कमाई होती है तो वे कम कमाई और अधिक जवाबदेही, खतरे वाली सरकारी नौकरी में क्यों आना चाहेंगे? दूसरी बात यह कि मेडिकल पढ़ाई इतनी लंबी और महंगी हो चुकी है कि उसके बाद कोई डॉक्टर सरकारी तनख्वाह पर काम करना आमतौर पर तब तक नहीं चाहते जब तक कि उसके साथ उनके मन में निजी प्रैक्टिस की अतिरिक्त कमाई की बात न हो या इन दिनों आम हो चली अतिरिक्त कमाई की बात न हो। आज की सरकारी व्यवस्था में जब नेताओं और बड़े अफसरों के एक हुक्म से कितना भी अच्छा सरकारी डॉक्टर पल भर में निलंबित हो सकता है तो वैसी सरकारी असुरक्षा भी बहुत से डॉक्टरों नहीं सुहाती। नतीजा यह है कि सरकार बार-बार इश्तहार निकालती है और कुर्सियां खाली की खाली रह जाती हैं।
अगर डॉक्टरों की पढ़ाई को देखें तो करीब पांच बरस के बाद मेडिकल कॉलेज से निकला डॉक्टर और एक बरस के बाद अपना काम शुरू कर पाता है। इतनी लंबी पढ़ाई बहुत महंगी भी होती है और तब तक नौजवान डॉक्टरों की भी पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ चुकी होती हैं। ऐसे में जगह-जगह डॉक्टर हड़ताल पर जाते हैं और मरीजों का बुरा हाल होता है। हर प्रदेश की ऐसी खबरें आती हैं कि किस हड़ताल के चलते कितने दर्जन मरीज मारे गए। छत्तीसगढ़ में पिछले मुख्यमंत्री अजीत जोगी तीन साल मेडिकल पढ़ाई के बाद ऐसे डॉक्टरों को तैयार करने का काम शुरू किया था जिनके बारे में यह उम्मीद की जा रही थी कि वे शायद गांव में जाकर काम कर सके क्योंकि बारहवीं के बाद वे तीन-चार बरस में ही कुछ आसान किस्म के इलाज की इजाजत पा लेंगे जिनसे गांवों की या गरीबों की आए दिन की इलाज की जरूरत पूरी हो जाती है। लेकिन जमे हुए डॉक्टरों के संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट तक जाकर इसका पीछा किया और तीन साल के डॉक्टरों की योजना को खारिज करवा दिया। आज कई बरस बाद केंद्र सरकार पूरे देश में उस तरह की योजना बनाकर लागू करने जा रही है। ये उम्मीद की जा सकती है कि उससे साधारण इलाज की इजाजत वाले डॉक्टर गरीबों के बीच कुछ बढ़ सकेंगे। 
लेकिन एक दूसरी बात जिसकी वजह आज हमने यह चर्चा यहां शुरू की है। वह है सरकारी डॉक्टरों की तनख्वाह की। सरकार को आज की बाजार व्यवस्था को देखते हुए डॉक्टरों को इतनी तनख्वाह तो देनी ही होगी कि इलाज के सरकारी ढांचे की कुर्सियां खाली न पड़ी रहें, और उस ढांचे पर सरकार का पैसा बर्बाद न होता रहे। एक डॉक्टर की कमी से अगर अस्पताल बिना काम के पड़ा हुआ है, तो डॉक्टरों की तनख्वाह को कम रखने का क्या फायदा? एक डॉक्टर आज अपनी साधारण क्षमता से जितना कमा सकता है उसे पूरी तरह अनदेखा करके सरकार कभी एक कामयाब ढांचा नहीं बना सकती। और एक के बाद एक, देश और प्रदेश की सरकारें गरीब जनता के इलाज की जिम्मेदारी से अपने-आपको पीछे हटाते जा रही है। यह सिलसिला सबसे गरीब तबके के लिए सबसे अधिक नुकसानदेह है क्योंकि वह महंगे निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकता।
हम सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों, चिकित्सकों, सांसदों और विधायकों, इन सभी के लिए अधिक तनख्वाह के हिमायती हैं क्योंकि हमारा मानना है कि दुनिया की खुले बाजार की संभावनाओं के मुकाबले बहुत पीछे रहने पर सरकारी कामकाज के लिए, या संसद या विधानसभा के लिए अच्छे और काबिल लोगों का आना नहीं बढ़ेगा और भ्रष्टाचार को कम करने की गुंजाइश भी कम रहेगी। सरकार को अधिक तनख्वाह देकर बेहतर लोगों को लाना और उन्हें ईमानदार बने रहने जितनी सहूलियतें देना चाहिए। बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं, सस्ता रोए बार-बार, महंगा रोए एक बार। जिस तरह सरकारी खरीद के सामान के बारे में बाजार में यह चर्चा रहती है कि उसका अधिक से अधिक घटिया होना तय है, उस तरह की बात सरकारी नौकरियों में आने वाले लोगों के बारे में नहीं होना चाहिए। अधिक तनख्वाह के साथ-साथ अगर सरकार अधिक जवाबदेही और उत्पादकता जोड़ सकती है तो महंगे लोग जनता को सस्ते ही पड़ेंगे। फिलहाल बात डॉक्टरों पर से शुरू हुई थी और देश की सभी सरकारों को बिना देर किए अच्छी तनख्वाह पर डॉक्टरों को रखना चाहिए क्योंकि यह मोलभाव का मामला नहीं है, उस गरीब जनता की सेहत का मामला है जो सत्ता पर बैठे लोगों की तरह महंगे अस्पतालों में नहीं जा पाती है।

छोटी सी बात


छोटी सी बात
14 फरवरी 12
जिस देश-प्रदेश जाना हो, वहां की जुबान के कुछ शब्द इंटरनेट से आसानी से सीखे जा सकते हैं। इससे आपको बहुत आसानी हो जाती है, और फिर आपके बारे में वहां के लोग क्या बात करते हैं, वह भी आपको कुछ हद तक समझ आ सकती है।

चुनाव प्रचार में प्रियंका के पति और बच्चे


संपादकीय
14 फरवरी 2012
कांग्रेस के बड़बोले नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा है कि नेहरू गांधी परिवार कांग्रेस की सबसे बड़ी सम्पत्ति है, और इस खजाने के सबसे ताजा रत्न उत्तप्रदेश में हो रहे चुनाव प्रचार के दौरान अपनी मां प्रियंका गांधी के साथ चुनावी मंच पर जलवा फरोश हुए। ऐसा होते ही उत्तर प्रदेश के चुनावी मुद्दे पर्दे के पीछे चले गए, और लोग नेहरू गांधी परिवार की अगली पीढ़ी पर निहाल होना शुरू हो गए, उसकी सियासी तालीम की बातें होने लगीं। राजनीतिक पर्यवेक्षक, और ब्रांड विशेषज्ञ टीवी पर चर्चा में मशगूल हो गए कि प्रियंका ने आखिर ऐसा क्यों किया? क्या यह बीच चुनाव सर्वोच्च न्यायालय द्वारा  2- जी लाईसेंसस रद्द करने के नुकसान से पार्टी को सम्हालने के लिए किया गया, या चुनाव के समय ही नजर आने वाली प्रियंका को बरसाती मेंढक कहे जाने के बदले यह दिखाने की कोशिश थी कि छोटे बच्चों की मां बार-बार उत्तर प्रदेश नहीं आ सकती। यह वही बच्चे है, जिनकी सुरक्षा को लेकर किसी को उनके तस्वीरें खींचने नहीं दी जाती, मीडिया से कहा जाता है कि इनके स्कूल, गतिविधियों के बारे में ना छापे, क्योंकि इससे इनके सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। और आज उन्हीं की सियासी मंच पर  नुमाईश की गई  तो क्या उत्तर प्रदेश मे चुनाव जीतना कांग्रेस के लिए इतना बड़ा  मसला है कि मासूम बच्चों की सुरक्षा का खतरा भी उठ लिया गया। क्या ऐसा इसलिए किया गया कि बात राहुल गांधी की आन की हो गई है, जो पिछले कुछ बरसों से उत्तर प्रदेश  में कांग्रेस  की वापसी का जिम्मा उठाए हुए है? इतना तय है  कि इससे देश की राजनीति में कुनबा परस्ती और आगे बढ़ी। जैसे प्रियंका के कारोबारी पति रॉबर्ट वाढेरा  के उत्तर प्रदेश में  चुनाव प्रचार में कूदकर झमेला खड़ा करना काफी नहीं था। उनका राजनीति में आने का खुला संकेत देना काफी नहीं था कि लोगों को यह बताया गया कि आने वाले  समय के कांग्रेस के तरणहार अपनी सियासी परवरिश के लिए अपने स्कूल में कदम रख चुके हैं। रॉबर्ट वाढेरा न केवल अपनी मोटरसाईकिल  रैली के कारण विवाद का केंद्र बने, बल्कि उन्होंने अपने सियासी इरादे भी बहुत खुले तौर पर जाहिर करते हुए कहा-हर बात का एक वक्त होता है, अभी राहुल का वक्त है, प्रियंका का भी वक्त अएगा। इस बयान पर मीडिया ने अपनी तरफ से यह जोड़ दिया कि प्रियंका का वक्त आएगा तो राजनीति में वाढेरा का वक्त भी शुरू हो जाएगा।
जब देश में उत्तर से लेकर दक्षिण, और पूर्व से ले कर पश्चिम तक कुनबा परस्त राजनीति के नमूने देखने मिल रहे हंै तो इसके लिए अकेले कांग्रेस को कोसा नहीं जा सकता। हालांकि यह देश की सवा सौ साल पुरानी, और सबसे वजनदार पार्टियों में से एक है। लेकिन उससे क्या हुआ? राजनीतिक पार्टियों का मकसद तो चुनाव जीतना होता है, और उसके लिए अपने लोकप्रिय नेता का इस्तेमाल करने पर देश में कोई कानूनी रोक भी नहीं है लेकिन क्या इससे सभी राजनीतिक दलों को कुनबापरस्ती करने की छूट ले लेनी चाहिए और लोकतांत्रिक परम्पराओं की शर्म हया को ताक पर रख देना चाहिए? क्या देश को आजाद करने, यहां लोकतंत्र लाने के लिए कुर्बानी देने का दम भरती कांग्रेस की इस लोकतंत्र  को स्वस्थ्य, मजबूत करने के लिए इतनी ही जिम्मेदारी बनती है कि वह जैसे तैसे करके चुनाव जीत ले?  हालांकि लोकतंत्र का ठेका अकेले कांग्रेस को सम्हालने के लिए कहना उस समय सही नहीं होगा जब नाम से  समाजवादी, लेकिन असल में व्यक्ति आधारित पार्टी जैसे सपा, कहने को राष्ट्रीय लेकिन बेहद क्षेत्रीय लालू प्रसाद यादव की राजद, डीएमके, अकाली दल और यहां तक कि भाजपा जैसी सदस्य आधारित पार्टियां तक इस बात को बढ़ावा दे रही हैं। राम विलास पासवान के हीरो बेटे हो, या लालू के क्रिकेटर फरज़न्द, सबने बड़े नाटकीय अन्दाज में अपने-अपने पिताओं के पक्ष में चुनाव प्रचार भी किया है। नेताओं के बच्चे  अगर सियासत में आना चाहें, तो दूसरे किसी की भी तरह उन्हें भी यह हक मिलना चाहिए। इसमें ऐतराज़ करने जैसी कोई बात भी नहीं है,  लेकिन उन्हें दूसरे किसी भी की तरह मौका मिलना चाहिए। जन्म सिद्ध अधिकार या विशेष अधिकार के रूप में चुनावी टिकिट और पार्टी के पद उनके आगे चांदी की तश्तरी में पेश ना किए जाए।  प्रियंका का चुनावी सभा में बच्चे ले कर जाना, देश के प्रथम परिवार कहलाते गांधी नेहरू परिवार के जमाई राजा की, अजय देवगन के अंदाज में मोटरसाईकिल पर सवार होकर सियासत में एंट्री, और "पहले राहुल फिर प्रियंका और फिर मैं" जैसे उनके सियासत में आने की बेताबी दिखाते बयान, मुंह का स्वाद बदमजा करने वाले हैं। इन पर कानूनी ऐतराज़ ना भी उठा पाए, तो भी लोकतांत्रिक परम्पराओं के लिए यह सब सख्त ऐतराज़ के लायक है, जिन्हें प्रजातंत्र का पर्व कहलाते चुनावों के दौर में मुगलवंशों की तर्ज पर कुनबा परस्ती का यह दिखावा, खास तौर पर नेहरू गांधी परिवार की तरफ से शर्मनाक है, हमारे 64 साल पुराने प्रजातंत्र का सिर झुकाने वाला है।
दुख की बात यह है कि प्रजातंत्र की उम्र के साथ कुनबापरस्ती का यह रोग बढ़ता जा रहा है।  नेहरू गांधी परिवार की तर्ज पर देश भर में  परिवार  खड़े हो रहे हंै। डीएमके में करुणानिधी के बच्चों के बीच उत्तराधिकार की लड़ाई, तो मारन परिवार की ज़ोर आजमाईश से लेकर पंजाब में चौधरी चरण सिंह, उनके बेटे अजीत सिंह और उनके भी बेटे जयंत का सियासत में आना, पंजाब में बादल परिवार की पूरे कुनबे के साथ सियासत में मौजूदगी, और कैप्टेन अमरेन्द्र सिन्ह के शाही घराने में वंशवाद को आगे बढ़ाने के लिए ही हुआ मनमुटाव, हरियाणा में भजनलाल और हुड्डा परिवार, तो उत्तरप्रदेश और मध्य प्रदेश के पुराने राजघरानों के फरजन्दों को आगे बढ़ाने के लिए गांवों में आयोजित होते खेल समारोह, दून स्कूल में पढ़ते शाही बच्चों की खुली जीपों में रैलियां,और गांव भर में पोस्टर- देश के राजनीतिज्ञ बरसों से जनता को यही सब परोस रहे हैं और उसकी सोच को इसी दिशा में धकिया रहे हैं।
अभी कल ही हमने सियासी समझ के सिलसिले  में पश्चिम बंगाल की राजनीति की मिसाल दी थी, कि किस तरह वहां राजनीतिक लिहाज से परिपक्व दल की सरकार होने का असर वहां के विपक्षी दलों से लेकर मतदाताओं तक, सब पर नजर आता है। देश में जब 70 फीसदी लोगों से  भी  ज्यादा के गरीब होने की बात की जाती है, जनता जब खुद को जैसे-तैसे टिकाए रखने के लिए हर मोर्चे पर पर जद्दोजहद को मजबूर है, ऐसे में सियासी बारीकियों पर गौर करने की अपेक्षा उससे नहीं की जा सकती। लेकिन पहले उसे इस हालत में पहुंचा कर, और फिर इस बात का फायदा उठाकर राजनीतिक दल प्रजातंत्र के रास्ते देश में वंशवाद वापस ले आए, यह भारतीय प्रजातंत्र की सबसे बड़ी हार होगी। देश के प्रथम परिवार के सदस्यों का पिछले दिनों का बर्ताव देखकर यह कहने में  हमें कुछ गलत नहीं लगता कि जिसके कंधों पर देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी टिकी है, वह स्वस्थ्य दलगत राजनीति की जड़ें मजबूत करने की अपनी जिम्मेदारियों से बुरी तरह बचकर चुनाव जीतने के छोटे रास्ते ढूंढ रहा है।  .  राहुल गांधी एक तरफ कांग्रेस  में संगठन  चुनाव कर आंतरिक प्रजातंत्र मजबूत करने की बात करते हैं, दूसरी तरफ पार्टी बरस दर बरस सोनिया गांधी को पार्टी का अध्यक्ष चुनते जाती है। कानूनी तौर पर भले इसमें कोई नुक्स ना निकाला जा सके, प्रजातांत्रिक परम्पराओं के जो सपने  गांधी नेहरू थे वह  ऐसी हरकतों से टूट चुके हैं। ऐसे में  जमीनी स्तर पर पार्टी के  लिए खून पसीना बहाने वाले, उसे अपने कंधो पर  ढोने वाले कार्यकर्ताओं का भी मनोबल टूटता है लोकतंत्र की जड़ें यहीं से खोखली होते चलती हैं।