संपादकीय
14 फरवरी 2012

कांग्रेस के बड़बोले नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा है कि नेहरू गांधी परिवार कांग्रेस की सबसे बड़ी सम्पत्ति है, और इस खजाने के सबसे ताजा रत्न उत्तप्रदेश में हो रहे चुनाव प्रचार के दौरान अपनी मां प्रियंका गांधी के साथ चुनावी मंच पर जलवा फरोश हुए। ऐसा होते ही उत्तर प्रदेश के चुनावी मुद्दे पर्दे के पीछे चले गए, और लोग नेहरू गांधी परिवार की अगली पीढ़ी पर निहाल होना शुरू हो गए, उसकी सियासी तालीम की बातें होने लगीं। राजनीतिक पर्यवेक्षक, और ब्रांड विशेषज्ञ टीवी पर चर्चा में मशगूल हो गए कि प्रियंका ने आखिर ऐसा क्यों किया? क्या यह बीच चुनाव सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2- जी लाईसेंसस रद्द करने के नुकसान से पार्टी को सम्हालने के लिए किया गया, या चुनाव के समय ही नजर आने वाली प्रियंका को बरसाती मेंढक कहे जाने के बदले यह दिखाने की कोशिश थी कि छोटे बच्चों की मां बार-बार उत्तर प्रदेश नहीं आ सकती। यह वही बच्चे है, जिनकी सुरक्षा को लेकर किसी को उनके तस्वीरें खींचने नहीं दी जाती, मीडिया से कहा जाता है कि इनके स्कूल, गतिविधियों के बारे में ना छापे, क्योंकि इससे इनके सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। और आज उन्हीं की सियासी मंच पर नुमाईश की गई तो क्या उत्तर प्रदेश मे चुनाव जीतना कांग्रेस के लिए इतना बड़ा मसला है कि मासूम बच्चों की सुरक्षा का खतरा भी उठ लिया गया। क्या ऐसा इसलिए किया गया कि बात राहुल गांधी की आन की हो गई है, जो पिछले कुछ बरसों से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की वापसी का जिम्मा उठाए हुए है? इतना तय है कि इससे देश की राजनीति में कुनबा परस्ती और आगे बढ़ी। जैसे प्रियंका के कारोबारी पति रॉबर्ट वाढेरा के उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार में कूदकर झमेला खड़ा करना काफी नहीं था। उनका राजनीति में आने का खुला संकेत देना काफी नहीं था कि लोगों को यह बताया गया कि आने वाले समय के कांग्रेस के तरणहार अपनी सियासी परवरिश के लिए अपने स्कूल में कदम रख चुके हैं। रॉबर्ट वाढेरा न केवल अपनी मोटरसाईकिल रैली के कारण विवाद का केंद्र बने, बल्कि उन्होंने अपने सियासी इरादे भी बहुत खुले तौर पर जाहिर करते हुए कहा-हर बात का एक वक्त होता है, अभी राहुल का वक्त है, प्रियंका का भी वक्त अएगा। इस बयान पर मीडिया ने अपनी तरफ से यह जोड़ दिया कि प्रियंका का वक्त आएगा तो राजनीति में वाढेरा का वक्त भी शुरू हो जाएगा।
जब देश में उत्तर से लेकर दक्षिण, और पूर्व से ले कर पश्चिम तक कुनबा परस्त राजनीति के नमूने देखने मिल रहे हंै तो इसके लिए अकेले कांग्रेस को कोसा नहीं जा सकता। हालांकि यह देश की सवा सौ साल पुरानी, और सबसे वजनदार पार्टियों में से एक है। लेकिन उससे क्या हुआ? राजनीतिक पार्टियों का मकसद तो चुनाव जीतना होता है, और उसके लिए अपने लोकप्रिय नेता का इस्तेमाल करने पर देश में कोई कानूनी रोक भी नहीं है लेकिन क्या इससे सभी राजनीतिक दलों को कुनबापरस्ती करने की छूट ले लेनी चाहिए और लोकतांत्रिक परम्पराओं की शर्म हया को ताक पर रख देना चाहिए? क्या देश को आजाद करने, यहां लोकतंत्र लाने के लिए कुर्बानी देने का दम भरती कांग्रेस की इस लोकतंत्र को स्वस्थ्य, मजबूत करने के लिए इतनी ही जिम्मेदारी बनती है कि वह जैसे तैसे करके चुनाव जीत ले? हालांकि लोकतंत्र का ठेका अकेले कांग्रेस को सम्हालने के लिए कहना उस समय सही नहीं होगा जब नाम से समाजवादी, लेकिन असल में व्यक्ति आधारित पार्टी जैसे सपा, कहने को राष्ट्रीय लेकिन बेहद क्षेत्रीय लालू प्रसाद यादव की राजद, डीएमके, अकाली दल और यहां तक कि भाजपा जैसी सदस्य आधारित पार्टियां तक इस बात को बढ़ावा दे रही हैं। राम विलास पासवान के हीरो बेटे हो, या लालू के क्रिकेटर फरज़न्द, सबने बड़े नाटकीय अन्दाज में अपने-अपने पिताओं के पक्ष में चुनाव प्रचार भी किया है। नेताओं के बच्चे अगर सियासत में आना चाहें, तो दूसरे किसी की भी तरह उन्हें भी यह हक मिलना चाहिए। इसमें ऐतराज़ करने जैसी कोई बात भी नहीं है, लेकिन उन्हें दूसरे किसी भी की तरह मौका मिलना चाहिए। जन्म सिद्ध अधिकार या विशेष अधिकार के रूप में चुनावी टिकिट और पार्टी के पद उनके आगे चांदी की तश्तरी में पेश ना किए जाए। प्रियंका का चुनावी सभा में बच्चे ले कर जाना, देश के प्रथम परिवार कहलाते गांधी नेहरू परिवार के जमाई राजा की, अजय देवगन के अंदाज में मोटरसाईकिल पर सवार होकर सियासत में एंट्री, और "पहले राहुल फिर प्रियंका और फिर मैं" जैसे उनके सियासत में आने की बेताबी दिखाते बयान, मुंह का स्वाद बदमजा करने वाले हैं। इन पर कानूनी ऐतराज़ ना भी उठा पाए, तो भी लोकतांत्रिक परम्पराओं के लिए यह सब सख्त ऐतराज़ के लायक है, जिन्हें प्रजातंत्र का पर्व कहलाते चुनावों के दौर में मुगलवंशों की तर्ज पर कुनबा परस्ती का यह दिखावा, खास तौर पर नेहरू गांधी परिवार की तरफ से शर्मनाक है, हमारे 64 साल पुराने प्रजातंत्र का सिर झुकाने वाला है।
दुख की बात यह है कि प्रजातंत्र की उम्र के साथ कुनबापरस्ती का यह रोग बढ़ता जा रहा है। नेहरू गांधी परिवार की तर्ज पर देश भर में परिवार खड़े हो रहे हंै। डीएमके में करुणानिधी के बच्चों के बीच उत्तराधिकार की लड़ाई, तो मारन परिवार की ज़ोर आजमाईश से लेकर पंजाब में चौधरी चरण सिंह, उनके बेटे अजीत सिंह और उनके भी बेटे जयंत का सियासत में आना, पंजाब में बादल परिवार की पूरे कुनबे के साथ सियासत में मौजूदगी, और कैप्टेन अमरेन्द्र सिन्ह के शाही घराने में वंशवाद को आगे बढ़ाने के लिए ही हुआ मनमुटाव, हरियाणा में भजनलाल और हुड्डा परिवार, तो उत्तरप्रदेश और मध्य प्रदेश के पुराने राजघरानों के फरजन्दों को आगे बढ़ाने के लिए गांवों में आयोजित होते खेल समारोह, दून स्कूल में पढ़ते शाही बच्चों की खुली जीपों में रैलियां,और गांव भर में पोस्टर- देश के राजनीतिज्ञ बरसों से जनता को यही सब परोस रहे हैं और उसकी सोच को इसी दिशा में धकिया रहे हैं।
अभी कल ही हमने सियासी समझ के सिलसिले में पश्चिम बंगाल की राजनीति की मिसाल दी थी, कि किस तरह वहां राजनीतिक लिहाज से परिपक्व दल की सरकार होने का असर वहां के विपक्षी दलों से लेकर मतदाताओं तक, सब पर नजर आता है। देश में जब 70 फीसदी लोगों से भी ज्यादा के गरीब होने की बात की जाती है, जनता जब खुद को जैसे-तैसे टिकाए रखने के लिए हर मोर्चे पर पर जद्दोजहद को मजबूर है, ऐसे में सियासी बारीकियों पर गौर करने की अपेक्षा उससे नहीं की जा सकती। लेकिन पहले उसे इस हालत में पहुंचा कर, और फिर इस बात का फायदा उठाकर राजनीतिक दल प्रजातंत्र के रास्ते देश में वंशवाद वापस ले आए, यह भारतीय प्रजातंत्र की सबसे बड़ी हार होगी। देश के प्रथम परिवार के सदस्यों का पिछले दिनों का बर्ताव देखकर यह कहने में हमें कुछ गलत नहीं लगता कि जिसके कंधों पर देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी टिकी है, वह स्वस्थ्य दलगत राजनीति की जड़ें मजबूत करने की अपनी जिम्मेदारियों से बुरी तरह बचकर चुनाव जीतने के छोटे रास्ते ढूंढ रहा है। . राहुल गांधी एक तरफ कांग्रेस में संगठन चुनाव कर आंतरिक प्रजातंत्र मजबूत करने की बात करते हैं, दूसरी तरफ पार्टी बरस दर बरस सोनिया गांधी को पार्टी का अध्यक्ष चुनते जाती है। कानूनी तौर पर भले इसमें कोई नुक्स ना निकाला जा सके, प्रजातांत्रिक परम्पराओं के जो सपने गांधी नेहरू थे वह ऐसी हरकतों से टूट चुके हैं। ऐसे में जमीनी स्तर पर पार्टी के लिए खून पसीना बहाने वाले, उसे अपने कंधो पर ढोने वाले कार्यकर्ताओं का भी मनोबल टूटता है लोकतंत्र की जड़ें यहीं से खोखली होते चलती हैं।