बुराई के प्रतीक को मारना आज की सहूलियत का...

संपादकीय
10 अक्टूबर 2016
हिन्दुस्तान के कई प्रदेशों में कल दशहरे पर रावण को जलाने की तैयारी चल रही है, और कई इलाके ऐसे भी रहेंगे जहां रावण नहीं जलाया जाता। दक्षिण भारत के बहुत से लोग और छत्तीसगढ़ में भी बस्तर के आदिवासी रावण नहीं जलाते। इनके अपने अलग-अलग सांस्कृतिक कारण हो सकते हैं, और दक्षिण के कई लोगों का यह मानना है कि रावण एक बड़ा विद्वान ब्राम्हण था, और उसे मारना गलत था। बाकी जगहों पर इसकी अलग-अलग वजहें हो सकती हैं, लेकिन हम उसकी बारीकियों में जाना नहीं चाहते। अभी हमारे ही अखबार के पन्नों पर लगातार यह बहस चल रही है कि दुर्गा के हाथों महिषासुर के मारे जाने की कहानी क्या आदिवासी विरोधी है? क्या महिषासुर आदिवासियों का देवता है और उसकी पूजा के साथ दुर्गा की पूजा का एक सांस्कृतिक टकराव है? हमने इस बहस के सभी पहलुओं के लिए बहुत सी जगह पन्नों पर निकाली, और इस कॉलम में भी इस बारे में लिखा। लेकिन आज मौका रावण के बारे में कुछ बातें करने का है।
रावण के दस सिरों को दस बुराइयों के प्रतीक के रूप में दिखाया जाता है, और राम के हाथों उसके मारे जाने की कहानी में यह दिन रावण के वध का रहता है। रावण अगर कहीं पर कोई रहा होगा, तो वह तो मर गया, लेकिन बुराई के प्रतीक को हर बरस सजाकर, खड़ा करके, उसे जलाकर मारने के बाद लोग तसल्ली से घर लौटते हैं, और एक-दूसरे को सोने की पत्ती देकर मुबारकबाद देते हैं। नतीजा यह होता है कि बुराई को मारने के लिए साल का एक दिन तय हो गया है। और इस दिन भी अपने भीतर के किसी रावण को मारने की कोई बात नहीं होती, क्योकि बांस और रंगीन कागज से बनाए गए रावण को आग लगाकर खत्म करना अधिक सुहाना लगता है, और उससे अपनी आत्मा को कोई कष्ट भी नहीं होता। अपने भीतर की दस बुराइयों को खत्म करने की कोई सोचे, तो उससे बहुत तकलीफ होगी, और सुख-सुविधा, सहूलियतें छिन जाएंगी। किसी की दो नंबर की कमाई कम हो जाएगी, किसी को पड़ोसन को बुरी नजर से देखना बंद करना पड़ेगा, और किसी को दारू या सिगरेट छोडऩा पड़ेगा। ऐसी दस भीतरी बुराइयों को छोडऩे का मतलब तो जिंदगी का पूरा रूख ही बदल देना हो जाएगा, और ऐसा करना इंसानों के लिए मुमकिन नहीं है। नतीजा यह है कि इस असुविधा से बचने के लिए एक ऐसे प्रतीक को गढ़ लिया गया है जो कि विरोध नहीं कर सकता, वकील नहीं कर सकता कि उसके साथ हर बरस यह ज्यादती होती है।
और मजे की बात यह भी है कि यह प्रतीक कुछ कमजोर न दिखे, इसलिए इसे खूब सुहावना बनाया जाता है, सजाया जाता है, और आतिशबाजी के साथ उसे निपटाया जाता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सरकार के इंतजाम में रावण दहन का जो सबसे बड़ा कार्यक्रम होता है, उस कार्यक्रम में तो इस बरस एक बड़ी भारी चूक होते-होते रह गई। अखबारों में यह खबर छपी कि इस बार रावण को गुजरात के राजा की तरह सजाकर जलाया जाएगा। अब इसका गुजराती समाज ने विरोध किया कि रावण न तो गुजरात का था, और न ही गुजराती था, फिर उसे गुजरात के डेढ़ हजार मीटर कपड़े से सजाकर क्यों जलाया जा रहा है। इस विरोध के बाद प्रशासन ने भी दखल दी, और रावण को उसके मूल स्थान लंका या श्रीलंका के हिसाब से ही माना गया, और गुजरात के राजा के नाम पर होने जा रही एक बड़ी राजनीतिक चूक टल गई।
फिलहाल इस देश में ऐसे प्रतीकों से आजादी पाने की जरूरत है जिन्हें मारकर आम लोग राहत की सांस लेते हैं कि उन्होंने बुराई को मार डाला है। ऐसे प्रतीक सामाजिक परंपराओं से हटाने चाहिए क्योंकि इनके चलते हुए लोगों को अपने भीतर की बुराइयां दिखती भी नहीं हैं। जिस तरह स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर लोग देशभक्ति के गाने बजाकर, कारों पर छोटे से झंडे लगाकर, या कि सरहद पर पड़ोसी देश से टकराव के दिनों में देशभक्ति के संदेश फैलाकर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं, उसी तरह दशहरे पर रावण को मारा जाता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और बुराई के नाम पर इतिहास के प्रतीक को मारना काफी नहीं रहना चाहिए, आज की मौजूदा हकीकत की भी बात होनी चाहिए। 

सरकारी नौकरी और विचारों की आजादी के दायरे...

संपादकीय
9 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ में एक और आईएएस अधिकारी की फेसबुक पोस्ट को लेकर सरकार परेशानी में घिरी है, और इस नौजवान अफसर को जिले की तैनाती से हटाकर मंत्रालय लाकर बिठा दिया गया है। ऐसे मामले बहुत ज्यादा नहीं हैं, लेकिन बीच-बीच में आते रहते हैं। खासकर बस्तर के पानी में ऐसा कुछ दिखता है कि वहां तैनात अफसर अधिक बेकाबू हो जाते हैं। कभी कोई कलेक्टर, तो कभी कोई दूसरा अफसर। और फिर पुलिस के वहां के आला अफसर तो सोशल मीडिया सहित बाकी मीडिया के कैमरों के सामने भी एक अलग स्वायत्तशासी बस्तर साबित करते दिखते हैं। ऐसे में राज्य सरकार बार-बार परेशानी में घिरती है, और अब आज राज्य के आईएएस अफसरों के संगठन ने अपने सदस्यों को गलतियों और गलत कामों से रोकने के लिए एक मार्गदर्शक मंडल बनाया है।
भारत में शासकीय अधिकारियों के जो सेवा नियम हैं, वे उन्हें राजनीति में हिस्सा लेने से रोकते हैं, और सरकार की छवि को खराब करने वाली किसी भी बात से रोकते हैं। इसके लिए बहुत विस्तार से किसी नियम का इंतजाम नहीं किया गया है, और सेवा शर्तों में लिखी गई एक लाईन ही बहुत से मामलों को रोकने के लिए काफी है, और सरकार उसके आधार पर किसी बेकसूर के खिलाफ भी कार्रवाई कर सकती है। सेवा शर्तों में लिखा गया है कि ऐसा आचरण जो कि शासकीय सेवक को शोभा न देता हो, अनबिकमिंग ऑफ एन ऑफिसर। अब यह बात इस पर भी लागू हो सकती है कि सार्वजनिक जगह पर कोई अफसर शराब पी ले, या कि किसी को गाली दे दे। सरकार चाहे तो इसे भी शासकीय सेवक के आचरण के खिलाफ मान सकती है, और कार्रवाई कर सकती है। लेकिन दूसरी तरफ बहुत से ऐसे मामले हैं जो कि सरकार की आलोचना के दायरे में नहीं आते, लेकिन सरकार के लिए असुविधा के होते हैं।
ताजा मामला बस्तर के एक नौजवान एक आईएएस अफसर का है जिसने फेसबुक पर दो दिन पहले भाजपा के प्रेरणास्रोत दीनदयाल उपाध्याय की उपलब्धियों और उनके योगदान पर गंभीर सवाल उठाए, और सवाल पूछने की तर्ज पर लिखा कि अगर किसी की जानकारी में उनका कोई योगदान हो तो बताए। अब यह बात रायपुर से लेकर दिल्ली तक की सरकारों को नागवार गुजरना तय है क्योंकि भाजपा की सारी सरकारें दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा पर काम कर रही हैं, और घोषित रूप से उन्हें मार्गदर्शक मानकर चल रही हैं। लोकतंत्र में चुनाव जीतकर आने वाली हर सरकार को यह हक रहता है कि वह अपनी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर अपनी प्राथमिकताएं तय करे, और अपने आदरणीय लोगों की विचारधारा पर अमल करे। भाजपा ऐसा करके कोई अनोखा काम नहीं कर रही है। कोई पार्टी नेहरू-गांधी को मानती है, कोई लोहिया को, और कोई पार्टी देश के बाहर के माक्र्स को भी मानती है।
ऐसे में भाजपा शासन के लिए काम करने वाले एक अफसर ने दीनदयाल उपाध्याय पर सवाल खड़े करके हो सकता है कि अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे में ही काम किया हो, लेकिन यह काम जाहिर तौर पर सरकार की नीतियों के खिलाफ था, सरकार की आलोचना के बराबर था, और इस नाते वह उम्मीद एक शासकीय सेवक से नहीं की जा सकती। हो सकता है कि इस पोस्ट के बाद जताए गए खेद के बाद भी सरकार को आगे कोई कार्रवाई जरूरी लगे, और यह कार्रवाई कानूनी न होकर महज प्रशासनिक हो सकती है। हो सकता है कि अदालत में जाकर यह अफसर अपने लिखे को अपना कानूनी अधिकार साबित भी कर दे, लेकिन इससे यह सवाल जरूर उठेगा कि शासकीय अधिकारियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का किस हद तक और कैसा इस्तेमाल करना चाहिए। हमारा यह मानना है कि ऐसे सवाल उठाकर इस अधिकारी ने जो सार्वजनिक असुविधा अपनी सरकार के लिए खड़ी की है, उससे बचा जाना चाहिए था।

सोशल मीडिया से छाती पर से हट जाने वाला वजन...

संपादकीय
8 अक्टूबर 2016
इंसानों और जानवरों, सभी को कुछ तरह की गलतफहमी होती है। कुछ लोगों को जब यह शक रहता है कि उनकी तबियत ठीक नहीं हो रही है, तो उन्हें काम की दवाईयों के साथ-साथ बिना दवाई वाले ऐसे कैप्सूल भी दिए जाते हैं कि उनके दिल-दिमाग को यह तसल्ली मिले कि उनका इलाज हो रहा है। इसे प्लेसिबो असर कहते हैं जो कि बिना दवाई के भी असर करता है। जानवरों के साथ भी ऐसा होता है और विकसित देशों में उनकी भी मनोचिकित्सा होती है, हिन्दुस्तान में तो खैर इंसानों को भी मनोचिकित्सा नसीब नहीं है। लेकिन ऐसी झूठी तसल्ली बहुत से लोगों को इलाज से परे की बातों में भी मिलती है।
कई लोगों को कसरत के वीडियो देखने, और फिटनेस के बारे में पढऩे से यह तसल्ली होने लगती है कि वे अपनी सेहत के प्रति जागरूक हैं। बहुत से लोगों को क्रिकेट या किसी और खेल का प्रसारण देखते हुए यह तसल्ली होने लगती है कि वे खेलों में हिस्सा ले रहे हैं। और इन दिनों भारत में बहुत से लोगों को सोशल मीडिया पर देशभक्ति के बारे में लिखते हुए या पड़ोस के दुश्मन माने जा रहे देश के खिलाफ लिखते हुए यह तसल्ली होने लगती है कि वे अपने देश का भला कर रहे हैं। हालांकि यह अपने आपको धोखा देकर एक खुशफहमी में रहने की बात है कि वे सचमुच कुछ कर रहे हैं। बहुत से लोग गरीब और गरीबी के बारे में सोशल मीडिया में लिखकर अपनी यह सामाजिक जवाबदेही पूरी कर लेते हैं कि वे गरीबों की फिक्र करते हैं। कुछ-कुछ ऐसा ही वे लोग भी करते हैं जो रात-रात भर जागकर किसी धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होते हैं, और जिन्हें लगता है कि वे धर्मालु हैं। ऐसे भी लोग रहते हैं जो करोड़ों रूपए की काली कमाई करके कुछ लाख का दान किसी धर्म स्थान को दे देते हैं, और वे परोपकारी कहलाने लगते हैं।
कुछ तो धर्म जैसी बातें लोगों को ऐसी सहूलियत दिला देती हैं, और कुछ अब सोशल मीडिया लोगों को ऐसा मौका दे देता है। एक तरफ तो जिस तरह चर्च में कन्फेशन चेंबर में जाकर लोग अपने पाप मान लेते थे, और माफी पा लेते थे, कुछ उसी तरह अपनी गलतियों को लोग सोशल मीडिया पर मान लेते हैं, और फिर यह मान लेते हैं कि वे उन गलतियों के जुर्म से उबर गए हैं। यह सिलसिला ऐसी सहूलियत न रहने के मुकाबले अधिक खतरनाक है। जब लोगों को इस तरह लिखने और पोस्ट करने की सुविधा नहीं थी, तो उनके गलत काम कम से कम कुछ वक्त तक तो उनकी छाती पर वजन की तरह सवार रहते थे। लेकिन अब तो पल भर में आत्मा ड्राईक्लीन होकर निकल आती है, अगले दाग-धब्बों के लिए एकदम तैयार होकर।
पिछले कुछ बरसों में ही ऐसी सामाजिक प्रतिक्रियाओं के सोशल मीडिया का विस्तार एक धमाके की तरह हुआ है, और इससे इंसानों की मानसिकता पर क्या असर पड़ा है, लोगों के दिल-दिमाग पर क्या फर्क पड़ा है, इसका ठीक-ठीक अंदाज भी अभी समाजशास्त्री नहीं लगा पाए हैं। आने वाले बरसों में हो सकता है कि इसका अंदाज लग सके।

शहादत के मौके पर राहुल की बेमौके की बेतुकी बात

संपादकीय
7 अक्टूबर 2016
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 26 दिन की किसान यात्रा खत्म होने के बाद जंतर-मंतर पर अपने भाषण में कहा कि पीएम मोदी जवानों की दलाली कर रहे हैं। जो हमारे जवान है, जिन्होंने अपना खून दिया है, जम्मू कश्मीर में जिन्होंने अपना खून दिया है, जिन्होंने हिंदुस्तान के लिए सर्जिकल स्ट्राइक किया है, उनके खून के पीछे आप छुपे हुए हो, उनकी आप दलाली कर रहे हो, ये बिल्कुल गलत है। हिंदुस्तान की सेना ने हिंदुस्तान का काम किया है, आप अपना काम कीजिए, आप हिंदुस्तान के किसान की मदद कीजिए, आप हिंदुस्तान की सेना को सातवें पे कमीशन में पैसा बढ़ा कर दीजिए,ये आपका काम है, ये आपकी जिम्मेदारी है।
राहुल गांधी के इस बेतुके बयान के बाद आज भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मीडिया से बात करते हुए इसे बहुत धिक्कारा और कहा कि राहुल गांधी को देश के मुद्दे समझ ही नहीं आते हैं, उन्हें आलू की खेती के बारे में भी बयान देना चाहिए। आलू से राहुल का अगर कोई छुपा हुआ रिश्ता हो तो पता नहीं, लेकिन अमित शाह का यह बयान सही है कि राहुल गांधी को देश के मुद्दे समझ नहीं आते। वे लगातार बेतुकी बातें करते हैं, और जब देश में पाकिस्तान के साथ जंग की बातें हो रही हैं, सरहद से ताबूत अलग-अलग इलाकों में लौट रहे हैं, शहीदों के बच्चों की रोते-बिलखते तस्वीरें चारों तरफ आ रही हैं, तब राहुल गांधी का दलाली का ऐसा बयान पता नहीं उनकी कौन सी समझ से उपजा है।
कांग्रेस की एक बहुत बड़ी दिक्कत यह है कि वह राहुल से परे देखने की ताकत नहीं रखती, और अगर रखती भी है, तो उसे राहुल से परे देखने की इजाजत नहीं है। खुद सोनिया के परिवार में लंबे समय से उनकी दूसरी संतान के राजनीति में आने के बारे में बातें होती रहती हैं, लेकिन कुल मिलाकर कांग्रेस का भविष्य राहुल गांधी के ही हाथों में दे दिया गया दिखता है। और राहुल का मिजाज, उनका बर्ताव, ये सब देश के नाजुक मौकों पर या तो विदेश में छुट्टी मनाते दिखता है, और जब उन्हें ऐसे मौकों पर विदेश जाने का मौका नहीं मिलता, तो वे अटपटी की ऐसी नासमझ बातें बोलते हैं कि लोग उस पर हॅंस पड़ते हैं, और कांग्रेस का भला चाहने वाले लोग रो पड़ते हैं। लेकिन जिस राहुल के कंधों पर कांग्रेस ने अपना भविष्य टिका दिया है, वे कांग्रेस के लिए संभावना नहीं है, कांग्रेस के लिए महज एक आशंका हैं।
देश की राजनीति इस बात की गवाह है कि पिछले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनकी पार्टी भाजपा, और एनडीए के दूसरे दलों को जब उम्मीद से बहुत अधिक सीटें मिलीं, और खुद भाजपा हक्का-बक्का रह गई, तो उसका एक बहुत बड़ा श्रेय राहुल गांधी को भी गया है। जब देश के मतदाताओं के सामने राहुल और मोदी के बीच तुलना करने की बात आई, तो मतदाताओं के पास सोचने-विचारने का कोई मौका बचा नहीं था। कांग्रेस पार्टी को अपने इस युवराज को राजनीति सिखाने में मेहनत करनी चाहिए, हो सकता है कि कुछ बरसों में वे बेहतर हो जाएं, और बेमौके पर बेतुकी बात कहने से बचें। फिलहाल कांग्रेस पार्टी को अपने ही घर के चिराग से एक बड़ा नुकसान हुआ है, और इस पार्टी में कोई इस नुकसान को गिना भी नहीं सकते।

कल के दिन क्या सुप्रीम कोर्ट विधायकों की राय भी जानेगा और सीएम का नाम घोषित करेगा

संपादकीय
6 अक्टूबर 2016
तमिलनाडू हाईकोर्ट ने कल राज्य सरकार को एक नोटिस जारी करके कहा कि मुख्यमंत्री जयललिता की सेहत की जानकारी का बुलेटिन जारी किया जाए। वे पिछले कई दिनों से अस्पताल में भर्ती हैं और उनकी कोई खबर जनता को नहीं है। हिन्दुस्तान में नेताओं को अपनी सेहत की जानकारी छुपाने की आदत है। दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहां पर सरकार में बैठे हुए नेताओं को अपनी सेहत की जानकारी जनता को देनी पड़ती है। और जो सरकारें जनता के टैक्स के पैसों पर चलती हैं, उनकी एक जवाबदेही जनता के प्रति बनती भी है। लेकिन आज की बात महज जनता को मिलने वाली जानकारी नहीं है, उससे परे की भी है।
तमिलनाडू में आज यह सवाल खड़ा हो रहा है कि अगर जयललिता सरकार चलाने की हालत में नहीं रहती हैं, या कि जैसा कि प्रकृति का नियम है, वे अगर किसी दिन नहीं रहती हैं, तो उनका वारिस कौन होगा। अभी तमिलनाडू से जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक उन्होंने किसी मंत्री या नेता का नाम लिखकर लिफाफे में बंद रखा है कि उनकी जगह अगर किसी को सीएम बनना हो, तो वह कौन हो। लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले जब उन्हें अदालती फैसले के चलते कुर्सी छोडऩी पड़ी थी, तो उनके एक करीबी सहयोगी को मुख्यमंत्री मनोनीत किया गया था, और उसने सिंहासन पर जयललिता के खड़ाऊ रखकर नीचे फर्श पर बैठकर सरकार चलाने के अंदाज में काम किया था, और जिस दिन अदालती रोक हटी, फिर जयललिता मुख्यमंत्री बन गईं। अब सवाल यह उठता है कि किसी धार्मिक या आध्यात्मिक संगठन की तरह अगर पार्टी की नेता अपनी मर्जी से वारिस भी तय करके जाती है, तो फिर भारत के इस लोकतांत्रिक ढांचे का क्या मतलब है, या कि यह ढांचा आखिर लोकतंत्र के नाम का कैसा ढकोसला करता है?
और यह बात महज जयललिता की नहीं है, एक नेता या एक कुनबे के राज वाली कांग्रेस सहित दर्जन भर से अधिक पार्टियों का यही हाल है। कांग्रेस में सोनिया परिवार की मर्जी से परे की कोई कल्पना भी कोई नहीं कर सकते। इसी तरह पिछले कुछ हफ्तों में उत्तरप्रदेश की राजनीति में मुलायम कुनबे का जिस तरह का अलोकतांत्रिक नाटक जनता ने देखा है, वह सबके सामने है। पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी अपनी पार्टी के लिए दुर्गा माता की तरह हैं, और उधर देश के दूसरे सिरे पर कश्मीर में एक कुनबे की तीसरी पीढ़ी, और दूसरे कुनबे की दूसरी पीढ़ी के बीच लोकतंत्र पिस रहा है। ऐसे में लगता है कि भारत के संविधान में क्या ऐसे फेरबदल होने चाहिए कि अमरीकी राष्ट्रपति की तरह दो कार्यकाल से अधिक वक्त किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को न मिले? और क्या पार्टियों के ढांचे में चुनाव आयोग के ऐसे नियम बनने चाहिए कि एक पार्टी के मुखिया के ओहदे पर एक व्यक्ति कितने समय तक रहे? या फिर अगर देश को और अधिक सुधार की जरूरत है, तो यह भी देखा जाए कि क्या बाल ठाकरे के परिवार से परे शिवसेना कुछ है? नवीन पटनायक से परे उनकी पार्टी कुछ है? और क्या आयोग की शर्तों को पूरा करने के लिए इन तमाम पार्टियों में चुनाव के नाम पर एक नाटक नहीं होता है?
भारत की जनता में लोकतंत्र के लिए सम्मान बहुत कम है। वह कुनबों को चुनती है और ढोती है, वह भ्रष्ट लोगों को चुनती है, और उनको अपना नेता मानने में गर्व महसूस करती है। उसे चुनाव में भ्रष्ट आचरण से परहेज नहीं है, उसे जेल की सजा काट रहे लोगों को चुनने से परहेज नहीं है, वह बाहुबलियों को चुन लेती है, डकैतों को चुन लेती है, बलात्कारियों को चुन लेती है। तो अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत की संसदीय चुनाव प्रणाली सचमुच अच्छी है, या इसमें किसी तरह के सुधार की जरूरत है? क्या चुनाव में उम्मीदवार बनने, और राजनीतिक दलों में किसी ओहदे पर आने के लिए जुर्म से परे रहने की शर्तों को और कड़ा किया जाना चाहिए? हम जानते हैं कि आज इस मुद्दे को छेड़ते हुए हमारे पास जवाब कम हैं, सवाल अधिक हैं। और एक दिन ऐसा आ सकता है कि बीसीसीआई पर सुप्रीम कोर्ट को जिस तरह की सख्ती करनी पड़ रही है, उस तरह की सख्ती पार्टियों के चुनाव करवाने में भी करनी पड़े, और सुप्रीम कोर्ट का कोई जज बैठकर विधायकों की अलग-अलग राय जाने, और मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के नाम की घोषणा करे। आगे-आगे देखें होता है क्या।

देश के भड़काऊ माहौल में नेहरू की कमी खलती है

संपादकीय
5 अक्टूबर 2016
देश में कई जगहों पर दुर्गा और महिषासुर की कहानी को लेकर तनाव हो रहा है। कुछ दिन पहले बस्तर में एक सीपीआई भूतपूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने महिषासुर की महिमा में कुछ लिखा तो उसे लेकर हिन्दू समाज के कुछ लोगों ने पुलिस में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचने की पुलिस रपट दर्ज कराई। आज एक और जिले मुंगेली में किसी के सोशल मीडिया पर लिखे हुए को लेकर तनाव खड़ा हुआ है, और वहां आगजनी हो रही है। दुर्गा और महिषासुर से जुड़ी हुई जो कहानियां हैं, उनमें ये बातें पहली बार सामने नहीं आ रही हैं, ये दशकों से किताबों में दर्ज हैं, और इन्हें लेकर हिन्दुओं और आदिवासियों के बीच एक मतभेद चलते भी आया है। लेकिन अब बदली हुई हवा में जहां हर कोई बुरा मानने को तैयार बैठे दिखते हैं, वहां ऐसे तनाव खड़े हो रहे हैं।
किसी देश में समाज के भीतर दूसरों के लिए, या कि असहमति के लिए एक सहनशीलता का बड़ा महत्व होता है। लोकतंत्र सहनशीलता के बिना चलना नामुमकिन रहता है क्योंकि कई तबकों के अलग-अलग किस्म के संस्कार रहते हैं, रीति-रिवाज रहते हैं, उनकी मान्यताएं अलग-अलग रहती हैं, और उनके बीच किसी हिंसक टकराव के बजाय असहमत रहने पर एक सहमति जरूरी होती है। अगर ऐसा न हो तो विविधता खत्म ही हो जाए, बहुमत का ही राज होने लगे। बस्तर में जहां एक आदिवासी नेता मनीष कुंजाम की अपनी आदिवासी-मान्यताओं के खिलाफ हिन्दुओं ने रिपोर्ट लिखाई है, और मनीष कुंजाम ने यह दोहराया है कि ये बातें कोई नई नहीं हैं, और बरसों से चली आ रही आदिवासी-मान्यताओं के मुताबिक ही उन्होंने लिखा है। लेकिन आज जरा-जरा सी बात पर असहमति को हिंसा में बदलना चलन हो गया है।
हर देश में समाज में एक वैज्ञानिक सोच को विकसित करना भी जरूरी रहता है। बहुत से धर्मों के भीतर अपनी खुद की कहानियों में ऐसी बातें लिखी रहती हैं कि जिन्हें आज कोई बाहरी व्यक्ति कहे, तो लोग उबल पड़ते हैं। जैसा कि आज ताजा इतिहास को लेकर हो रहा है, लोग किसी तरह की अप्रिय बात को सुनना नहीं चाहते, यह मानना भी नहीं चाहते कि उनके इतिहास में कोई अप्रिय बात रही थी, उसी तरह लोग धार्मिक मान्यताओं को लेकर भी एक कट्टरता दिखा रहे हैं, और यह महज हिन्दू धर्म के साथ नहीं है, सभी धर्मों के साथ कमोबेश ऐसी नौबत आ रही है। इसकी वजह यह है कि आज समाज में राजनीति से परे के सामाजिक नेताओं का शून्य हो गया है। और राजनीतिक नेताओं को हर नौबत में किसी न किसी तबके को नाराज करने या खुश करने में अपना एक फायदा दिखता है। फिर वह चाहे भारत-पाक सरहद के फौजी तनाव की बात हो, या फिर वह किसी धर्म या जाति की बात हो। आज सच कहना बड़ा मुश्किल हो गया है, क्योंकि सच को बर्दाश्त करना लोगों को अपना अपमान लगने लगा है।
देश में ऐसा भड़काऊ वातावरण अलग-अलग प्रदेशों में, अलग-अलग धर्म और जाति के लोगों में, अलग-अलग पेशे के लोगों में बढ़ते चल रहा है। और ऐसे ही मौके पर जवाहर लाल नेहरू सरीखे नेताओं की कमी खलती है जिन्होंने नास्तिक रहते हुए भी पूरे देश का सम्मान पाया था, और जनता में वैज्ञानिक समझबूझ को विकसित करने का ऐतिहासिक काम किया था।

आम लोगों के बीच युद्धोन्माद घटाने की कोशिश हो

संपादकीय
4 अक्टूबर 2016
भारत और पाकिस्तान के बीच जंग के हालात के बिना भी किसी क्रिकेट मैच को लेकर भी इतना तनाव हो जाता है कि दोनों देशों में कई लोगों को गद्दार कहा जाने लगता है, और देशभक्ति के नए पैमाने तय होने लगते हैं। एक-दूसरे के बारे में कहा जाने लगता है कि वे दुश्मन देश का साथ दे रहे हैं, या अपनी फौज का हौसला पस्त कर रहे हैं। और यह जरूरी नहीं है कि ऐसा नेताओं के बीच ही होता हो, ऐसा इन दिनों सोशल मीडिया की मेहरबानी से आम लोगों के बीच भी होने लगता है, और हो रहा है।
दरअसल दुनिया की सभ्यता का इतिहास बताता है कि राष्ट्रवाद, क्षेत्रवाद,  धर्म या जाति के आंदोलन बिना किसी दुश्मन के धारणा के नहीं चलते। जब भारत या किसी भी दूसरे देश में राष्ट्रवाद की एक सोच को भड़काया जाता है, तो वह देश प्रेम की सोच से अलग रहती है। उसके लिए दूसरे देशों से नफरत जरूरी हो जाती है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि धर्मान्धता किसी दूसरे धर्म से नफरत, और साथ-साथ विज्ञान से भी नफरत के आधार पर ही चलती है। जब जातिवाद पनपता है, तो वह किसी दूसरी जाति के खिलाफ ही पनपता है। जब क्षेत्रवाद आक्रामक होता है, तो वह अपने क्षेत्र को आगे बढ़ाने पर नहीं टिका होता, वह किसी दूसरे क्षेत्र का विरोध करने पर टिका होता है। इसलिए जब किसी देश में युद्धोमाद को बढ़ावा दिया जाता है, तो वह पड़ोसी देश के साथ तमाम किस्म के रिश्ते खत्म करने पर आमादा हो जाता है। आज भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ इसी तरह की हिंसक-बेवकूफियां चल रही हैं।
पाकिस्तान में चूंकि लोकतंत्र कमजोर है, वहां पर परमाणु युद्ध की बात करने वाले लोग कुछ अधिक हैं। दूसरी तरफ हिंदुस्तान में भी सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोग हैं जो कि अमरीका में प्रोफेसर रह चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान की 10 करोड़ आबादी को खत्म करने के लिए वे हिंदुस्तान के 10 करोड़ लोगों को भी परमाणु युद्ध में खत्म कर देेने को बुरा नहीं मान रहे है। देशभर में ऐसे लोग फैले हुए हैं, जो पड़ोस के देश से कला, साहित्य, खेल, फिल्म, कारोबार, सभी तरह के रिश्ते तोड़ लेना चाहते हैं। और यह दीवानगी सरहद से दूर अधिक रहती है, सरहद के लोग तो आज अपना घर-बार, अपनी फसल, अपने जानवर छोड़कर दूर भेजे जा रहे हैं, और इस नुकसान की भरपाई कोई नहीं करने वाला है। खासकर जो लोग सोशल मीडिया पर रात-दिन युद्धोन्माद की बातें कर रहे हैं, उनका कुछ भी दांव पर नहीं लगा हुआ है। आज जो लोग चीन के सामानों के बहिष्कार की बात कर रहे हैं, उसके संदेश चारों तरफ फैला रहे हैं, वे यह बात भूल गए हैं कि गुजरात में सरदार पटेल की जो दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बन रही है, उसका कुछ हिस्सा चीन से बनकर आ रहा है। उसके लिए भारत ने देशभर के गांव-गांव से लोहा तो इकट्ठा किया गया था, लेकिन उसका इस्तेमाल हो रहा है कि नहीं यह तो पता नहीं, चीन से प्रतिमा का हिस्सा आना सार्वजनिक रूप से मान लिया गया है।
युद्ध की सोच भी खराब होती है, हिंसक होती है, और लोगों के दिल दिमाग को जहर से भर देती है। युद्ध का नुकसान सिर्फ सरहद पर नहीं होता, यह आम लोगों को भी हिंसक बना देता है। इसलिए इस देश में तमाम जिम्मेदार तबकों को आम लोगों के बीच युद्धोन्माद घटाने की कोशिश करनी चाहिए।

हॉर्न प्लीज की जगह नो हॉर्न की जरूरत

संपादकीय
3 अक्टूबर 2016
एक मजेदार खबर यह है कि ट्रकों के पीछे हॉर्न प्लीज क्यों लिखा होता है? इसके अलग-अलग कई मायने हो सकते हैं, लेकिन हिन्दुस्तान में यह बात बड़ी साफ है कि ट्रैफिक हॉर्न से तय होता है। अगर पीछे से कोई हॉर्न बजाते न आए तो आगे चलने वाले मुडऩे का संकेत भी नहीं देते। और बिना संकेत दिए मुडऩे वाले से कोई शिकायत करे, तो उसे आंख दिखाई जाती है कि पीछे से आ रहे थे तो हॉर्न क्यों नहीं बजाया। भारत में सबसे अधिक असभ्यता का प्रदर्शन सड़कों पर ही होता है, और वहां हर कोई अपने हक और दूसरों की जिम्मेदारी को ही देखते हुए चलते हैं, या कि गाड़ी चलाते हैं। जो लोग नियमों को मानते हुए चलना चाहते हैं उनके लिए मन में इस हसरत के सिवाय और कोई रास्ता नहीं बचता कि वे किसी और देश में पैदा हुए होते तो अच्छा होता।
लेकिन फिलहाल यह बात करें कि गाडिय़ों के पीछे हॉर्न प्लीज लिखा होने का क्या नतीजा होता है। सड़कों पर जब लोग लगातार ऐसा लिखा हुआ पढ़ते चलते हैं, तो उनके दिमाग में हॉर्न बजाने की बात बैठ भी जाती है। और इसके बाद जरूरत रहे, या कि न रहे, उनके हाथ हॉर्न को दबाते चलते हैं। एक मनोवैज्ञानिक असर लोगों की सोच को बदलकर रख देता है, और हॉर्न बजाने का यह उकसावा पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ते चलता है क्योंकि मां-बाप के साथ चलते हुए बच्चे उनको बिना जरूरत हॉर्न बजाते देखकर वही सीखते चलते हैं। किसी भी सभ्य देश को यह सीखना और समझना चाहिए कि बिना कहे हुए समाज में जो बुरे संदेश जाते हैं, उनको कैसे रोका जाए। वैसे तो भारत में इसको रोकने के लिए जो संदेश लिखे जाते हैं, उनका भी असर दिखता नहीं है, और जहां भी थूकने या पेशाब करने के खिलाफ लिखा जाता है, वहीं पहुंचकर लोगों को ऐसी हरकत सूझती है। नतीजा यह होता है कि इस देश में आने वाले पर्यटक ऐतिहासिक महत्व की जगहों पर जाकर भी बहती हुई पेशाब और दीवारों पर पीक को देखकर कांप जाते हैं।
चीन में कुछ बरस पहले तक लोगों को खखारकर थूकने की बड़ी बुरी आदत थी और सड़कों के किनारे लोग ऐसा करते चलते थे। फिर जब चीन का विदेश व्यापार बढ़ा, अंतरराष्ट्रीय संबंध बढ़े, तो कारोबार को ध्यान में रखते हुए चीन की सरकार ने अपने स्कूल-कॉलेज से ही अंग्रेजी के साथ-साथ ऐसी तहजीब देकर लोगों को निकालना देकर शुरू किया कि वे दुनिया के दूसरे देशों में जाकर भी देश का नाम न डुबाएं। जो हिन्दुस्तानी बाहर जाते हैं, उन्हें कई महीने यह समझने में लग जाता है कि ऐसा हॉर्न बजाने पर दुनिया के सभी सभ्य देशों में बड़ा भारी जुर्माना हो सकता है। भारत में लोगों को तमीज सिखाने की जरूरत है, क्योंकि अब बढ़ते हुए शोर की वजह से लोगों की मानसिक सेहत भी खराब होने लगी है, और ऐसे प्रदूषण का एक बड़ा कारण सड़कों पर गैरजरूरी हॉर्न भी है।

बस्तर के नक्सलियों से बातचीत की जरूरत

संपादकीय
2 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक तरफ तो पुलिस की अगुवाई में केन्द्र से आए हुए सुरक्षा बल भी नक्सलियों से मोर्चा लेने में लगे हुए हैं, और दूसरी तरफ राज्य सरकार नक्सल कब्जे से छूटते हुए इलाकों में काम करने की कोशिश भी कर रही है। आए दिन सरकार की तरफ से ब्यौरा जारी होता है कि बस्तर में कौन-कौन से निर्माण कार्य शुरू हुए हैं, कौन से पूरे हुए हैं, और कौन से चल रहे हैं। अभी जब हम यह बात लिख रहे हैं तब बस्तर में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सरकार की विकास योजनाओं और कामयाबी के बारे में भाषण दे ही रहे हैं। पिछले दिनों कई कार्यक्रमों में उन्होंने बस्तर की पुलिस की भी इस बात को लेकर तारीफ की, कि वह बहुत अच्छा काम कर रही है।
दूसरी तरफ बस्तर में काम करने वाले कई पत्रकारों और सामाजिक संगठनों, मानवाधिकार आंदोलनकारियों और वकीलों का लगातार यह आरोप जारी है कि बस्तर की पुलिस नक्सली बताकर बेकसूरों को मार रही है, आदिवासी लड़कियों के साथ बलात्कार कर रही है, और बेकसूरों को जेल डाल रही है। पुलिस और सामाजिक क्षेत्र के बीच बरसों से चल रहे इस टकराव के बीच बस्तर में समय-समय पर कुछ ऐसे सामाजिक संगठन भी सामने आए हैं जिनके बारे में लोगों को यह शक रहा कि वे पुलिस द्वारा प्रायोजित हैं, और पुलिस की तमाम ज्यादतियों पर पर्दा डालने के लिए, इसका विरोध करने वाले लोगों को नक्सली ठहराने के लिए बनाए गए हैं। यह टकराव भी बस्तर में खूब चल रहा है, और यह नया भी नहीं है। एक वक्त बस्तर के कलेक्टर रहे हुए पुराने वक्त के आईएएस अधिकारी डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा जब सामाजिक आंदोलनकारी की हैसियत से बस्तर गए थे, तो उन पर नक्सल समर्थक होने का आरोप लगाकर उनके कपड़े फाड़े गए थे, और शायद उनके चेहरे पर कालिख भी पोती गई थी। उनके अलावा स्वामी अग्निवेश का भी वही हाल हुआ था, और छत्तीसगढ़ के बाहर से आने वाले कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, कई पत्रकारों का बस्तर में यही हाल किया गया। कुल मिलाकर वहां एक ऐसा माहौल दिखता है कि जो कोई पुलिस के साथ पूरी तरह समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं है, उसकी उठाई गई हर आवाज नक्सल-समर्थक नारा है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का मिजाज जानने वाले लोग यह जानते हैं कि वे बस्तर किस्म की असंवैधानिक हिंसा की हिमायती नहीं हो सकते। लेकिन आज हकीकत यही है कि बस्तर के बेकसूर आदिवासी एक तरफ नक्सलियों के हाथों अपना गला कटवा रहे हैं, तो दूसरी तरफ बस्तर में पुलिस का एक किस्म से राज ही कायम है, और वहां पर पुलिस को जो नापसंद हैं, उनके कोई लोकतांत्रिक अधिकार नहीं हैं। यह नौबत इस वजह से भी आई हुई हो सकती है कि नक्सल मोर्चे पर बस्तर के बड़े पुलिस अफसर जिस तरह की हथियारबंद कामयाबी पा रहे हैं, उसे दिखाकर वे अपनी बाकी बातों के लिए एक किस्म की मंजूरी सरकार से पा रहे हैं। हमारा यह मानना है कि सरकार को इन दोनों बातों को अलग-अलग करके देखने की कोशिश करनी चाहिए, और असल नक्सलियों को मारने में कामयाबी पाने से किसी को सामाजिक आंदोलनों को कुचलने की इजाजत, मीडिया का गला घोंटने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। नक्सलियों की लाशें तो आती-जाती रहेंगी, लेकिन इतिहास बेकसूरों पर ज्यादती को भी बड़ी गंभीरता से दर्ज करता है।
आज छत्तीसगढ़ के बाहर इस राज्य के बारे में अगर कोई एक बात सरकार के खिलाफ जाती है, व्यापक प्रचार पाती है, तो वह बस्तर के इलाके में पुलिस ज्यादतियों की है। हमारा यह मानना है कि नक्सलियों को मारने के लिए बाकी लोगों पर ज्यादती करने की कोई जरूरत नहीं है, और न ही यह न्यायसंगत है कि पुलिसिया कामयाबी पाने वाले को ज्यादती करने की छूट दे दी जाए। राज्य सरकार को आज उसके साथ योजना मंडल में काम करने वाले भूतपूर्व मुख्य सचिव सुनील कुमार सरीखे किसी अधिकारी का इस्तेमाल करके नक्सलियों से बातचीत का सिलसिला शुरू करना चाहिए। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले बस्तर में एक कलेक्टर का अपहरण हुआ था, तब उनके साथ बातचीत करने वाले सरकारी लोगों में सुनील कुमार भी थे। उनको आदिवासी मामलों की समझ भी है, और वे पहले ऐसी समझौता और शांति की बात कर भी चुके हैं। उनके जैसे कुछ और लोग भी हो सकते हैं, और छत्तीसगढ़ सरकार को ऐसी बातचीत की पहल करनी चाहिए। बंदूकों का मोर्चा चलते रह सकता है, लेकिन उसकी लागत बहुत अधिक आ रही है, रूपयों के खर्च में भी, और बेकसूर आदिवासियों के अधिकारों की शक्ल में भी।

पाकिस्तान से परमाणु खतरा न सिर्फ भारत को, बल्कि अमरीका सहित पूरी दुनिया को

संपादकीय
1 अक्टूबर 2016
भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे मौजूदा तनाव को लेकर हम बार-बार कुछ अधिक लिखना तो नहीं चाहते, लेकिन एक मुद्दा ऐसा है जिसे ऐतिहासिक संदर्भों में देखते हुए उस पर लिखना ही होगा। यह तनाव बढ़ता है तो भी यह लिखना माकूल होगा, और अगर खत्म होता है, तो भी। पिछले कुछ हफ्तों में पाकिस्तान की सरकार के बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए गैरफौजी लोगों ने भी परमाणु हथियारों को लेकर बड़ी गैरजिम्मेदारी के बयान दिए हैं। वहां के मंत्रियों ने भी यह साफ-साफ कहा कि पाकिस्तान ने परमाणु हथियार रखने के लिए नहीं बनाए हैं, जरूरत पडऩे पर वह उनका इस्तेमाल भी करेगा। और ऐसे ही बयानों को देखते हुए अमरीका ने आज एक आम नसीहत दी है कि परमाणु हथियारों के बारे में उनसे लैस देशों को बयान भी जिम्मेदारी से देने चाहिए। यह बात सिर्फ पाकिस्तान पर इसलिए लागू होती है कि भारत में सरकार और फौज की तरफ से परमाणु हथियार शब्द का भी इस्तेमाल नहीं हुआ है। और इस देश के एक बहुत ही भयानक बड़बोले और गैरजिम्मेदार भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने जरूर यह कहा है कि भारत को पाकिस्तान पर परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करना चाहिए और परमाणु युद्ध में भारत के दस करोड़ लोग मारे जाएं तो भी परवाह नहीं करनी चाहिए क्योंकि पाकिस्तान पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। सुब्रमण्यम स्वामी के बयानों को खुद भाजपा के भीतर कोई गंभीरता से नहीं लेते हैं क्योंकि वे आए दिन अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ भयानक सनसनीखेज आरोप लगाते रहते हैं, और मंत्रियों को हटाने की मांग करते रहते हैं। इसलिए स्वामी के बयान को न तो भाजपा का बयान माना जा सकता है, न ही मोदी सरकार का।
अभी दो दिन पहले ही हमने एक खबर छापी है कि अगर भारत और पाकिस्तान में परमाणु युद्ध होता है तो करीब दो करोड़ लोग मारे जाएंगे, और इससे मौसम पर जो असर पड़ेगा, उससे फसल पर पडऩे वाली मार से दसियों करोड़ लोग दुनिया में और मारे जाएंगे। ये आंकड़े मोटे तौर पर दोनों देशों के पास मौजूद परमाणु हथियारों के अंदाज को लेकर निकाले जाते हैं, और दुनिया यह उम्मीद करती है कि ऐसी नौबत नहीं आएगी, और इन दोनों देशों के जो मददगार या दोस्त देश हैं, उनमें से अमरीका, चीन और रूस जैसी महाशक्तियां तनाव को उतना बढऩे से रोकने के लिए बहुत कुछ करेंगी। लेकिन आज ही अमरीकी मीडिया में वहां के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन का भी एक ऑडियो तैर रहा है जिसमें अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन ने इस आशंका को लेकर चिंता व्यक्त की है कि पाकिस्तान में जेहादियों की पहुंच यदि परमाणु हथियारों तक हो गई तो वहां से परमाणु आत्मघाती हमलावर तैयार हो सकते हैं। उन्होंने कहा- हम इस भय में जीते हैं कि वहां एक तख्तापलट होगा, यह कि जेहादी सरकार पर अपना नियंत्रण कर लेंगे, वे परमाणु हथियारों तक पहुंच बनाएंगे और आपको आत्मघाती परमाणु हमलावरों से जूझना पड़ेगा।
दुनिया को अब यह लगभग भूल चला है कि एक वक्त भारत परमाणु हथियारों के खिलाफ चलने वाले आंदोलन का एक बड़ा प्रमुख नेता था। और कुछ दशक पहले परमाणु निशस्त्रीकरण शब्द लगातार खबरों में बने रहता था क्योंकि दूर की सोचने वाले लोगों को यह अंदाज था कि ऐसी बेकाबू नौबत किसी दिन आ सकती है। और अगर आज भारत और पाकिस्तान से परे देखें, तो उत्तर कोरिया का बददिमाग तानाशाह लगातार अमरीका को परमाणु हथियारों की धमकी देते रहता है, और यह धमकी बहुत फर्जी भी नहीं है, क्योंकि उत्तर कोरिया ने परमाणु हमले की ताकत हासिल कर रखी है।
पाकिस्तान एक बहुत ही कमजोर लोकतंत्र है, और वहां पर कोई बददिमाग या बेदिमाग फौजी अफसर या तानाशाह, या कि कोई धर्मांध आतंकी गिरोह आत्मघाती अंदाज में परमाणु हथियारों पर कब्जा करके उनका इस्तेमाल सबसे करीबी निशाने, हिन्दुस्तान पर कर सकते हैं। यह खतरा एक हकीकत है, और ऐसे खतरे के चलते हुए हिंदुस्तान की सरकार अगर पाकिस्तान के ऐसे परमाणु ठिकानों के खिलाफ कोई फौजी कार्रवाई करती है, तो वह वैसी ही होगी जैसी कि इराक पर अमरीका ने की थी। इराक के खिलाफ तो बुश ने गढ़े हुए झूठे सुबूतों के सहारे हमले को न्यायसंगत ठहराया था, लेकिन पाकिस्तान के खतरे को तो अमरीका सहित बाकी दुनिया ठीक से जान रही है। और एक नौबत ऐसी भी आ सकती है कि भारत नहीं, दुनिया के दूसरे देश पाकिस्तान की परमाणु क्षमता पर ठीक उसी तरह की रोक लगाने को मजबूर हों, जैसी रोक अभी ईरान की परमाणु क्षमता पर अमरीका और बाकी देशों ने लगाई हुई है। अमरीका को पता नहीं यह कब समझ आएगा कि उससे मिलने वाली मदद से पाकिस्तान एक ऐसा खतरा बन रहा है जो कि किसी दिन अमरीका पर हमला करने वाले आतंकी लोगों को हथियार दे सकता है।