यूपी में जुर्म नहीं कम है...


23 जुलाई 2012
उत्तरप्रदेश के एक थाने में फिर एक महिला से सामूहिक बलात्कार की खबर आई है। और जैसा कि हमारे समेत बहुत से लोगों का अंदाज है कि सौ-पचास बलात्कार में से किसी एक में ही उसकी शिकार लड़की या महिला और उसके परिवार की हिम्मत रिपोर्ट लिखाने की होती है। देश का सबसे कमउम्र मुख्यमंत्री देश के सबसे बड़े प्रदेश पर राज कर रहा है और वहां से जुर्म की जो गिनती सामने आ रही है वह शायद इस प्रदेश के इतिहास में किसी भी सरकार के पहले महीनों का एक रिकॉर्ड है।  अब सवाल यह उठता है कि मायावती की जिस सरकार को मुजरिमों की रहनुमा कहते हुए समाजवादी पार्टी थकती नहीं थी, उस सरकार में तो आए दिन सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक, सांसद और मंत्री भी गिरफ्तार होते रहते थे। यहां पर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी की सरकार में बहुत से ऐसे मंत्री शामिल किए गए जिन पर कई किस्म के जुर्म दर्ज हैं और अब सरकार उन पर से मुकदमे खत्म करते चल रही है। 
ऐसे में जब हर किस्म के अपराधों के आरोपों के घेरे में फंसे लोग लालबत्ती तले, झंडे लहराती गाडिय़ों में, वर्दियों की सलामी लेते चल रहे हैं, तो उनके अपराधी साथियों के हौसले कैसे पस्त होंगे? और इसका एक नतीजा यह हुआ है कि वहां पर माहौल जुर्म के हौसले का बन गया दिखता है। जिस तरह किसी नए थानेदार के आने पर जुर्म शुरू में तो उस थाना-इलाके में कम होते हैं, वैसी ही उम्मीद अखिलेश यादव से उत्तरप्रदेश के अमन-पसंद लोगों को थी। जिस राज्य का नाम और जिसकी साख तरह-तरह के जुर्म से बिगड़ी हुई है वहां पर कुछ बरस पहले का इसी समाजवादी पार्टी का वह चुनावी नारा भी झूठा साबित हो रहा है जिसमें अमिताभ बच्चन टीवी के परदे पर आकर कहते थे-'यूपी में दम है, क्योंकि जुर्म यहां कम है।Ó यह तो गनीमत है कि धर्मनिरपेक्ष मुलायम सिंह के दोस्त अमिताभ बच्चन अब नरेन्द्र मोदी के राज्य का इश्तहार कर रहे हैं, क्योंकि उनकी कही बात अब यहां पर मखौल ही बनती।
आज कि ही एक दूसरी खबर, बलात्कार की इस खबर के साथ, आई जिसमें नाम गिनाए गए हैं कि किस-किस मंत्री ने किस-किस तरह के जुर्म के मुकदमे वापिस लिए जा रहे। उत्तरप्रदेश में जब राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री थे तब जिस ब्रम्हशंकर त्रिपाठी पर मौत और चोरी की दफाओं में केस चल रहा था, उसे अभी-अभी वापिस ले लिया गया, 2001 से चल रहे इस मामले में जुर्म साबित होने पर दस बरस तक की कैद हो सकती है। पूर्वी उत्तरप्रदेश के एक जाने-माने बाहुबली त्रिपाठी पर से वापिस लिया गया यह मामला अकेला नहीं है। ऐसे बहुत से मामले वापिस लिए जा रहे हैं जिनके खिलाफ लोगों को जनहित याचिका लेकर अदालत जाना चाहिए और उत्तरप्रदेश को बचाना चाहिए। 
आज यह राज्य पिछड़ेपन और गरीबी से जूझ रहा है। यह हालत सिर्फ दिल्ली से अभी-अभी मिले मतदान-भुगतान के दसियों हजार करोड़ से नहीं सुधर सकेगी। इसके लिए वहां का माहौल सुधारना होगा, तभी वहां बाहर से कारखाने और कारोबार पहुंचेंगे। ऐसा न होने पर उत्तरप्रदेश कभी अपनी संभावनाओं को नहीं छू पाएगा। एक नौजवान मुख्यमंत्री को अपनी पारी साफ-सुथरी शुरू करनी चाहिए, लेकिन यहां उसका ठीक उल्टा हो रहा है। समाजवादी पार्टी से जुड़े हुए लोग पहले भी तरह-तरह के सार्वजनिक अपराध करते आए थे और मुलामय सिंह की पुलिस उनको छूने से बचती रही थी। वही नौबत आज भी जारी है। इस प्रदेश के कानून-व्यवस्था मामलों को लेकर केंद्र सरकार भी कोई कड़ाई नहीं दिखा पाएगी क्योंकि उसे बचाने में मुलायम सिंह यादव अपनी पूरी ताकत के साथ खड़े रहते हैं। अब सवाल यह है कि लोहिया के नाम पर चलने वाली समाजवादी पार्टी अगर धर्मनिपरेक्ष होने के एवज में इस तरह के अपराधों को अनदेखा करने की उम्मीद लोगों से करती है तो वह बात अब किसी के गले नहीं उतरती। धर्मनिपरेक्ष होने से चारा खाना, या गुंडागर्दी करना कैसे सही ठहराया जा सकता है, ठीक उसी तरह जैसे कि प्रशासन अच्छा होने पर भी मोदी की साम्प्रदायिकता को बर्दाश्त करने के लायक नहीं माना जा सकता। आज का वक्त अच्छे प्रशासन और धर्मनिरपेक्षता दोनों की मांग करता है, और उससे कम में जनता की उम्मीद को छूना भी मुमकिन नहीं होगा। फिलहाल उत्तरप्रदेश से ऐसे एक-एक जुर्म की खबर इस राज्य को पीछे धकेल रही है। और अखिलेश यादव को यह भी याद रखना होगा कि यह चुनाव उन्होंने जीता कम था, मायावती ने हारा ज्यादा था, अगला लोकसभा चुनाव मायावती के कामकाज से वोट तय नहीं करेगा, सपा के कामकाज से करेगा।

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