सवा करोड़ की आबादी, सवा मैडल पर फख्र !


संपादकीय
27 जुलाई
एक पश्चिमी अखबार में अभी यह रिपोर्ट छपी है कि गरीब देशों को ओलंपिक की कौन से खेलों पर अपना ध्यान लगाना चाहिए ताकि वे कम खर्च की तैयारी में भी मैडल के करीब पहुंच सकें। आज ही एक दूसरी खबर यह है कि तैराकी के लिए कुछ ऐसे नए कपड़े तैयार हुए हैं जो अब तक चले आ रहे कपड़ों के मुकाबले कम पानी सोखते हैं, और इससे तैराकों को मदद मिलती है। यहीं पर यह भी छपा है कि किस तरह कुछ तैराक ऐसे महंगे कपड़ों के खिलाफ हैं क्योंकि उनसे दुनिया के अलग-अलग देशों के खिलाडिय़ों के समान मौके छिन जाते हैं। ओलंपिक हो या कोई दूसरा मौका, इसकी मेजबानी के फैसले से लेकर इसके खेलों के प्रायोजक बनने तक और फिर खिलाडिय़ों की पोशाक तक, बाजार का दखल इतना बड़ा हो चुका है कि कई देश मैडल की दौड़ तो दूर रही, ओलंपिक के मैदानों तक पहुंचने के लायक भी तैयार नहीं हो पाते, और ऐसा भी जरूरी नहीं है कि इसमें हर बार अकेले उनकी गरीबी ही आड़े आती हो, लेकिन गरीबी बहुत जगह आड़े आती है। 
आज जब कुछ घंटों बाद ओलंपिक का उद्घाटन होने जा रहा है तो लंदन से दूर बैठे हम भारत के खेलों की हालत के बारे में सोच रहे हैं। एक तरफ क्रिकेट का खेल है जिसे सरकार के और कानून के हर तरह के हाथों से दूर रखकर हर राजनीतिक दल के नेता गिरोहबंदी करके दसियों हजार करोड़ का सालाना कारोबार कर रहे हैं। लेकिन इस चकाचौंध से दूर दुनिया भर के छोटे-छोटे ऐसे खेल हैं, जिनके खिलाडिय़ों को कई-कई दिन ट्रेन के डिब्बे में बैठकर सफर करना होता है, और दरी पर भूखे पेट सोना होता है। देश भर में यही हालत सुनाई देती है कि कहां कोई राष्ट्रीय खिलाड़ी सड़़क किनारे शराब बेचने को मजबूर है, तो कहां कोई दूसरी राष्ट्रीय खिलाड़ी सड़क पर मिट्टी खोदने का रोजी का काम कर रही है। दूसरी तरफ भारत के कई प्रदेशों से ओलंपिक में जाने के लिए नेता और अफसर, खेल संघों के पदाधिकारी पेटी-बिस्तरे महीनों पहले से बांध चुके थे। आज जब राष्ट्रीय चैंपियन रोजी पर काम कर रहे हैं तब इस देश की अदालत इस मामले से जूझ रही है कि हजारों करोड़ के घपले वाले राष्ट्रमंडल खेलों के सरगना को लंदन जाने दिया जाए या न जाने दिया जाए? एक तरफ सरकार के खेल मंत्री सार्वजनिक रूप से इसके खिलाफ हैं कि कलमाड़ी इस देश के नाम के साथ ओलंपिक जाए, क्योंकि वे अभी भयानक भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ्तारी के बाद जमानत पर छूटे हुए हैं। दूसरी तरफ उन्हीं की पार्टी का कलमाड़ी अपनी पार्टी का मुंह चिढ़ाता हुआ लंदन की तरफ रवाना होने की फिराक में है। और इस पूरे भ्रष्टाचार की मां-बाप यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी अपने खेल मंत्री और अपने इस कलमाड़ी के बीच की बहस को मानो स्टेडियम की दर्शकदीर्घा में बैठे हुए देख-सुन रही है। 
तकरीबन हर राज्य से यह सुनाई पड़ता है कि खिलाडिय़ों की कैसी बदहाली है, और कैसे बड़े-बड़े खेल संघों पर काबिज नेता, अफसर और दौलतमंद लोग जगह-जगह अहमियत पा रहे हैं। जिस तरह से इस समय राज्याश्रय हुआ करता था, उसी तरह घोर अलोकतांत्रिक तरीके से आज इस देश में खेलों पर ताकतवर तबकों का कब्जा है और खिलाड़ी खेल की सुविधाओं के लिए मानो हाथ में कटोरा लिए खड़े रहते हैं। ऐसा देश अमरीका और चीन का भला क्या खाकर मुकाबला कर सकता है जो कि किलो-किलो सोना लेकर ओलंपिक से लौटते हैं। यह देश आबादी में बड़ा है और बर्बादी में उससे भी अधिक बड़ा है। दुनिया के कई देश पेड़ से अमरूद तोडऩे की तरह मैडल उतारकर आ जाते हैं, ऐसे में भारत ओलंपिक में मिले एक या दो मैडल को लेकर साल भर खुशियां मनाता है। हकीकत तो यह है कि यह पूरी तस्वीर इस देश के तकरीबन हर खेल का हौसला तोडऩे वाली है और सवा करोड़ से अधिक की आबादी अगर सवा मैडल को फख्र का सामान मानती है, तो हमारे हिसाब से यह एक शर्मिंदगी का सामान ही है। 
हिन्दुस्तान को इस ओलंपिक के पहले और इसके बाद भी, अपने खेलों और खिलाडिय़ों को लेकर यह सोचना होगा कि वह किसी भी दूसरे सरकारी ठेके की तरह की बेईमानी इसमें भी जारी रखना चाहता है या फिर अपनी युवा पीढ़ी का खेल का उत्साह खड़ा करना चाहता है? 

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