अपने और दूसरों के वक्त की कद्र


16 जुलाई 2012
किसी एक शहर में पूरी जिंदगी गुजारने के बहुत से नफे होते हैं और कुछ नुकसान भी। नुकसान यह कि जिन लोगों से इतने बरसों में सामाजिक संबंध बनते हैं, यारी-दोस्ती होती है, कारोबारी काम पड़ता है, उन सब लोगों की एक-दूसरे से कुछ उम्मीदें बंधती हैं। ये उम्मीदें किसी जरूरत से जुड़ी हुई हों तो उनकी एक अलग अहमियत होती है, लेकिन जब ये उम्मीदें सिर्फ शिष्टाचार को लेकर जुड़ी हुई हों तो मामला कुछ दिक्कत का हो जाता है। 
मामूली जान-पहचान से ऊपर जब अधिक गहरे रिश्ते हों तो लोग यह उम्मीद भी करते हैं कि बड़े या छोटे सुख-दुख के मौकों पर वे एक-दूसरे के साथ आकर खड़े रहेंगे। यह उम्मीद या ऐसी जिम्मेदारी का अहसास बढ़ते-बढ़ते यहां तक पहुंच जाते हैं कि लोग एक गमी पर तीन बार जाते हैं और एक खुशी के मौके पर भी तीन-चार दावतों में जाते हैं, या उन्हें लोग बुलाकर उनका इंतजार करते हैं। लोग कहीं से गुजरते हुए रास्ते में पडऩे वाले दोस्तों और परिचितों से मिलने के लिए उनके घर-दफ्तर पर रूक जाते हैं, बिना फोन किए हुए। नतीजा यह होता है कि कुछ लोगों के जरूरी काम का हर्जा होने लगता है। 
कुछ परिचित अस्पताल में रहें, या घर पर बीमार रहें, कुछ लोग उन्हें देखने जाने, और फिर कमरे के भीतर जाकर बिस्तर तक पहुंच, मिजाजपुर्सी करने को जरूरी मान बैठते हैं, फिर चाहे इससे मरीज को और अधिक तकलीफ हो जाने का खतरा ही क्यों न हो। कुछ मरीज भी ऐसे होते हैं जो ऐसी उम्मीद करते हैं, और उनके घरवाले उनकी हड्डी जुडऩे तक के कुछ महीने आने-जाने वाले लोगों को झेलने में ही थक जाते हैं। 
अब सवाल यह है कि कुछ लोगों की शहरी और कामकाजी जरूरतों के चलते उनकी बेबसी के साथ-साथ उनसे कितने शिष्टाचार निभाने की उम्मीद की जाए? और जो लोग अपनी बेबसी से, या पसंद से बाकी लोगों के मुकाबले अधिक घंटे काम करते हैं, अधिक दिन काम करते हैं वे सामाजिक शिष्टाचार से किस तरह की रियायत के हकदार माने जाने चाहिए? फिर यह भी कि इलाज, अखबार जैसे कुछ किस्म के  पेशे ऐसे रहते हैं जिनमें वक्त की पाबंदी जरूरी होती है, ऐसे में अगर यार-दोस्त भी बिना फोन किए, बिना समय तय किए पहुंच जाएं तो उनसे कोई कितना रिश्ता निभा सकता है? 
मैं इसी अखबार में एक छोटे से कॉलम में कभी-कभी इन छोटी-छोटी बातों को लिखने की कोशिश करते रहता हूं, इसलिए कि अपनी अधिक काम करने की आदत के चलते बहुत से मौकों पर सामाजिक शिष्टाचार निभाना मुमकिन नहीं होता, और खासकर अपने काम के वक्त, अखबार को लेट करने की कीमत पर तो कभी भी नहीं होता। इसलिए मैं चारों तरफ यह बात लोगों को सुझाते भी रहता हूं कि आज की जिंदगी में वक्त तय करके ही कहीं जाना ठीक रहता है और मिसाल के लिए मैं खुद इस नसीहत पर सौ फीसदी अमल करने की कोशिश भी करता हूं। 
दरअसल यह जरूरी इसलिए भी है कि आपसी संबंधों के बावजूद हर किसी के लिए, हर वक्त, हर नौबत में, हर किसी की मौजूदगी में आपसे शिष्टाचार निभाने मुमकिन नहीं होता। और इस बात को लेकर मुंह में कुछ कड़वाहट घुले, इससे बेहतर है कि वक्त तय करके कहीं आना-जाना।
एक दूसरी बात जो खलती है, वह है लोगों को किसी भी तरह ही मुलाकात या मीटिंग के खत्म होने का अहसास नहीं होना। आज की भागमभाग के बीच यह बात बहुत जरूरी है कि हर मीटिंग के शुरू होने के वक्त के साथ-साथ उसके खत्म होने के वक्त को भी तय कर लिया जाए। बहुत से लोग तीन बजे तय मुलाकात पर चार बजे पहुंचते हैं और फिर बैठे ही रह जाते हैं। यह सिलसिला भी खतरनाक होता है क्योंकि दूसरे लोगों को इस मुलाकात या बैठक के बाद भी कुछ और काम हो सकता है। इसलिए तय समय पर पहुंचना बेहतर है, और वहां से रवानगी का वक्त भी पहले से तय कर लेना चाहिए। 
मुलाकात के ऐसे वक्त के बीच भी लोग इस बात को भूल जाते हैं कि मुलाकात का मकसद क्या है? वे काम की बात को बहुत आसानी से किनारे करके, किसी दिलचस्प बात को बोलने या सुनने में भिड़ जाते हैं, और जब मुलाकात खत्म होने लगती है तब वे काम की बात शुरू करते हैं, जिसका एक मतलब यह भी होता है कि वह मुलाकात उम्मीद से दुगुनी चले। उम्मीद से दुगुना किसी इश्तहार के लिए तो एक अच्छी लाईन हो सकती है लेकिन काम से लदे हुए किसी इंसान पर मुलाकात की दुगुनी लंबाई भारी पड़ सकती है। 
इसी तरह लोगों के न्यौते पर कहीं आना-जाना अगर मुमकिन न हो तो भी लोग रफ्तार से बुरा मानने पर आमादा हो जाते हैं। यह सिलसिला एक अलग किस्म का दबाव पैदा करता है जो कि सारे रिश्तों के लिए सारे समय सेहतमंद नहीं होता। बुरा मानने के बजाय लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि हर किसी के पास हर दावत में पहुंचने का वक्त, हर किस्म की नौबत के बीच नहीं निकल पाता। किसी की मौत के बाद के अंतिम संस्कार का वक्त और उसके बाद की शोक-सभा का वक्त, कई बार दिन के कामकाजी घंटों में ही रहता है। अब कुछ पेशेवर लोग, कुछ कारोबारी और कुछ नौकरीपेशा लोग, ऐसे वक्त पर इन जगहों पर नहीं पहुंच पाते। इसलिए दिन हो या रात, खुशी का मौका हो या गम का, लोगों को अपनी उम्मीदें कुछ काबू में रखने चाहिए। इसके बिना निराशा अधिक होती है। 
अपने आसपास कुछ बहुत शुभचिंतकों के परिवारों में भी कई बच्चों के जन्मदिन पर हर बरस होने वाली दावतों को लेकर आखिर में मैंने ही उन लोगों से अनुरोध किया कि इतना अधिक वक्त निकाल पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं होता है और इतनी अधिक दावतें खाना सेहत के लिए खतरनाक है, इसलिए मुझे बुलाना कम करें। कोई बुलाए और जाना न हो, तो वह बात भी अपनी ही छाती पर बोझ बनी बैठी रहती है।  
हो सकता है कि ऐसे न्यौतों और ऐसी उम्मीदों के पीछे एक बड़ी आबादी ऐसे लोगों की हो जो कि काम के बोझ से दबे हुए नहीं रहते, और वे किसी भी वक्त अपनी मर्जी का काम कर सकते हैं। लेकिन बेबसी, या अपनी पसंद से, काम से लदे रहने वाले लोगों के लिए यह कुछ दिक्कत की बात रहती है। 
निजी बातों से परे भी अगर देखें तो एक छोटे दायरे के लोगों के शिष्टाचार के ऐसे संबंध आमतौर पर किसी गंभीर मुद्दे पर गंभीर बातचीत को आगे नहीं बढ़ाते। एक-दूसरे से कुछ जाने और कुछ सीखने का मौका ऐसी तमाम मुलाकातों में बहुत कम इसलिए रहता है, क्योंकि उन्हीं लोगों से बार-बार, बार-बार मिलना होता है, उनसे भला कोई कितना नया सीख सकेंगे? इसलिए नये लोग, नये दायरे और नये मुद्दे ही समाज के लिए अधिक उत्पादक बातचीत वाले हो सकते हैं। बहुत करीबी लोगों के दायरे लोगों को अपने नरम बिस्तर की तरह आरामदेह तो लगते हैं, और नये लोगों से नये मुद्दों पर बातचीत एक नई पहाड़ी पर चलने की कसरत की तरह तकलीफदेह भी रहती है, लेकिन नई राह पर सफर कुछ अधिक फायदे का काम होता है।  यह भी तभी हो सकता है जब आसपास के महज शिष्टाचार के संबंधों के अलावा नये लोगों और नये मुद्दों पर बातचीत की गुंजाइश निकाली जाए।
इन दो बातों को जोड़कर देखें तो भी यह जरूरी होता है कि अपने खुद के भले के लिए, समाज के भले के लिए, महज-शिष्टाचार को घटाया जाए, वक्त का बेहतर इस्तेमाल किया जाए और कामकाज के मुद्दों पर बात की जाए। कुछ लोग जिंदगी का आनंद लेने की तरह एक सीमित दायरे के भीतर पूरी जिंदगी रोजाना कई घंटे गुजारने के आदी हो जाते हैं। यह सिलसिला निजी रिश्तों के लिए तो बेहतर हो सकता है, लेकिन क्या इससे दुनिया का भी कुछ भला होता है? 
इसलिए अपने और दूसरों के वक्त की कद्र करना सीखना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें