संपादकीय
4 जुलाई 2012
दिल्ली में उत्तरप्रदेश के लिए कटोरा लेकर खड़े हुए देश के सबसे नौजवान, और समाजवादी पार्टी के, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बिना किसी की मांग के खुद होकर यह मुनादी कर दी कि विधायक, विधानसभा विकास निधि से बीस लाख रूपये तक की गाड़ी ले सकेंगे। इसे लेकर उनकी पार्टी के अलावा तकरीबन हर पार्टी ने खुलकर इसका विरोध किया और उस कांगे्रस ने भी विरोध किया जो कि कल ही अपने राष्ट्रपति पद प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी के लिए वोट जुटाने लखनऊ में ही जुटी हुई थी। कुछ ही देर के भीतर खुद अखिलेश की पार्टी ने और मंत्रियों ने उनकी इस मुनादी की मरम्मत शुरू कर दी और यह कहा कि यह सिर्फ ऐसे विधायकों के लिए है जो कि बिना गाडिय़ों वाले हैं।
जो भी हो, हम इसकी बारीकियों में गए बिना इस मुद्दे और इस रूख पर चर्चा करना चाहते हैं। सरकार के पैसों से अगर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को सहूलियत दी जा रही है तो इसमें कोई नई बात नहीं है। देश की संसद में सांसद, और अखबारनवीस भी, शानदार खाना जिस दाम पर खाते हैं उतने में देश की जनता को एक समोसा-चाय भी नसीब नहीं हो सकते। दिल्ली में जब जनता पानी के टैंकरों पर मारपीट करती रहती है, तब एक-एक सांसद के घर टैंकर जाते हैं और मंत्रियों के बंगलों पर लॉन सींचे जाते हैं। अंगे्रज हुकूमत में इस गुलाम देश में यहां के लहू से जो महल खड़े किए थे, उनमें आज के निर्वाचित-सत्तारूढ़ लोग रहते हैं। यह पूरा सिलसिला सामंती तो हमेशा से चले आ रहा है और कल अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी का होने के बाद भी जो रूख दिखाया है वह इसी सामंती संस्कृति की एक कड़ी है। उनसे बहुत अधिक समझ की उम्मीद इसलिए भी नहीं की जा सकती थी क्योंकि उनका परिवार आज अनुपातहीन संपत्ति के मामले में सीबीआई के कटघरे में अदालत में खड़ा हुआ है और बहुत से लोगों का यह मानना है कि संसद में समर्थन की हर जरूरत के वक्त मुलायम की केंद्र सरकार को साथ देने की मजबूरी यही रहती है। लेकिन यह इस मामले को कुछ लंबी चर्चा में घसीटना होगा, इसलिए हम फिर से आज के मुद्दे पर लौटें।
पाठकों को याद होगा कि हमने बार-बार निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को अधिक तनख्वाह देने की वकालत की है। सार्वजनिक जीवन में जो लोग चुनाव लड़कर जिंदा रहते हैं उनके खर्चे सांसद या विधायक की तनख्वाह के मुकाबले काफी अधिक होते हैं। और वे अपने जिंदा रहने के लिए, परिवार चलाने के लिए या निर्वाचन क्षेत्र में काम करने के लिए अधिकतर मामलों में भ्रष्ट अफसरों, ठेकेदारों और कारोबारियों पर आश्रित रहते हैं। हम चुनाव लडऩे के लिए आम हो चुके कालेधन की बात अभी नहीं कर रहे क्योंकि उसकी तो हद वैसे भी नहीं है, और यह एक अलग बात है कि चुनावों के लिए भी सरकारी खर्च की बात लंबे समय से विचार-विमर्श में चल ही रही है। वैसे तो विधायकों को अगर सरकारी गाड़ी मिले तो हो सकता है कि वे इधर-उधर से यह सुविधा जुटाने के लिए मजबूर न हों, और इसके साथ-साथ अच्छी तनख्वाह भी मिले तो बहुत से विधायक और सांसद ईमानदार बने रहने की कोशिश भी करेंगे। यहां पर तीन-चार दिन पहले ही अखिलेश यादव का अपने मंत्रियों को भेजा गया यह पत्र भी याद रखना चाहिए जिसमें उन्होंने पांच हजार रूपये से अधिक दाम के तोहफे लेने से मंत्रियों को रोका है।
अब ऐसे में अखिलेश यादव की राय में दो खामियां हैं। पहली तो यह है कि उन्होंने यह रकम विधानसभा क्षेत्र विकास निधि से निकालने और गाड़ी खरीदने की बात कही है। दूसरी बात यह कि उन्होंने बीस लाख रूपये तक की गाड़ी की बात कही है। उत्तरप्रदेश देश के सबसे गरीब राज्यों में से है, लेकिन देश के सबसे अमीर राज्यों में भी गरीब विधायक बीस लाख की गाड़ी में नहीं चलते। अगर यह प्रस्ताव सचमुच ही उन विधायकों के लिए है जिनके पास आज गाडिय़ां नहीं हैं तो क्या एकदम से उन्हें बीस लाख की गाड़ी लगेगी? किसी को अपने विधानसभा क्षेत्र का दौरा करने के लिए इतनी बड़ी गाड़ी सरकार दे या ठेकेदार दे, ऐसे लोग गरीब आम जनता से कट ही जाएंगे। इससे करीब आधे दाम की गाड़ी कुछ बरस पहले जब छत्तीसगढ़ सरकार ने सभी जिला पंचायत अध्यक्षों को दी थी, तब भी हमने उस बड़ी सी गाड़ी के विकराल आकार और इतने खर्च के खिलाफ लिखा था। आज भी हमारा यही मानना है कि जनता के पैसों से अगर सुविधाएं किसी को देना है तो वे सुविधाएं कम से कम खर्च की होनी चाहिए, और उनका एक तर्कसंगत-न्यायसंगत आधार भी होना चाहिए।
आज के जमाने में जब किसी को भी अपने परिवार को चलाने के लिए, अपने पर मोहताज लोगों की आधुनिक शहरी जरूरतों को पूरा करने के लिए खासे खर्च की जरूरत पड़ती है, तब अगर चुनावी राजनीति में बेहतर लोगों को लाना है तो फिर उन पर बेहतर खर्च भी करना होगा। लोग जब जूते-चप्पलों पर भी अधिक खर्च करने लगे हैं तब सांसद या विधायक वे सस्ते में क्यों चाहते हैं? याद रखना चाहिए कि महंगा रोए एक बार, सस्ता रोए बार-बार। अनुपातहीन संपत्ति का मुकदमा झेल रहे मुलायम सिंह का बेटा होने की वजह से अखिलेश यादव से बीस लाख रूपये की बात एक चूक से निकल गई होगी क्योंकि हो सकता है कि इतने लंबे समय से इससे कम दाम की गाड़ी में बैठे न हों। हमारा मानना है कि एक वक्त नेता जीप में चलने को बड़ी बात मानते थे, आज आज भी अगर जनता के पैसों से उनको गाड़ी मिलनी है तो इसी किस्म की कोई साधारण गाड़ी मिलनी चाहिए। अखिलेश यादव की राय को हम सही मानते हैं, बस इस पर खर्च क्षेत्रीय विकास की राशि से नहीं निकलना चाहिए और पांच-सात लाख रूपये से अधिक की गाड़ी नहीं होनी चाहिए। उनकी पार्टी ने यह साफ कर ही दिया है कि यह सिर्फ उन्हीं के लिए है जिनके पास गाड़ी नहीं है, इसलिए हम उसे भी एक शर्त मानते हुए ही इस राय को सही मान रहे हैं। निर्वाचित नेता सस्ते नहीं ढूंढने चाहिए, एम्बुलेंस, दमकल और पुलिस की गाडिय़ों की टंकियां अगर ईंधन से भरी नहीं रहेंगी, तो मुसीबत और जरूरत के वक्त वे काम भी नहीं आएंगी।

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