20 जुलाई 2012
संपादकीय
हिंदुस्तानी मीडिया के हाथ से राष्ट्रपति चुनाव के तोते उड़े ही थे कि राजेश खन्ना ने गुजरकर सबको काम दे दिया। लेकिन अंतिम संस्कार के साथ कुछ घंटों में समाचार चैनलों की टीआरपी को घटना ही था, उस वक्त राहुल गांधी के एक बयान को मीडिया ने इतना महत्वपूर्ण बना दिया, जितना महत्वपूर्ण शायद कांगे्रस पार्टी के भीतर भी किसी ने उसे नहीं लिया होगा। राहुल ने कल कहा कि वे पार्टी और सरकार में अब अधिक सक्रियता के लिए तैयार हैं और नई या बड़ी भूमिका निभाने के लिए भी। इसे लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अटकलों का सैलाब सा आ गया और हर चैनल के स्टूडियो विश्लेषकों से लबालब हो गए।
अब अगर इस बयान के मतलब और वजन को मीडिया की भूख से परे देखें और समझें, तो इसमें इस कदर बावला हो जाने जैसा कुछ नहीं था। एक ही दिन पहले सोनिया गांधी ने कहा था कि राहुल गांधी अपनी भूमिका खुद तय करेंगे। अब इस बयान से परे अगर सोचें, तो कांगे्रस पार्टी के हमेशा से चले आ रहे पारिवारिक ढांचे में नेहरू-गांधी परिवार के लोगों की भूमिका कोई पार्टी तो तय करती नहीं, वे खुद ही तय करते हैं। या संजय और राजीव के लिए इंदिरा ने कुछ तय किया था, कुछ इन लोगों का खुद का तय किया हुआ था। सोनिया गांधी की राजनीतिक पारी खुद उन्होंने तय की, और राहुल गांधी की राजनीति और सरकार में उनकी अब तक शुरू न हुई पारी भी घर के भीतर ही तय करने की बात रही। सोनिया गांधी के इस बयान को उत्तरप्रदेश चुनाव के दौरान प्रियंका गांधी और उनके पति राबर्ट वढेरा के उस बयान के साथ देखने की जरूरत है जिसमें उन्होंने यह कहा था कि राहुल खुद यह तय करेंगे कि उन्हें कब पार्टी या सरकार में क्या करना है। इस परिवार के बयान चाहे कितने ही कुनबापरस्त लगें, सामंती लगें, ये बयान सच हैं और खुलकर हकीकत को बयां करते हैं। अब इस परिवार के बारे में कांगे्रस के कोई पदाधिकारी या प्रधानमंत्री क्या खाकर कुछ तय करेंगे? जिस परिवार की शोहरत और जिसके असर पर यह पार्टी एक परजीवी प्राणी की तरह जीती है, और जिसके बिना इस पार्टी को अपने किसी भविष्य की कल्पना भी नहीं हो सकती, न तो उस परिवार के बारे में तय करने का इस पार्टी में और किसी को कोई हक है, और न ही पार्टी को अपने खुद के बारे में कुछ तय करने का हक है। दरअसल इस कुनबे के राज से बाहर निकल जाने के बाद पी.वी. नरसिंह राव के राज में पार्टी और उसकी सरकार ने जो दुर्गति पाई थी, उसके बाद से कांंगे्रस ने सोनिया परिवार की पीठ पर सवार होकर ही चुनावी-वैतरणी पार करना मुमकिन पाया था। इसलिए इस पार्टी की व्यवस्था को कुनबापरस्त कहें, या चुनावी समझ वाला कहें, यह परिवार तो शायद पार्टी के बिना किसी तरह जी लेगा, यह पार्टी इस परिवार के बिना शायद कहीं की नहीं रहेगी। कांगे्रस ने नेहरू-गांधी परिवार के बिना सीधे खड़े हो पाने की ताकत जमाने पहले खो दी है, और हम इस परिवार और पार्टी की कुनबापरस्ती के बारे में चाहे जो कहें, इसके बिना पार्टी का कोई अस्तित्व भी नहीं दिखता।
ऐसे में राहुल के एक बयान को लेकर मीडिया गिने-चुने शब्दों के इतने अधिक मतलब निकाल रहा है, इतने दूर तक की बहस कर रहा है, जितना कि हकीकत में मतलब नहीं निकल रहा है। लेकिन इस मुद्दे पर आज लिखते हुए हम उस एक पहलू की बात करना चाहते हैं जो मीडिया में नहीं उठ रहा है, वह यह कि आज ऐसी कौन सी भूमिका है जो कि पार्टी और सरकार में राहुल गांधी से परे है? संगठन को लेकर, नीतियों को लेकर और सरकार के कार्यक्रमों को लेकर यूपीए गठबंधन और कांगे्रस पार्टी के भीतर जहां-जहां सोनिया-राहुल जैसा चाहते हैं, वैसा ही होता है। गठबंधन का जो हिस्सा कांगे्रस के ही काबू से परे है, वहीं पर इन मां-बेटे की नहीं चलती, बाकी तो सब कुछ वैसे भी इन्हीं के हिसाब से चलते आया है और चलते रहेगा। इसलिए राहुल गांधी का यह कहना कि वे और अधिक जिम्मेदारी के लिए, और अधिक सक्रिय हिस्सेदारी के लिए तैयार हैं, और वक्त का फैसला पार्टी या सरकार के नेता करेंगे, एक बेमतलब की बात है जिसका बहुत अधिक मतलब वह मीडिया निकाल रहा है जिसके पास राजेश खन्ना के अंतिम संस्कार के बाद एक सूनापन छाया हुआ था। यह बहस टीवी समाचारों पर कुछ उसी तरह की दिखती है कि एनडीटीवी यह कहे कि अब खबरों को तय करने में उसके संचालक प्रणव राय की अधिक सुनी जाएगी, या टाईम्स नाऊ यह कहे कि अब उसके संपादक अर्नब गोस्वामी बहस के मुद्दे अधिक तय करेंगे।
जो घर की बातें रहती हैं, उनमें घर के सबसे अधिकार संपन्न सदस्य के बारे में अधिक अटकलबाजी की जरूरत नहीं रहती, और वही नौबत कांगे्रस पार्टी या सरकार में उसके हिस्से के भीतर सोनिया-राहुल की है। न सिर्फ कांगे्रस बल्कि आज देश भर में अनगिनत राजनीतिक दलों में कुनबापरस्ती की जो हालत है, उसे देखते हुए अब कांगे्रस की कुनबापरस्ती को हम अलग से, अधिक, कोसना नहीं चाहते। जब लोहियावादी लोगों को अपने कुनबे से परे कुछ नहीं दिख रहा है तब नेहरू-गांधी परिवार की मिसाल इस सिलसिले में कैसे दी जा सकती है। लेकिन इसके साथ-साथ आज की यह चर्चा उस मुद्दे पर पहुंचना ही चाहिए कि राहुल गांधी की एक अधिक हिस्सेदारी आखिर क्या मायने रखेगी? आखिर पिछले कुछ हफ्तों से दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद जैसे लोग राहुल का झंडा उठाकर क्यों घूम रहे हैं? और क्या राहुल गांधी मनमोहन सिंह सरकार की किसी नाकामयाबी की वजह से सामने लाए जा रहे हैं? ऐसे बहुत से मामले हैं जिनको लेकर अटकल चल रही है। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि किसी भी पार्टी को अपना अगला नेता, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री पद का अगला उम्मीदवार तय करने का हक होता है जैसा कि देश में हर राजनीतिक परिवार में समय-समय पर किया है। इसलिए चुनावी रणनीति के रूप में या कांगे्रस संगठन के भीतर सत्ता के हस्तांतरण के लिए अगर ऐसी कोई ताजपोशी होती भी है तो वह राहुल गांधी के ऐसे किसी बयान पर टिकी हुई नहीं रहेगी।
कांगे्रस पार्टी बहुत लंबे समय से एक धर्मालु की तरह चल रही है और उसे अपने देवी-देवता तय करते हुए किसी को अधिक जवाब देने की जरूरत नहीं है। और यह एक बेहतर नौबत रहेगी जब राहुल गांधी या कोई भी और अधिकार संपन्न नेता, औपचारिक रूप से सरकार या संगठन में जवाबदेह भी रहे। अधिक जिम्मेदारी का मतलब अधिक जवाबदेही भी होगा, और वह एक अधिक लोकतांत्रिक नौबत रहेगी। पीछे की सीट पर बैठकर कार चलाने से बेहतर होगा कि लाइसेंस लेकर कोई नेता अच्छी और बुरी ड्राइविंग के लिए जिम्मेदारी भी रहे।

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