यह पानी में डूबना नहीं है, यह कचरे में डूबना है...


21 जुलाई 2012
संपादकीय
आज जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर बारिश के पानी से चारों तरफ से घिर गई है, अनगिनत बस्तियों में घरों में पानी घुस चुका है और नौबत यह है कि लोगों को रस्सी पकड़कर सड़क पार करनी पड़ रही है तो यह मौका कुछ आत्ममंथन के लिए सही है। आने वाले दिनों में ऐसे और भी दिन होंगे जब लोग पानी की वजह से घर से नहीं निकल सकेंगे और उनके पास सोचने का समय रहेगा। 
जब सड़कों से परे बस्तियां भी पानी में डूबी हैं, तो सबसे गरीब लोगों की बस्तियां सबसे पहले डूबती हैं, इसलिए कि उन पूरी बस्तियों को ऊंचा करने की लागत कौन उठाए? हालत यह है कि कुछ बरस पहले बनी छत्तीसगढ़ हाऊसिंग बोर्ड की भी एक कॉलोनी शहर और विधानसभा के बीचोंबीच लगातार हर बरस डूबती है, और शायद उसका कोई इलाज दिखता भी नहीं है। यह एक कॉलोनी तो योजना की गड़बड़ी की वजह से है, लेकिन चारों तरफ जो पानी जमा है उसके पीछे सरकार की योजना की गड़बड़ी के साथ-साथ शहर में लोगों में सफाई की समझ की कमी भी है। एक तरफ जब स्थानीय शासन का काम निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर डालकर लोकतंत्र को नीचे तक पहुंचाने की कोशिश होती है, तब स्थानीय जनप्रतिनिधि अगर अपना जिम्मा ठीक से पूरा नहीं करते तो उससे न सिर्फ शहर डूबता है बल्कि निर्वाचित लोकतंत्र की साख भी डूब जाती है। सरकार के खिलाफ तो हमेशा ही लिखा जा सकता है, लेकिन साथ-साथ यह भी सोचने की जरूरत है कि पानी बहाकर ले जाने के लिए बनी नालियों की जब सफाई होती है तो हर पचास कदम पर उन नालियों से इतना कूड़ा निकलता है कि जगह-जगह घूरा बन गया दिखता है। इतने कचरे को नालियों में डालने वाले लोग डूबने के ही हकदार रहते हैं। और वही हो भी रहा है।
कई बरस हुए, राज्य सरकार ने पॉलीथीन पर तरह-तरह की रोक की मुनादी की, लेकिन न तो उसका कोई असर हुआ, न सरकार ने कोई कार्रवाई की और न ही पॉलीथीन के विकल्प पेश किए गए। नतीजा वही हुआ जो बरसों पहले मुंबई में हुआ जब दो-दो दिन तक लोग घर नहीं लौट पाए थे। आज छत्तीसगढ़ की राजधानी में पानी निकलने की गुंजाइश अगर नहीं बची है तो इसके पीछे इस किस्म का कचरा भी जो कि न घुलता है और न ही बहता है। वह जगह-जगह जमकर हजारों बरस के लिए बोझ बन जाता है। बरसों से यह बात भी चल रही है कि म्युनिसिपल ठोस कचरे के निबटारे के लिए बड़ी योजना बनाने जा रही है। लेकिन कचरे से भी कमाने की नीयत है, या फिर स्थानीय संस्था और सरकार के बीच राजनीतिक टकराव का नतीजा है, कचरे का निबटारा हो ही नहीं पा रहा है। शहरी जिंदगी में कचरा पैदा करना बढ़ते चल रहा है और उसे ठिकाने लगाने की कोई योजना नहीं है। 
हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने इसके पहले एक-दो बार लिखा है कि इस राज्य में सामानों की पैकिंग पर इस हिसाब से टैक्स लगाना चाहिए कि उनमें कागज, प्लास्टिक, कांच, धातु और पॉलीथीन का कितना-कितना इस्तेमाल हुआ है। इस पूरी पैकिंग पर एक कचरा-टैक्स लगाना चाहिए और आज के संगठित महंगे सामानों के जमाने में यह काम बड़ी दुकानों से आसानी से शुरू हो सकता है। इससे गरीबों के सामान पर अधिक असर नहीं होगा, और गैरजरूरी महंगी पैकिंग वाले महंगे सामान कचरे के बोझ पर टैक्स देंगे। इससे पर्यावरण को लेकर और कचरे को लेकर लोगों में जागरूकता भी आएगी। 
आज जो पानी जमा है, वह म्युनिसिपल और राज्य सरकार के विभागों की मिली-जुली जिम्मेदारी है, और शहर की जनता की जिम्मेदारी भी है। अगर लोग रोजाना पूरे  वक्त नालियों को कचरे से पाटते रहेंगे तो कोई भी सरकार न तो उन नालियों को साफ कर सकेगी, और न ही बारिश के पानी को रफ्तार से निकाल सकेगी। हमारा तो यह मानना है कि कचरे के नाम पर सरकारी कुर्सियों पर बैठे लोगों को कमाने का मौका ही क्यों दिया जाए? वह पैसा भी तो आखिर जनता की जेब से ही जाएगा। उसके बजाय लोगों को जागरूक कर अपने कचरे का निबटारा ठीक से करना चाहिए, और उसके भी पहले कचरा पैदा करने में कमी करनी चाहिए। एक वक्त किसी समझदार ने यह कहा भी था कि कोई भी समाज उतना ही अच्छा होता है जितना कम कचरा वह पैदा करता है। 

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