खाट बिछे नहीं, खड़ी हो


संपादकीय
3 जुलाई 2012
कई बार टेलीविजन समाचार चैनलों पर आई हुई खबरें जब घंटों या कई दिनों तक छाई रहती हैं, तो उनके बारे में इस जगह पर लिखना भी सूझता है। अभी भी कुछ ऐसा ही हो रहा है, रेलवे रिजर्वेशन में दलालों का बोलबाला और रेलवे कर्मचारियों का खुला और संगठित भ्रष्टाचार हमारे सरीखे लोग अपने बचपन से ही देखते आ रहे हैं, लेकिन अब कम्प्यूटर और इंटरनेट के जमाने में हाईटेक जालसाजी हो रही है। देश भर के स्टेशनों पर कतारों में खड़े हुए, या इंटरनेट पर रिजर्वेशन की कोशिश कर रहे लोगों के हक छीनकर दलाल और जालसाज सीटों पर कब्जा कर रहे हैं और कतारें बेमतलब हो गई हैं। आज सुबह एक टीवी चैनल पर देश की राजधानी दिल्ली के रेलवे स्टेशन का नजारा दिखाया जा रहा था जहां पर पिछली रात से कतार में लगने के लिए भारी बदन और गरीबी वाली दिखती एक महिला एक खाट लेकर आई थी और पूरी रात उसके लिए जमीन पर बैठना मुमकिन नहीं था इसलिए वह खाट पर ही बैठी, लेटी कतार में थी। उसके साथ कुछ और महिलाएं भी जिनमें से कुछ पिछले कुछ दिनों से पूरी रात कतार में गुजार रही थीं। 
जो देश 21वीं सदी का विकसित देश होने का दावा करता है, जिसे अंतरिक्ष में उपग्रह पहुंचाए चौथाई सदी से अधिक हो चुके हैं, वह अगर अपनी आबादी के एक हिस्से को इस तरह आए दिन कभी रेल टिकट की कतार में तो कभी गैस सिलेंडर की कतार में, और कई-कई दिन सरकारी अस्पतालों में एक साधारण ईसीजी या सीटी स्कैन की कतार में पड़े रहने को बेबस करता है, तो यह कैसा विकास है? जो ममता बैनर्जी रेल मंत्रालय के पीछे बावली सी होकर उसे अपनी निजी मिल्कियत मानती है और रेलगाड़ी को एक पालतू इल्ली की तरह अपने दरवाजे बांधी चली आ रही है, उसे इस मंत्रालय को सुधारने की कोई फिक्र नहीं है। ममता बैनर्जी के उम्र की महिला जो कि गरीबों के अंदाज में जीती है, गरीबों के हक की बात करती है, उसने रेल मंत्रालय के अपने पूरे कार्यकाल में गरीब मुसाफिरों की तकलीफों को कम करने के लिए क्या किया है और क्या नहीं, यह स्टेशनों पर लगी कतारों में उजागर है। ममता बैनर्जी अपनी अहंकारी राजनीति की तानाशाही को चलाने के लिए केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री को आंखें दिखाते हुए अपने संसदीय बाहुबल से रात-दिन ब्लैकमेलिंग तो करती है, लेकिन रेल के भ्रष्टाचार को और रेल की नाकामयाबी को अपने तेवर वे नहीं दिखा पाईं। यह भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की फटेहाली है कि जिस मंत्रालय में जमीन के स्तर पर खूब खून-पसीना एक करके काम करने की जरूरत होती है, उस मंत्रालय में ममता बैनर्जी और उनके घरेलू काम वालों सरीखे मंत्री ऐसी आसमानी बददिमागी दिखाते हैं कि प्रधानमंत्री के कहने पर भी रेल-दुर्घटना देखने नहीं जाते। ममता बैनर्जी, और उनके सरीखे बाकी कुछ नेता भी अगर यह सोचते हैं कि उनकी बदतमीजी उनको कोई अच्छी शोहरत दिला रही है, तो अगला चुनाव बंगाल में यह दिखा देगा कि लोग उनकी बददिमागी से किस कदर थक चुके हैं, उनके कामकाज के पहले ही साल में।
खैर यह तो बंदूक की नोंक पर बेबस यूपीए सरकार का हाल है कि ममता बैनर्जी के नाम लिख दी गई जागीर में प्रधानमंत्री भी दखल नहीं दे सकते, लेकिन यही हाल देश में कदम-कदम पर लगने वाली दूसरी कतारों का है जिसके लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, स्थानीय संस्थाएं और सार्वजनिक उपक्रम सभी जिम्मेदार हैं। एक इंसान के वक्त के इतना फिजूल का मान लिया गया है कि किसी भी जगह लोगों की कतार लगवा दी जाती है और दिन-दिन भर लोग पहले एक कागज लेने के लिए, और फिर उसे जमा करने के लिए ठंड या धूप में कतारों में खड़े रहते हैं। यह एक शर्मनाक हालत है, और यह लोगों के मानवाधिकार को कुचलना भी है। जो गरीब या मध्यम वर्गीय लोग इन कतारों में लगते हैं उनका अपना वक्त, अपनी रोजी-रोटी कमाने के काम आता है। कतारों में उस वक्त को बर्बाद करने वाली सरकारों और सरकारी एजेंसियों को यह अंदाज लगाना चाहिए कि इससे लोगों का कितना नुकसान हो रहा है। सरकारी कामकाज में सुधार के लिए बहुत जगहों से सीखा जा सकता है। आज दुनिया के बहुत से समझदार देश लोगों से जो सरकारी फार्म भरवाते हैं, उनमें यह अंदाज भी छपा होता है कि उसे भरने में औसतन कितना वक्त लगेगा। भारत में आज सरकारी दफ्तर गैरजरूरी जानकारी, गैरजरूरी सुबूत और गैरजरूरी कागजात मांगने के शौकीन हैं, और फिर चाहे यह रद्दी हर महीने ट्रक में भरकर बेच दी जाए।
प्रशासनिक सुधार, सरकारी कामकाज को लोगों के लिए दोस्ताना बनाना, यह अगर आज के इंटरनेट और कम्प्यूटर के जमाने में भी दुनिया के सबसे बड़े कम्प्यूटर-शिक्षित देश में नहीं हो सकता तो इसके पीछे सिर्फ यही एक वजह है कि सरकार चला रहे लोगों की ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार में दिलचस्पी है। सरकारी काम अगर आसान होने लगे तो सरकारी कुर्सियों को कमाई कहां से होगी? इसलिए काम को अधिक से अधिक मुश्किल बनाया जाए, गैरजरूरी जानकारी मांगी जाए, कतार लगवाई जाए, और फिर कतारों के इर्दगिर्द अपने दलाल छोड़ दिए जाएं। इन सबसे जो नौबत आ खड़ी हुई है, वह देश की राजधानी के रेलवे रिजर्वेशन की कतार में लगी खाट पर दिखती है। जिस सरकार को लोगों की इतनी भी फिक्र न हो, उसके काउंटरों पर कतार में खाट नहीं लगनी चाहिए, उस सरकार की खाट खड़ी होनी चाहिए।

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