संपादकीय
2 जुलाई 2012
छत्तीसगढ़ के नक्सल कब्जे वाले इलाके में राज्य और केंद्र के सुरक्षा कर्मचारियों की एक कार्रवाई में बस्तर के करीब डेढ़ दर्जन आदिवासी मारे गए हैं। राज्य की पुलिस का कहना है कि इनमें कोई बेकसूर नहीं है और ये लोग नक्सली ही हैं। नक्सलियों के हिमायती सामाजिक कार्यकर्ता, मीडिया के कुछ जानकार लोग और राज्य में विपक्षी दल कांगे्रस पार्टी के लोगों का कहना है कि ये बेकसूर ग्रामीण हैं जिनको सुरक्षा कर्मचारियों ने मार डाला। जो केंद्रीय सुरक्षा बल, सीआरपीएफ, इस कार्रवाई के पीछे था उसने इस घटना की जांच के आदेश दिए हैं। कांगे्रस पार्टी की टीम जांच करके आ चुकी है और उसने मरने वालों को बेकसूर पाया है और अब वह केंद्र सरकार में अपनी पार्टी के मंत्री, गृह मंत्री चिदंबरम से यह कहने जा रही है कि वे मौतों वाले परिवारों से बात करने के पहले दिल्ली में बैठे बयान न दें।
यह मामला अधिक जांच के लायक दिखता है। इतने लोगों का इस तरह की स्थिति में सभी का नक्सली होना गले नहीं उतर रहा है। और दूसरी तरफ दुनिया का इतिहास यह बताता है कि जब किसी इलाके में लंबे समय तक बंदूकें थामे हुए लोग अपनी जान पर खतरे के बीच जीते हैं, तो उनसे कई बार ऐसी गलतियां हो जाती हैं। इस मामले में मरने वाले कौन थे और यह घटना सीआरपीएफ की लापरवाही से हुई या उत्तेजना में हुई या फिर किसी गलतफहमी में हुई और या फिर सच में ही मारे जाने वाले लोग नक्सली थे? पूरे का पूरा मामला इसलिए सही नहीं लग रहा है क्योंकि मरने वाले लोगों में बच्चे भी हैं और निहत्थे लोग भी। यह याद रखने की जरूरत है कि नक्सल कब्जे वाले इलाके में जी रहे आदिवासियों के हक खत्म से हो चुके हैं, और अगर किसी गलती या लापरवाही से थोक में इतने बेकसूर लोगों को मार दिया गया है तो इसकी ईमानदारी से बारीक जांच होनी चाहिए और अगर सुरक्षा कर्मचारी कुसूरवार पाए जाते हैं तो उन पर कार्रवाई भी होनी चाहिए।
लेकिन इस बीच खबरों में यह आ रहा है कि कुछ लाशों को गोलियां लगने के अलावा उन पर कुल्हाड़ी से किए गए वार भी हैं और किसी का गला भी रेता गया है। अगर यह बात सच भी है, तो भी हमें इसके लिए सुरक्षा कर्मचारियों के बजाय नक्सलियों पर ही अधिक शक होगा क्योंकि गला रेतने का काम आए दिन वे ही बस्तर के बेजुबान लोगों के साथ करते हैं। पुलिस का मुखबिर होने का आरोप लगाते हुए, एक जनसुनवाई का दिखावा करते हुए वे जिसका चाहे उसका गला रेत देते हैं और फिर इसे मौत की सजा कहते हुए खुद ही बयान भी जारी करते हैं। नक्सली और उनके हिमायती लाशों पर ऐसे जख्मों को लेकर किस तरह का प्रचार दुनिया भर में कर सकते हैं, यह सबको मालूम है। इसलिए ऐसी भयानक हरकत के पीछे हमें नक्सलियों का हाथ ही लगता है, सुरक्षा कर्मचारी शायद ऐसी दरिंदगी नहीं दिखाते।
इस मामले को हम राज्य सरकार की पुलिस या केंद्र सरकार की सीआरपीएफ को कुसूरवार ठहराने के बजाय सरकारों को अपनी एजेंसियों के काम के तरीकों का अंदाज लगाने के लायक देख रहे हैं। इतनी बड़ी कार्रवाई, इतनी अधिक मौतें, बिना बाहरी जांच के टाली नहीं जा सकती। सीआरपीएफ ने अपने कमांडेंट से जांच की घोषणा की है, ऐसी जांच का कोई मतलब नहीं है। इसके लिए किसी न्यायिक जांच की जरूरत है, क्योंकि अगर नक्सल इलाकों में किसी भी वजह से बेकसूर मारे जाएंगे तो उन इलाकों में सरकार हमेशा के लिए हमदर्दी खो बैठेगी, और नक्सलियों के पैर अधिक मजबूती से जम जाएंगे। यह मामला कांगे्रस और भाजपा के बीच, केंद्र और राज्य के बीच आरोपों का सामान नहीं बनना चाहिए और इसे आत्मपरीक्षण का मौकों मानते हुए राज्य सरकार को एक न्यायिक जांच की घोषणा करनी चाहिए। अगर केंद्र या राज्य कहीं के भी सुरक्षा कर्मचारी इतनी बड़ी गलती कर बैठे हैं या इतना गलत काम उन्होंने किया है, तो इन एजेंसियों के कामकाज को सुधारने का यह मौका है। अगर लोग कुसूरवार हैं तो इन मौतों को नक्सलियों के इलाके में संभव साधारण चूक मानना बहुत ही अलोकतांत्रिक, अमानवीय और गैरजिम्मेदारी का काम होगा। जिम्मेदारी और सच को तय करने के लिए एक न्यायिक जांच से कम किसी चीज से काम नहीं चलेगा।

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