संपादकीय
10 जुलाई 2012
उत्तरप्रदेश की खबर है कि सरकार के एक जिला अस्पताल में चतुर्थ वर्ग के सफाई कर्मचारी घायलों के जख्मों पर टांके लगा रहे हैं। यूं तो सफाई कर्मचारी का काम कम महत्व का नहीं होता, लेकिन डॉक्टर का काम तो डॉक्टर को ही करना चाहिए। इधर छत्तीसगढ़ लगातार सरकारी और निजी अस्पतालों की मनमानी की खबरों से पटा हुआ है। सरकारी नेत्र शिविरों में लोग जगह-जगह आंखें खोने के बाद आज कम से कम इस तकलीफदेह खबर को पढऩे से बच गए हैं कि बड़ी-बड़ी करोड़पति निजी अस्पतालों ने मरीजों के स्वास्थ्य बीमा कार्ड से रकम लूटने के लिए अच्छी भली सेहतमंद, कमउम्र की महिलाओं के गर्भाशय निकालकर फेंक दिए। आंखों के जो ऑपरेशन नहीं किए, उनकी फीस उनके बीमा कार्ड से निकाल ली। छत्तीसगढ़ इतने बरसों से स्वास्थ्य विभाग का भ्रष्टाचार देखते आ रहा है, कि वह देखते ही बनता है। जो राज्य सरकार एक तरफ राशन के मामले में पूरी दुनिया में वाहवाही पाती है, वह सरकार दूसरे कई मोर्चों पर इतनी बदहाल क्यों है? और राज्य के मुख्यमंत्री एक डॉक्टर रहते हुए भी एक के बाद दूसरे स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य सचिव न तो इस विभाग के भ्रष्टाचार को घटा पा रहे, न ही मरीजों को किसी तरह की राहत दे पा रहे। जब राजधानी के सरकारी अस्पतालों में बरसों तक मशीनें खरीदी नहीं जा पातीं, खरीदी हुई मशीनें लग नहीं पातीं, लगी हुई मशीनें चलती नहीं हैं, तो यह लगता है कि यह नौबत बेहतर है, या कुछ बरस पहले की वह नौबत बेहतर थी जिसमें करोड़ों की नकली मशीनें खरीद ली गईं, और उसके कुसूरवार अब तक मजे में सरकार और कारोबार चला रहे हैं? इनमें से किसको बेहतर हालत मानें?
सेहत को लेकर इस राज्य में, और शायद देश के बाकी राज्यों में भी हालत इतनी खराब इसलिए है क्योंकि सरकार चला रहे लोग अपने लिए बड़ी-बड़ी निजी अस्पतालों में जाने की मंजूरी भी सरकारी बजट में रख लेते हैं। फिर सरकार के अस्पतालों में इन बड़े लोगों के लिए अलग से इंतजाम हो जाता है। जहां पर ताकतवर तबका अपना इंतजाम अलग से कर लेता है, वहां पर आम जनता आम नहीं रह जाती, वह फेंकी हुई गुठली की तरह अस्पतालों के बरामदों में कई-कई दिनों तक एक मामूली जांच की कतार में फर्श पर बिखरी रहती है। राजधानी रायपुर में ही हम यह देखते हैं कि जिस मेडिकल कॉलेज अस्पताल के सामने से रोज प्रदेश के दर्जनों मंत्री-आला अफसर सायरन बजाते गुजरते हैं, उस अस्पताल के भीतर गरीब का हाल इतना खराब दिखता है कि वह घर-बार बेचकर निजी अस्पताल की तरफ जाने को बेबस हो जाए। हम इसे निजी कारोबार को बढ़ाने की एक सीधी-सीधी साजिश तो अभी नहीं कहेंगे लेकिन निजी और महंगे अस्पतालों वाला तबका जब सरकारी फैसले लेने वालों का हो जाता है, तो अपने वर्गहित में ऐसे सरकारी फैसले लिए जाते हैं जिनसे कि निजी कारोबार आगे बढ़े, और सरकारी जनसुविधाओं का हाल जो होना है वह हो जाए।
जब वीआईपी कहे जाने वाले तबके को अपने पीने के लिए बाजार से खरीदे बोतलबंद पानी से कम कुछ मंजूर नहीं होता, तो नल के पानी की गंदगी खत्म होने का आसार खत्म हो जाता है। इसी तरह जब सरकारी अस्पतालों के बजाय सत्तारूढ़ नेता और अफसर निजी अस्पतालों में जाने के लिए सरकारी खर्च पाने लगते हैं तो फिर सरकारी अस्पतालों को कौन सुधारे, और क्यों सुधारे? दरअसल कोई भी अदालत इस पहलू पर नजर इसलिए नहीं डालती क्योंकि जज भी इसी सुविधाभोगी तबके के हो गए हैं, मीडिया का अपना कारोबार भी बड़े अस्पतालों के इश्तहारों से जुड़ गया है और उसके पास अपने इलाज के लिए महंगे अस्पताल तक जाने की सहूलियत भी हो गई है। एक वक्त रूस की क्रांति के संदर्भ में वर्गसंघर्ष और सर्वहारा वर्ग जैसे जो शब्द इस्तेमाल होते थे, वैसे शब्द आज भारत में सरकारी जनसुविधाओं के हाल और निजीकरण को लेकर याद पड़ते हैं। बात सिर्फ इलाज की नहीं है, पानी की नहीं है, आज जब सत्ता-संतानों को महंगे निजी स्कूल और कॉलेज हासिल हैं, तो जाहिर है कि सरकारी स्कूल और कॉलेज इस तरह ही चलेंगे कि कारोबार निजी दूकानों का ही चले। लेकिन आर्थिक उदारीकरण के नाम पर देश में एक ऐसा माहौल बना है कि सबसे गरीब की सबसे अधिक अनदेखी को, उसकी बेबसी को आर्थिक उदारीकरण मान लिया गया है। जैसे-जैसे सत्ता की सुविधाएं बढ़ रही हैं, संसद और विधानसभाओं में करोड़पति और अरबपति बढ़ रहे हैं, लोकतंत्र के बाकी पायों की संपन्नता बढ़ रही है, गरीबों के मुद्दे अब अनसुने ही रहते चले जाएंगे।

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