क्रिकेट होना चाहिए


17 जुलाई 2012
संपादकीय
भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट सिरीज की घोषणा पर जैसी उम्मीद थी, वैसी ही प्रतिक्रियाएं आई हैं। कांगे्रस ने इसका स्वागत किया है, भाजपा ने इसका विरोध किया है, और शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के निजी मित्र सुनील गावस्कर ने इसका विरोध किया है। यह मुद्दा एक अच्छी बहस के लायक है और इंटरनेट पर यह बहस छिड़ भी गई है। क्रिकेट पे्रमी इसमें कोई बुराई नहीं देखते हैं, और दूसरी तरफ हिंदुस्तान में बहुत से लोगों को यह लगता है कि मुंबई पर आतंकी हमले का मामला अब तक सुलझा नहीं है, पाकिस्तान के तेवर बदले नहीं हैं, उसकी तरफ से खतरा घटा नहीं है, तो ऐसे में उसके साथ क्रिकेट क्यों खेलना चाहिए।
हमारा यह मानना है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान, इन दोनों ही देशों में जब आपसी रिश्तों की बात आती है तो सरकारों का रूख अलग होता है, जनता का रूख अलग होता है। आज भी एक तरफ जब सरहद पर तनाव बना हुआ है और इन दोनों देशों के बीच बातचीत का कोई नतीजा निकलते नहीं दिख रहा है तब सरहद के दोनों तरफ हजारों गैरसरकारी, गैरराजनीतिक, गैरफौजी लोग ऐसे हैं जो कि लगातार अमन की कोशिश में लगे हुए हैं। इन लोगों में लेखक हैं, पत्रकार हैं, कलाकार हैं और दूसरे बहुत से तबकों के लोग हैं। हम क्रिकेट को ऐसा ही एक तबका गिनते हैं जिसमें यह दमखम है कि दोनों देशों को कड़े मुकाबले के साथ-साथ, साथ-साथ खड़ा भी कर सकता है। यह बात सही है कि भारत पर बहुत से आतंकी हमलों के पीछे पाकिस्तान की जमीन पर बसे हुए लोगों का हाथ साबित हुआ है, और पाकिस्तान की कुछ कट्टर ताकतें भारत विरोध को अपनी ताकत मानती हैं, लेकिन उससे इन दोनों देशों में शांति की जरूरत कम नहीं होती। हकीकत तो यह है कि अपनी-अपनी जमीन पर करोड़ों बहुत ही गरीब लोगों को लेकर बसे हुए इन दोनों देशों को जंग के हथियारों पर अंतहीन खर्च करने के बजाय उस पैसे का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए। यह भी जरूरी है कि दोनों के बीच कारोबार बढ़े, ताकि आपसी मुनाफा बढ़े। यह भी जरूरी है कि इनमें से किसी की जमीन पर ऐसे लोग न पनपें जो कि सरहद की दूसरी तरफ हमले करें।
लेकिन सरकार और फौज के काम करने के तरीके कुछ अलग होते हैं। जिन ताकतों को चुनावों में जीतना होता है, उनके तौर-तरीके हमेशा ही अमनपसंद नहीं होते। वोटरों के जज्बात कुरेदकर चुनाव जीतने की बेबसी या पसंद भी किसी की हो सकती है। ऐसे में सरकारों से परे, कट्टरपंथी, धर्मांध और आतंकी ताकतों से परे लोगों को ही आपस में मिलकर फासले दूर करने होंगे। इसमें संगीत और फिल्म अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं, और क्रिकेट भी हमारा मानना है कि ऐसा ही कर सकता है। सवाल यही है कि जब तक किसी दूसरे मोर्चे पर तनाव या हमले चल रहे हैं, तब तक खेल के मोर्चे पर एक मैदान में उतरा जाए, या नहीं? हमारा मानना है कि ऐसे किसी मैच से न तो किसी देश का यह दावा कमजोर पड़ता कि उस पर आतंकी हमले हो रहे हैं और ऐसे हमले थमने चाहिए, मुजरिमों को सजा मिलनी चाहिए। पाकिस्तान की क्रिकेट टीम ने हिंदुस्तान के खिलाफ अलग से कोई ऐसा जुर्म नहीं किया है कि उसका बायकॉट किया जाए। खेल से दोनों देशों में चल रहा तनाव कम ही होगा। सरहद के तनाव या फौज और आतंक के तनाव कभी क्रिकेट का हिस्सा नहीं रहे। न सिर्फ दो देशों के बीच, बल्कि एक देश के भीतर भी बहुत से ऐसे मौके आते हैं जब लोग फासलों को भूलकर एक-दूसरे का साथ देते हैं। कम से कम तीन ऐसे मौके पिछले पांच बरस में ही आए हैं जब शिवसेना ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए दो बार अपनी भागीदार भाजपा को छोड़कर सोनिया गांधी का साथ दिया, जिनके कि वह हमेशा खिलाफ रही है। इसके अलावा परमाणु मुद्दे पर भी शिवसेना खुलकर यूपीए का साथ दिया और एनडीए के परमाणु-विरोध से अपने को अलग रखा। अभी पिछले दिनों ही बाल ठाकरे ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर इंदिरा गांधी की खासी तारीफ की थी। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि शिवसेना कांगे्रस के साथ हो गई है। 
दो देशों के बीच के फौज और आतंक के तनाव के साथ अगर कोई चाहें तो क्रिकेट को और गीत-संगीत को, किसी भी बात को जोड़ सकते हैं। लेकिन हम सरहद के दोनों तरफ अमन की वकालत करते हुए तमाम गैरसरकारी कोशिशों को आगे बढ़ाने की सिफारिश करेंगे, और सरकारी कोशिशों को भी अलग से आगे बढ़ाना चाहिए।

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