19 जुलाई 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ लोकायुक्त की रिपोर्ट में केंद्र और राज्य सरकार के भयानक भ्रष्टाचार पर उनके विचारों के साथ-साथ राज्य सरकार के जिस भ्रष्टाचार की मिसालें दी गई हैं, उनके बारे में सरकार, राज्यपाल, उच्च न्यायालय, विधानसभा और जनता, इन सबको सोचने की जरूरत है। राज्य के बड़े-बड़े भ्रष्ट अफसरों के नाम और मामले गिनाते हुए इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बरसों गुजर जाने के बाद सरकार ने लोकायुक्त की सिफारिशों पर कार्रवाई नहीं की और भ्रष्ट लोगों को बचाया।
प्रमुख लोकायुक्त एल.सी. भादू ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यह निर्विवाद तथ्य है कि जैसे-जैसे उद्योग, साधन संपन्नता, आर्थिक उन्नति में वृद्धि हुई है वैसे-वैसे भ्रष्टाचार, अवचार, प्रशासनिक अकर्मण्यता, भेदभाव, पक्षपात, पद का दुरुपयोग भी तेजी से बढ़े हैं। पिछले पांच वर्षों में तो इस समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। वर्ष 2011 में केंद्र व राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता, पद का दुरुपयोग के असंख्य ममाले सामने आए हैं। जिनमें भ्रष्टाचार का आकार एवं प्रकार दोनों बहुत बढ़ गए हैंं। उदाहरण स्वरूप 2जी स्पेक्ट्रम, एशियाई खेलों के आयोजन में भ्रष्टाचार, खनन पट्टे जारी करने में भ्रष्टाचार, मनरेगा, प्रधानमंत्री सड़क एवं वन क्षेत्र की सभी योजनाओं में भ्रष्टाचार के मामले भी प्रकाश में आए हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इस समय कोई भी सरकारी योजना भ्रष्टाचार रहित नहीं है।
लोकायुक्त अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार सक्षम प्राधिकारी को भ्रष्ट लोक सेवक के खिलाफ तीन माह में कार्रवाई कर अवगत कराने का प्रावधान है। परंतु लोकायुक्त की अनुशंसा पर वर्षों तक कोई समुचित कार्रवाई नहीं की जाती। क्योंकि कार्रवाई उसी विभाग के अधिकारियों द्वारा की जाती है इसलिए विभाग के अधिकारी निष्पक्ष रूप से जांच कर भ्रष्ट लोक सेवक के खिलाफ कार्रवाई कर दंडित करने के विपरीत उसको बचाने का करते हैं। जस्टिस भादू ने कहा है कि राजनेताओं व नौकरशाही को विभिन्न प्रकार के मामलों में असीमित विवेकाधिकार है। विवेकाधिकार के उपयोग में पारदर्शिता नहीं होना ऐसा विषय है जब तक इस पर समुचित नियंत्रण नहीं किया जाएगा। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना मुश्किल है।
दूसरे राज्यों का हाल भी कमोबेश इसी तरह का है, और छत्तीसगढ़ का भी। जो जाने-पहचाने, स्थापित और संगठित, योजनाबद्ध भ्रष्टाचार करने वाले विभाग हैं, उनके अफसरों के पकड़ाने के बरसों बाद भी उन पर अगर जांच रिपोर्ट के आधार पर भी अगर कार्रवाई नहीं होती है तो विवेक का ऐसा अधिकार घोर अलोकतांत्रिक है। इससे यही साबित होता है कि देश और प्रदेशों में अन्ना हजारे जिस किस्म की पारदर्शिता वाले लोकपाल की बात कर रहे हैं, वैसी स्वायत्तता और स्वतंत्रता के बिना अब काम चलना नहीं है, और हालात सुधरने नहीं हैं। इस बार विधानसभा के इस सत्र के आखिरी दिन लोकायुक्त की जो रिपोर्ट पेश हुई है, वैसी रिपोर्ट इसके पहले के बरसों में भी सामने आती रही है। साफ-साफ भ्रष्टाचार के जो मामले हैं, वे ही अधिकारी अगर सरकार की ऊंची कुर्सियों पर बैठकर दस-दस, बीस-बीस बरस बैठकर कार्रवाई से बचे रहते हैं, तो फिर यह न्यायपालिका के दखल का मामला भी बनता है। इस राज्य में हमने यह भी देखा है कि लोक सेवा आयोग में भ्रष्टाचार और रिश्वत के सुबूतों वाले जो मामले सामने आए और जिनमें आयोग के अध्यक्ष-सदस्य फंसे हुए थे, उनके खिलाफ सुबूतों को भी कमजोर करते हुए जांच खत्म कर दी गई है। सरकार के भीतर के संगठित भ्रष्टाचार पर कड़ी कार्रवाई का राजनीतिक साहस अगर नहीं दिखाया जाएगा तो सत्तारूढ़ पार्टी विपक्ष की कमजोरियों के बदौलत ही सत्ता पर वापिसी की उम्मीद कर सकती है।
प्रदेश में भाजपा के बहुत से लोग भी यह मानते हैं कि सरकारी अमले में भ्रष्टाचार बेकाबू है और पिछले बरसों में यह लगातार बढ़ते गया है। जब तक भ्रष्ट लोग जेल जाने के बजाय सत्ता की कमाऊ कुर्सियों पर काबिज रहेंगे, तब तक दूसरे भ्रष्ट लोगों का हौसला तो बढ़ते ही चले जाएगा। हर विभाग में अपने बड़े लोगों के भ्रष्टाचार के मामले जांच और सुबूत के बिना भी सारे अमले को मालूम रहते हैं। और फिर जब ऐसे लोगों का कुछ नहीं बिगड़ता तो फिर वे अपने सारे साथियों और नीचे के लोगों के प्रेरणास्रोत बन जाते हैं।
राज्य सरकार को उसके सामने पड़े हुए भ्रष्टाचार के अनगिनत मामलों पर से धूल झड़ानी चाहिए और अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से भ्रष्ट लोगों को बचाने की चली आ रही परंपरा को तोडऩा चाहिए।

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