संपादकीय
5 जुलाई 2012
ब्रिटिश प्रधानमंत्री एक पखवाड़े में दो बार कुछ अटपटी खबरों में चर्चा में आए। पहले तो वे एक पब में खाने-पीने गए और वहां से लौटते हुए अपनी बच्ची को वहीं भूल आए। बाद में घर पहुंचने पर याद पड़ा तो उसे बुलवाया गया। अभी एक फौजी समारोह में जाते हुए उन्हें कॉफी पीने को दिल किया तो उन्होंने रास्ते में ही रूककर एक कैफे में जाकर कॉफी लेने की कोशिश की। वहां पहले से खड़े लोगों को पार करके वे काउंटर पर पहुंचे तो कतार तोडऩे के लिए उन्हें वेटे्रस ने झिड़क दिया। दस मिनट तक राह देखने के बाद प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के अधिकारियों ने पड़ोस की दूसरी दुकान से उन्हें चाय का कप दिलवाया। तब तक उस वेट्रेस ने अपनी दौड़-भाग के बीच प्रधानमंत्री को पहचाना भी नहीं था। बाद में प्रधानमंत्री इन दुकानों के बाहर टहलते हुए चाय पी रहे थे और राहगीर उन्हें पहचान कर कुछ हैरान भी हो रहे थे। आज ही कि एक दूसरी खबर है कि अमरीकी फौजों के सम्मान में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वहां के राष्ट्रपति भवन में एक दावत रखी और उसमें उन्होंने खुद भी खुले में पक रही चीजों को तैयार करने में हाथ बंटाया और सैनिकों के परिवारों के छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लेकर खिलाते भी रहे। इसके पहले भी तकरीबन हर महीने ओबामा कहीं न कहीं सड़क किनारे आइसक्रीम की दुकान या कहीं पिज्जा खाने जाते हुए मीडिया में दिखते ही हैं।
हिंदुस्तान में देखें तो यह बात कुछ अजीब लगती है कि यहां ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोग लालबत्तियों के साए में चलते हुए अपनी उस जिंदगी से बिल्कुल कट जाना पसंद करते हैं जिस जिंदगी से उठकर वे इन कुर्सियों तक पहुंचे हैं और इन कुर्सियों से उतरने के बाद फिर जिस जिंदगी में उन्हें जाना है। यह सिलसिला न सिर्फ आम जिंदगी से कट जाने का होता है बल्कि यह आम लोगों की नजरों में इज्जत खोने का भी होता है। आज मामूली सी कुर्सियों पर बैठे हुए लोग भी बाजार या किसी जगह जाने पर एक अलग दर्जे के बर्ताव की उम्मीद करते हैं। उनके आसपास का चापलूसों का दायरा भी उन्हें यह महसूस करने पर मजबूर सा करने पर आमादा रहता है कि वे इतने बड़े हैं कि औरों से उनको नहीं मिलना चाहिए। ऐसे में छत्तीसगढ़ के राजभवन में पिछले राज्यपाल ईएमएस नरसिम्हन ने जब यह तय किया कि वे अपने कपड़े खरीदने खुद बाजार जाएंगे और गाडिय़ों के काफिले के बिना एक निजी व्यक्ति के रूप में जाएंगे, तो राजभवन और सुरक्षा के अधिकारी हड़बड़ा गए थे। लेकिन उन्होंने यह साफ कर दिया था कि राज्यपाल होने से वे खरीददारी का अपना हक नहीं खो बैठते।
हिंदुस्तान की सोच अंगे्रजों के भी पहले की राजा-रजवाड़ों वाली है जिसके चलते आजादी के आधी सदी बाद भी कांगे्रस और भाजपा जैसी चुनावी पार्टियों के भीतर भी पुराने रजवाड़े-नेताओं को कोई महाराज कहता है तो किसी और को कोई महारानी से कम नहीं कहता। इसी तरह कोई हुजूर कहता है तो कोई हुकु म कहता है। छत्तीसगढ़ में अर्जुन सिंह से लेकर दिग्विजय सिंह तक के लिए इस तरह की भाषा चलती आ रही है और उनके भी पहले से राजमाता और उनके बेटे महाराज कहलाते रहे हैं। अच्छे-भले कांगे्रसी नेताओं को चापलूसी के लिए अर्जुन सिंह के सामने हुकुम-हुकुम कहते हमने बरसों देखा है।
यह पूरा सिलसिला बहुत शर्मनाक है जहां कुछ वक्त की ताकत की कुर्सियों पर बैठे हुए अपने-आपको इंसानों से ऊपर समझ बैठते हैं और चापलूस उन्हें इंसानों से ऊपर साबित करते रहते हैं। हिंदुस्तान के सारे नेताओं की कुर्सियों में मिलाकर जितनी ताकत है, उतनी ताकत अकेले हर दिन इस्तेमाल करने वाला अमरीकी राष्ट्रपति इंसानों की तरह रह लेता है, कहीं वह खेलने पर उतर जाता है, तो कहीं बाजार और रेस्त्रां जाकर लोगों से मिलते-जुलते रहता है। और अगर वह किसी सार्वजनिक जगह पर दूसरे लोगों के हक कुचलते हुए अपनी ताकत का इस्तेमाल या दिखावा करेगा तो लोग उसे उसी तरह झिड़क देंगे जिस तरह लंदन में इस ब्रिटिश वेट्रेस ने प्रधानमंत्री को झिड़क दिया। दिक्कत यह है कि हिंदुस्तान में लालबत्तियों के लिए मरे जाते लोगों को यह भी सोचने की परवाह नहीं होती कि लालबत्तियां दुनिया में किस धंधे का प्रतीक हैं।
आये हैं ते जायेंगे, राजा-रंक-फकीर।
एक सिंहासन चढि़ चले एक बांधे जात जंजीर॥
इस दोहे के जरिये कबीर दास कहते हैं कि जो जन्मा है, वह मरेगा ही, चाहे वह राजा हो, गरीब हो या फकीर हो। अंतर इतना है कि अपने उच्च कर्मों के द्वारा वह प्रतिष्ठा पाता है। जबकि अपने कर्मों से स्खलित होने के कारण वह अपराधी-सरीखी भत्र्सना पाता है।

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