जमीन खोकर लुटे हुए राजधानी की सड़कों पर


16 जुलाई 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के उद्योगग्रस्त जिले रायगढ़ से आए आदिवासियों का जुलूस आज राजधानी रायपुर में विधानसभा घेरने के लिए पहुंचा। उनके प्रदर्शन को रोककर उन्हें वहां तक पहुंचने नहीं दिया गया, लेकिन उन्होंने अपनी बात तो यहां रख ही दी। पिछले एक-दो बरस में हमने बहुत से ऐसे मामले सुबूत सहित छापे हैं जिन्हें इस खनिज संपन्न राज्य में सिर्फ खनिज की वजह से आने वाले कारखानों के लिए आदिवासी किसानों की जमीनें बहुत संगठित साजिश करके खरीदी जा रही हैं। और इस पर राज्य सरकार का कोई काबू भी नहीं दिख रहा है। ऐसे दर्जनों मामले अब तक सामने आए हैं जिनमें कारखानों के लिए आदिवासी की जमीन सीधे खरीदना मुमकिन न होने से कारखानेदारों ने अपने आदिवासी कर्मचारियों या आदिवासी जमीन दलालों के नाम से आदिवासी-जमीनें खरीद लीं, और आदिवासी जमीन के लिए बने हुए कानून की आंखों में नोट झोंक दिए। हमारा यह मानना है कि एक साजिश के तहत ऐसा करने वाले, और फिर उस जमीन को अपने कारखाने या खदान के इस्तेमाल का कागजात में जोड़कर कानूनी शर्तें पूरी कर लेने वाले लोगों पर आदिवासी प्रताडऩा कानून के तहत भी कार्रवाई होनी चाहिए। जानकारों का ऐसा मानना है कि छत्तीसगढ़ के दर्जनों बड़े उद्योग इसके घेरे में आ जाएंगे इसलिए सरकार इतनी बड़ी कार्रवाई करने से बच रही है। हो सकता है कि ऐसी बड़ी कार्रवाई से इस राज्य में पूंजीनिवेश और कारखाने लगना कुछ धीमा हो जाए, लेकिन आदिवासियों के खेत, उनके मकान, गरीब किसानों की जमीनों की ऐसी लूटपाट की कीमत पर ऐसे पूंजीनिवेश का कोई मतलब नहीं है। 
एक तरफ यह राज्य बस्तर से लेकर सरगुजा तक और राजनांदगांव-कवर्धा तक लगातार नक्सल हिंसा को झेल रहा है। जिस तरह के इलाकों में आज आदिवासी जमीनों को कारखानेदार ठग रहे हैं, उसी तरह के इलाकों में नक्सल आंदोलन के फैलने और पनपने का एक बहुत साफ खतरा सामने है। इसे अनदेखा करते हुए जब गरीबों को उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है, खुले बाजार की हिंसक व्यवस्था के तहत कारखानेदारों को यह छूट मिली हुई है कि वे किस्म-किस्म के धोखे देकर आदिवासियों की जमीन हड़प सकते हैं, तो इसे महज खरीद-बिक्री बताना एक बड़े जुर्म को अनदेखा करना है। राज्य सरकार को अपनी जनकल्याण की जिम्मेदारी के तहत भी धोखाधड़ी के इस ध्ंाधे पर सबसे बड़ी कार्रवाई करनी चाहिए क्योंकि जो बेजुबान आदिवासी अपनी आखिरी जमीन भी खो बैठेंगे, तो उसके बाद हो सकता है कि हिंसा ही उनके पास एक रास्ता बच जाए। लोकतंत्र जब लोगों के हक बचा नहीं सकता तब लोग नक्सलियों की तरफ देखने पर मजबूर हो सकते हैं, और छत्तीसगढ़ को ऐसी नौबत से बचना चाहिए।

आज राजधानी रायपुर में निकले इस जुलूस में रायगढ़ के एक जाने-माने और दमदार सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल पर गोलियों से हुए हमले का मुद्दा भी उठाया गया। उद्योगग्रस्त रायगढ़ और आसपास के इलाके में बरसों से रमेश अग्रवाल जनता की तरफ से लड़ रहे हैं और जिंदल जैसे बड़े, और राजनीतिक ताकत वाले उद्योग समूह के खिलाफ उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी-बड़ी कानूनी लड़ाई जीती है और जिंदल को इससे हजारों करोड़ का नुकसान भी हुआ है। खुद नवीन जिंदल की कांगे्रस पार्टी वाली यूपीए सरकार के एक कांगे्रसी पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार को निर्देश देकर जिंदल के खिलाफ पर्यावरण कानून तोडऩे के लिए आपराधिक मुकदमा चलाने को कहा था और वह अभी रायगढ़ की जिला अदालत में चल ही रहा है। पाठकों को यह भी याद होगा कि रमेश अग्रवाल को जिंदल की एक शिकायत पर मानहानि के एक मुकदमे में ऐसा गिरफ्तार किया गया था कि शायद महीनों तक उनकी जमानत नहीं हो पाई थी। ऐसे ताकतवर कारखानेदारों के खिलाफ रमेश अग्रवाल हों, या कोई इक्का-दुक्का अखबार हों, या फिर सरकारी अधिकारी हों, इन सबको दौलत का बुलडोजर कुलचने के लिए काफी होता है। कानून तोडऩे वालों को, गरीबों के हक छीनने वालों को दानवाकार ताकत हासिल नहीं करने देनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में प्रदेश कांगे्रस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल इसी रायगढ़ जिले से आए हुए हैं, और उद्योगों की गुंडागर्दी के खिलाफ उनकी आवाज भी सुनाई नहीं पड़ती है। ऐसी चुप्पी भी इतिहास में दर्ज होते रहती है, और विपक्ष के ऐसे विरोध के न होने से राज्य सरकार भी इन अपराधों पर कार्रवाई करने से बच रही है।
हमारा मानना है कि जहां पर खनिज हैं वहां पर तो कारखानेदारों को आना ही आना है। आज नहीं आएंगे तो कल आएंगे, और अगर इस राज्य ने अपने आदिवासियों के हक में अगर संविधान की विशेष व्यवस्था का उपयोग करते हुए वहां की खदानों पर अलग से रायल्टी लगाई तो उससे स्थानीय विकास की शक्ल बदल सकती है। डॉ. रमन सिंह की सरकार से हम चाहेंगे कि वे इस संवैधानिक विकल्प पर विचार करें और राज्यपाल के अधिकारों से आदिवासी इलाकों में निकलने वाले खनिजों से कमाई बढ़ाने का काम करें। जानकारों का मानना है कि इस अकेले फैसले से हर बरस हजारों करोड़ रूपये इन इलाकों के विकास के लिए आ सकते हैं। अगर यह बात सही है तो इसे करने में देर क्यों होनी चाहिए?
जमीन खोकर लुटे हुए आदिवासी जब राजधानी की सड़कों पर आते हैं तो राजनीति और राजाओं को जागकर उनकी बात सुननी चाहिए।

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