ताजा इतिहास कड़वा हो, तो भी अच्छा


2 जुलाई 2012
भारत की एक खासी बड़ी आबादी डॉ. अब्दुल कलाम को किसी भी और व्यक्ति के मुकाबले राष्ट्रपति की कुर्सी के लिए अधिक वोट देती, अगर इस देश में जनता के वोटों से राष्ट्रपति को चुनने की व्यवस्था होती। लेकिन भारत में राष्ट्रपति का चुनाव, मतदाताओं के चुने हुए विधायकों और सांसदों के मार्फत होता है, इसलिए आंकड़े डॉ. अब्दुल कलाम के साथ नहीं जुट पाए। पहले वे एक बार एनडीए की पसंद से राष्ट्रपति रह चुके हैं और उस दौरान हुए चुनाव में वे एक आम मतदाता की तरह जाकर कतार में खड़े रहकर वोट भी डाल चुके हैं। अपनी सादगी की वजह से, ईमानदारी की वजह से और अपने निजी जीवन में मुस्लिम और हिंदू धर्म दोनों के संगम की तरह का होने की वजह से वे बहुत से लोगों को पसंद हैं। सादा जीवन और देश की मिसाइल तकनीक में अपने योगदान की वजह से वे देश की बात करने वाले बहुत बड़े तबके को बहुत अच्छे भी लगते हैं। 
इस चुनाव में समर्थन न जुट पाने पर उन्होंने अपने-आपको उम्मीदवार नहीं बनने दिया लेकिन बिना उम्मीदवारी भी वे आज खासे खबरों में बने हुए हैं। इसी वक्त पर उनकी एक किताब आ रही है जिसमें पिछले दस बरसों के ही उनके राष्ट्रपति के कार्यकाल के दौरान के अनुभव और अब तक उजागर नहीं हुईं कई बातें छपने जा रही हैं। जैसा कि किसी भी किताब की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए होता है, डॉ. अब्दुल कलाम की इस आत्मकथा सरीखी किताब, या आत्मकथा, को भी प्रकाशक टुकड़ों में मीडिया के मार्फत लोगों के सामने परोसकर उसे खासी चर्चा में ला चुका है। लेकिन इस चर्चा में बीते कल उन्हें राष्ट्रपति बनाने वाले लोग भी खासे बिफरे हुए हैं और वे इसे कलाम के आत्मगौरव बढ़ाने की कोशिश मान रहे हैं। एनडीए के संयोजक और जनता दल युनाइटेड के अध्यक्ष शरद यादव ने एक किस्म से इसे अब्दुल कलाम की बेईमानी करार दिया है और कहा है कि अब आठ बरस बाद जाकर उनकी आत्मा  जाग रही है।
मैं पहले भी कई बार यह बात लिख चुका हूं कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोगों को अपना काम या अपनी जिंदगी खत्म होने के पहले उसके बहुत से पहलुओं के बारे में खुलासा करके जाना चाहिए। यह एक किस्म से समकालीन इतिहास लेखन सा भी होता है और ऐसे लिखने से समाज के बाकी लोगों को भी किसी गलत काम को करने के पहले यह हिचक होती है कि किसी दिन उनके कामों को भी कोई अपनी आत्मकथा में लिख दे तो फिर क्या होगा? इतिहास लेखन लोगों को गलत काम करने से रोकता भी है। भाजपा के बहुत पसंदीदा रहे डॉ. अब्दुल कलाम ने जब दस बरस पहले गुजरात दंगों के सिलसिले में यह लिखा है कि तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें दंगों के बाद गुजरात न जाने की सलाह सी दी थी। अब यह बात जानने का हक देश के लोगों को था, और है। इस देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच ऐसे भयानक कत्लेआम को लेकर क्या विचार-विमर्श हुआ था, उसे किसी भी तरह से निजी बात नहीं माना जा सकता। इस देश के दो सबसे बड़े दफ्तरों को संभालने वाले लोग आपस में देश के सबसे बड़े अपराध के बारे में जो बात करते हैं वह किसी भी तरह से बंद कमरे में रहने लायक नहीं है। और जो बात कलाम ने लिखी है वह बात कई अलग-अलग तरह से पहले भी वाजपेयी के रूख की शक्ल में सामने आ चुकी है। इसलिए कलाम ने सच लिखा हो या झूठ लिखा हो, उनका लिखना इसलिए आज बेहतर है क्योंकि आज वाजपेयी जिंदा हैं और वे इस बात पर कोई जवाब देने की हालत में भी हैं। गुजर चुके लोगों से हुई बातचीत लिखने के  अपने खतरे होते हैं क्योंकि कोई ऊपर से तो जवाब दे नहीं सकते।
आत्मकथा लिखने का एक फायदा और होता है। कुछ लोग ऐसा करते हुए ईमानदारी भी बरतते होंगे, और अगर उन्होंने अपने जीवन में पहले से यह सोच रखा हो कि किसी दिन वे आत्मकथा लिखेंगे, तो वे अपना चाल-चलन भी बेहतर रखने की सोचते होंगे। हर कोई गांधी की तरह, ऐसी मेरी उम्मीद है, सच लिखने की हिम्मत हो सकता है न भी रखते हों, लेकिन जब लोग जवाब देने के लिए जिंदा हों तो शायद काफी कुछ सच लिखने की एक बेबसी भी रहती होगी। इसलिए कलाम की बातें पार्टियों और लोगों के बारे में देश के लोगों को जानकारी भी दे रही हैं, और अगले ऐसे राजनीतिक या संवैधानिक मौकों के लिए बाकी लोगों को सचेत भी कर रही हैं। आज लोग राष्ट्रपति भवन जाकर बंद कमरे में राष्ट्रपति से संवैधानिक, सरकारी और राजनीतिक मामलों पर बात करके आ जाते हैं, उन सबका आगे चलकर खुलासा होना आज से ही जाहिर हो तो लोग गलत बातें करने से भी बचेंगे।
यह एक बड़ा अजीब सा मौका है जब सोनिया गांधी के विदेशी मूल के होने को लेकर उत्तर-पूर्वी नेता पी.ए. संगमा एक बार फिर अपनी पुरानी शुरू और बंद की गई बहस के पोस्टर बनवाकर राष्ट्रपति चुनाव में खड़े हैं। सोनिया के विदेशी मूल को मुद्दा बनाने की हसरत रखने वाली राजनीतिक पार्टियां अपनी पिछली नाकामयाबी से परे एक बार फिर संगमा के मार्फत देश को यह याद दिलाना चाह रही हैं कि यूपीए की मुखिया एक दूसरे देश में पैदा हुई है। ऐसे में डॉ. अब्दुल कलाम की बातें इन पार्टियों को और इन नेताओं को निराश करती हैं कि राष्ट्रपति तो उस वक्त सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने का न्यौता टाईप करवाकर बैठे थे और वे दूसरा कोई संवैधानिक विकल्प देखते भी नहीं थे, और यह सोनिया गांधी थीं जिन्होंने आकर और खुद होकर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए चुनने का फैसला राष्ट्रपति को बताया था। ये बातें यूपीए की बदनामी के इस दौर में, सोनिया गांधी की एक अच्छी तस्वीर पेश करती हैं, और एनडीए के लोगों का यह हक बनता है कि वे इसे अपने बनाए राष्ट्रपति की बेवफाई समझें। 
कलाम, संगमा, सोनिया और राष्ट्रपति चुनाव की खबरों के बीच किताब को बढ़ावा देने का यह बहुत अच्छा मौका है और शायद बाजार के जानकार प्रकाशक ने मुफ्त प्रचार की सारी संभावनाओं को पूरी तरह दुह भी लिया है। लेकिन इसमें कोई बुराई भी नहीं है और बहुत सी कम मायने रखने वाली बातों के बीच यह बात इस किताब के मार्फत ताजा इतिहास की तरह देश के सामने आई है कि गुजरात दंगों में हजारों हत्याओं के बाद वहां जाना चाह रहे राष्ट्रपति को तब के प्रधानमंत्री ने रोकने की कोशिश की थी। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें