कर्नाटक में दिल्ली की बेइज्जती ...यह अच्छी बात नहीं है..


संपादकीय
8 जुलाई 2012
कर्नाटक में भाजपा के मुख्यमंत्री बदलने के साथ ही वहां चल रही अस्थिरता का एक दौर खत्म हो रहा है और दूसरा दौर शायद आज से ही शुरू हो जाएगा। एक राष्ट्रीय पार्टी की अपनी कई किस्म की बेबसी होती है इसलिए दिल्ली में बैठे हुए भाजपा के नेताओं ने कर्नाटक के भाजपा के जमींदार बी.एस. येदियुरप्पा की मनमानी को आज बर्दाश्त किया है, लेकिन यह मनमानी पिछले बरसों से लगातार चल रही थी और इसका कोई इलाज भाजपा नहीं ढूंढ पाई। इस नौबत से यह साफ होता है कि कर्नाटक में भाजपा अपने इस भूतपूर्व और चिरअसंतुष्ट नेता के पीठ पर सवार होकर सत्ता तक का सफर कर रही थी और यह नेता वहां पर पार्टी के मुकाबले अधिक बड़ा था। क्या कमोबेश ऐसी ही एक नौबत गुजरात में भी भाजपा को नहीं झेलनी पड़ रही है? और आज चूंकि किसी अदालती मामले को लेकर या किसी और वजह से मोदी को हटाने की नौबत नहीं आई है, इसलिए गुजरात में शायद भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की लाज बची हुई है। वहां अगर भाजपा लीडरशिप में फेरबदल सोचेंगे तो हो सकता है कि उसे पार्टी से बड़ा एक क्षेत्रीय नेता वहां देखने मिले।
यह नौबत कांगे्रस ने भी आंध्र में वाईएसआर रेड्डी के गुजरने के बाद देखी और उससे सबक भी लिया। लेकिन कर्नाटक के मामले में कई बरस हो गए, भाजपा के वहां के मंत्रियों, रेड्डी भाईयों ने जिस कदर खदानों की खुली लूट चला रखी थी और उनके सिर पर जिस तरह से भाजपा की केंद्रीय नेता सुषमा स्वराज के हाथों वाली तस्वीर प्रचलन में थी, उसके चलते वहां भाजपा की दिल्ली की लीडरशिप का कोई बस नहीं चला। दरअसल जब दसियों हजार करोड़ कमाने का मौका कोई पार्टी अपने नेताओं को दे देती है तो वे इतने ताकतवर दानव बन जाते हैं कि उनको कोई पार्टी अपने काबू में नहीं रख सकती। जिस तरह कोई वैज्ञानिक विज्ञान कथाओं में एक ताकतवर रोबो बना लेता है, कहीं दूसरे कोई वैज्ञानिक डायनासॉर बना लेते हैं और फिर वे बेकाबू हो जाते हैं, उसी तरह राजनीतिक दल अपने नेताओं, और कभी-कभी अफसरों को भी, इसी तरह का बेकाबू बना लेते हैं। कर्नाटक की मिसाल इस देश के राजनीतिक इतिहास में लंबे समय तक गिनाई जाएगी क्योंकि आरएसएस जैसे कड़े नियम-कायदे वाले संगठन तले काम करने वाली भाजपा का आज जो बुरा हाल कर्नाटक में हुआ है और जिस तरह से वहां शुचिता के नारे को येद्दि एंड गैंग ने कुचलकर फेंक दिया है उससे पूरी पार्टी की किरकिरी हुई है और इससे उबरना उसके लिए जल्द आसान भी नहीं होगा। 
किसी भी पार्टी को अपने नेताओं को इस कदर दौलतमंद, इस कदर बददिमाग नहीं होने देना चाहिए कि वे जब चाहे तब अपनी पार्टी की लोगों को हरा दें, हटा दें या बदनाम कर दें। हमारा यह मानना है कि भाजपा को एक राज्य खोने की कीमत पर भी अगले चुनाव में कर्नाटक में येदियुरप्पा से छुटकारा पाना चाहिए और खरबपति बन गए अपने बाहुबलि अपराधी भूतपूर्व मंत्रियों से भी। हो सकता है कि तब तक कानून उनके साथ इंसाफ न कर सके, और यह भी हो सकता है कि दिल्ली का कोई नेता उनके सिर पर फिर हाथ रखकर खड़ा रहे, लेकिन अगर भाजपा को अपने बाकी राज्यों को भी अनुशासनहीन बन जाने देने का खतरा नहीं उठाना है, तो उसे अपने शरीर के इस हिस्से को काटकर अलग करना ही होगा। राजनीति में आज येदियुरप्पा एक शरीर का गैंगरीन वाला हिस्सा हो गए हैं जिसे अलग कर देना ही एक इलाज है। आगे खड़े लोकसभा चुनाव को लेकर न सिर्फ भाजपा बल्कि बाकी पार्टियां भी तरह-तरह के समझौते करने को बेबस हो सकती हैं, लेकिन कर्नाटक से दिन में दो बार जिस तरह भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को अपमान झेलना पड़ रहा है, वह किसी भी पाटी्र के लिए अच्छी बात नहीं है।

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