23 जुलाई 2012
संपादकीय
भारत के नए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को लेकर कल शाम से देश भर में जो बहस चल रही है उसमें राष्ट्रपति के पद के सम्मान, उसकी गरिमा जैसी बातों को बार-बार दुहराया जा रहा है। इसके अलावा अन्ना हजारे की टीम ने जिस तरह से प्रणब मुखर्जी को खुलकर भ्रष्ट कहते हुए जो हल्ला किया है उसे भी कांगे्रस पार्टी राष्ट्रपति के पद का अपमान कह रही है। भारत में बहुत सी कुर्सियों और दफ्तरों को लेकर इस तरह की बात समय-समय पर कही जाती है और पांच बरस बाद राष्ट्रपति का ऐसा सरगर्मी वाला चुनाव ऐसी बात पर कुछ अधिक बड़ा मौका लेकर भी आया है। लेकिन हमारा ख्याल है कि सरकार के कामकाज में, भारतीय लोकतंत्र की संसदीय परंपरा में, और इस देश के राजकीय रीति-रिवाजों में जिस तरह के अतिरिक्त सम्मान की बात कही जाती है वह पूरी तरह बकवास है।
किसी पद का क्या तो सम्मान हो सकता है और क्या अपमान। हर पद, हर कुर्सी और हर पेशे का सम्मान, उस पर काम करने वाले लोगों के अच्छे और बुरे कामों से तय होना चाहिए, और इतिहास में वही होता भी है। किसी व्यक्ति के कामकाज से परे किसी कुर्सी का अलग से कोई सम्मान क्यों होना चाहिए? सड़क किनारे फुटपाथ पर बैठकर जूते पॉलिश करने वाले एक साधारण दिखते इंसान और देश के किसी जज, किसी मंत्री या राज्यपाल-राष्ट्रपति के काम में सम्मान का क्या फर्क हो सकता है? जो अपना काम अच्छे से करे, वही सम्मान का हकदार है, फिर चाहे उसका काम कुछ भी हो। यह तो राजाओं के जमाने से चले आ रही परंपरा है जिसने कुछ कुर्सियों को दूसरी कुर्सियों के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण साबित करने की कोशिश की है। इसलिए जब कोई प्रणब मुखर्जी को भ्रष्ट कहे, तो वह अपमान एक व्यक्ति के रूप में उनका हो सकता है, अभी तो वे राष्ट्रपति का दफ्तर संभाल भी नहीं पाए हैं तो उस दफ्तर का मान-अपमान कहां से आ गया?
यह एक अलग बात है कि प्रणब मुखर्जी पर कोई आरोप साबित होने से पहले अन्ना की टोली उन्हें बार-बार भ्रष्ट कह रही है, और यह एक बेबुनियाद बात है। उस टोली से एक पुराने आयकर कमिश्नर रहे हुए अरविंद केजरीवाल और सुप्रीम कोर्ट एक बड़े वकील प्रशांत भूषण यह जानते हुए इस जुबान का इस्तेमाल कर रहे हैं कि प्रणब मुखर्जी के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार साबित नहीं हुआ है, और जहां तक आरोपों की बात है तो वह तो तकरीबन तमाम अन्ना-टोली के खिलाफ भी लगे ही हुए हैं। अगर महज तोहमत से कोई मुजरिम हो जाता है तो फिर अन्ना-टोली को अपनी तमाम बैठकें जेल में ही करनी होंगी।
कल निराश करने वाली एक दूसरी बात यह थी कि देश के बड़े-बड़े कुछ संपादकों और वामपंथी पार्टियों के कुछ बड़े नेताओं, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ प्राध्यापकों के बीच नए राष्ट्रपति पर टीवी चैनलों में जो बहस हुई उनमें किसी ने भी हितों के टकराव का वह पहलू नहीं उठाया जो कि हम बार-बार उठा चुके हैं। केंद्र सरकार का कोई भी बड़ा भ्रष्टाचार सामने आने पर भारतीय संसदीय परंपरा के मुताबिक विपक्ष राष्ट्रपति के पास जाकर फरियाद करता है कि सरकार इतनी भ्रष्ट है और राष्ट्रपति उस पर कार्रवाई करे। राष्ट्रपति के कार्रवाई करने की एक बहुत छोटी सी सीमा है लेकिन वह सीमा भी उस वक्त बेमतलब हो जाती है जब राष्ट्रपति के सामने अगले कई बरस तक वैसे ही मामले शायद सामने आएं जिनमें वे खुद फैसलों के हिस्सेदार रहे हैं। यूपीए-2 सरकार में प्रणब मुखर्जी अकेले ही शायद तीन चौथाई मंत्रिमंडलीय समूहों के मुखिया थे। सरकार के भ्रष्टाचार के अधिकांश मामलों में वे कहीं न कहीं मंत्री, मंत्री-समूह के मुखिया, या मंत्रिमंडल के सदस्य की हैसियत से वे शामिल थे, जुड़े हुए थे, जानकार थे, या फिर कम से कम नैतिक रूप से मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी में हिस्सेदार थे। ऐसे में इस यूपीए सरकार को इसके बचे कार्यकाल में वे एक दलविहीन राष्ट्रपति के रूप में किस तरह की सलाह दे पाएंगे? कल से देश के बहुत से लोग इस बात को लेकर उन पर फिदा हैं कि पचास बरसों का उनका बहुत से मंत्रालयों का अनुभव राष्ट्रपति के कामकाज में उनके काम आएगा। भारत के राष्ट्रपति को इतने लंबे राजनीतिक अनुभव से कोई फायदा हो या न हो, यूपीए सरकार के दो कार्यकालों के भागीदार के रूप में उनके सामने राष्ट्रपति के कामकाज में अड़चन और दुविधा जरूर आएंगी।
हम उस बात पर लौटें जिससे कि आज के इस मुद्दे पर लिखना तय किया था। भारत को राजतंत्र के रीति-रिवाजों से ऊपर उठकर एक जनतंत्र बनना चाहिए जिसमें कि सारी जनता बुनियादी तौर पर बराबर मानी जाए। किसी भी जनता को किसी अतिरिक्त सम्मान की जरूरत नहीं होनी चाहिए, हर किसी को उनके काम की सहूलियत के लिए जरूरी सुविधाएं मिलनी चाहिए। इस मौके पर सामंती रीति-रिवाजों की चर्चा करते हुए हम यह भी गिनाना चाहेंगे कि दूसरे लोगों की कीमत पर जब इस लोकतंत्र की कुछ कुर्सियों पर बैठे लोग अपने लिए अधिक सुविधाएं जुटाते हैं, अधिक रियायतें पाते हैं, और खासकर तब जबकि उनसे उनके काम का कोई लेना-देना नहीं होता, तो वह सिलसिला अलोकतांत्रिक होता है। अन्ना की टोली को आरोपों को जुर्म बताने की सोची-समझी साजिश से बचना चाहिए, और किसी को भी राष्ट्रपति के ओहदे और दफ्तर को किसी गैरजरूरी इज्जत का हकदार नहीं मानना चाहिए। जो जहां काम करें, वहां गर अच्छे से काम करें, तो ही उन्हें इज्जत का हकदार मानना चाहिए। यूपीए सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री की हैसियत से प्रणब मुखर्जी पिछले आठ बरसों में उस सरकार के अपराधों को रोक पाने में पूरी तरह नाकामयाब रहे हैं। अब वे कांगे्रस पार्टी को बचाने के दौर से बाहर आ गए हैं और राष्ट्रपति की हैसियत से अब उन्हें देश को बचाने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन अपने साथियों, अपनी पार्टी, अपनी सरकार के जुर्म के जानकार रहते हुए वे अब अचानक किस तरह से एक नई नैतिकता की बात करेंगे, यह सोचना थोड़ा मुश्किल है।

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