30 जुलाई 2012
संपादकीय
आज अचानक एक बार फिर बहुत सारी ट्रेन और बस-ट्रक दुर्घटनाओं की खबरें हैं। सब खबरों को जोड़ें तो शायद सौ लोग आज के आज मारे गए हैं। यही हादसा दुनिया के किसी विकसित देश में हुआ होता तो वहां की सरकार हिल गई होती, या कम से कम किसी बीमा कंपनी को सदमा पहुंच गया होता। लेकिन भारत में जिंदगी की कीमत और अहमियत नहीं के बराबर है इसलिए यहां थोक में लाशें उठती हैं और जिंदगी उसी तरह चलती रहती है। देश की एक प्रमुख ट्रेन के डिब्बे में लगी आग में पचास से अधिक मौतों की खबर है, और यह सोच पाना मुश्किल है कि अंतरिक्ष में पहुंचा हुआ देश ऐसे हादसों से बचने की तैयार क्यों नहीं कर पाता और अगर आग लग ही जाए तो उसे बुझाने की तरकीबें वहां क्यों नहीं कर पाता। कहीं स्कूल बस चलाता हुआ ड्राइवर मोबाईल फोन पर बात करते हुए बस को ट्रेन के सामने खड़ा कर देता है और बच्चे मारे जाते हैं। कहीं पर किसी दूसरी वजह से हादसा होता है।
देश में ट्रैफिक के नियमों से लेकर रेलगाडिय़ों की सुरक्षा तक, एक तरफ तो सरकार की तरफ से कमी रहती है, और दूसरी तरफ लोग भी अपनी खुद की हिफाजत का ख्याल नहीं करते हैं। दुपहिया गाडिय़ों पर चलते लोग आए दिन मारे जा रहे हैं, लेकिन अगर हेलमेट लगाने उन्हें कहा जाए तो आंदोलन शुरू हो जाता है। बेदिमाग लोग ऐसे नियमों के खिलाफ जनता को भड़काते हैं और बेदिमाग लोग यह मानकर चलते हैं कि हेलमेट जैसे नियम पुलिस के अपने फायदे के लिए हैं और जनता उन्हें क्यों माने। इसी तरह लोग महंगी कारें खरीदते हैं, तेज रफ्तार से चलाते हैं लेकिन बेल्ट लगाने से बचकर अपने-आपको होशियार समझते हैं, मानो बेल्ट टै्रफिक पुलिस की हिफाजत के लिए है। यह पूरा सिलसिला इस देश में लोगों में साधारण समझ और समझबूझ की कमी का सुबूत है। लोग लाख रूपये की मोटरसाइकिल अपने बच्चे को लेकर देते हैं, लेकिन उसे हेलमेट लगाने को नहीं कहते।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के लिए हमारी यही सलाह है कि सड़कों पर होने वाली अंधाधुंध मौतों को देखते हुए ट्रैफिक के सारे नियमों को कड़ाई से लागू करना चाहिए। आज हालत यह है कि एक-एक गाड़ी में उनकी निर्धारित क्षमता से दो गुने बच्चे को लादकर स्कूल ले जाया जाता है, और जिस दिन ऐसे किसी वाहन का एक्सीडेंट होगा, बड़ी संख्या में मौतें होंगी। कभी-कभी सरकारी विभाग भारी उगाही की वजह से कानून तोडऩे वालों के साथ रियायत करते हैं, और कभी-कभी निर्वाचित नेता वोटरों की नाराजगी से बचने के लिए किसी नियम को कड़ाई से लागू नहीं होने देते। इन दोनों के बीच एक नौबत यह भी है कि इतनी आबादी वाले देश-प्रदेश में अगर लोगों की सुरक्षा के नियम भी लाठी लेकर पुलिस को ही लागू करवाने हों, तो उतनी पुलिस आखिर इसी जनता के पैसों से ही तो तैनात होगी। इसलिए समाज को ही यह साबित करना होगा कि उसके पास दिमाग है, सिर्फ घमंड नहीं है।

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