एनडी तिवारी से डीएनए तिवारी तक


28 जुलाई 2012
संपादकीय
कल से पूरे देश में एक शक खत्म हुआ और एक मजाक शुरू हुआ। नारायण दत्त तिवारी एक वक्त कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े नेताओं में से हुआ करते थे और मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, राज्यपाल जैसे कई ओहदों पर वे अपनी पूरी जिंदगी गुजारते आए हैं। अब एक अदालत की जबर्दस्ती के बाद बलपूर्वक लिया गया उनका खून यह साबित कर गया कि वे उस नौजवान के पिता हैं जो अपनी मां के साथ इस बात को साबित करने के लिए बरसों से अदालत में खड़ा था। यूं तो इस मामले को एक निजी मामला कहकर इसे तूल न देने की उम्मीद नारायण दत्त तिवारी ने की है लेकिन आज यह नैतिक सवाल उठता है कि इस मामले से जुड़े हुए सार्वजनिक महत्व के पहलुओं को अनदेखा करके क्या उन्हें एक बुजुर्ग की तरह बख्श दिया जा सकता है? या सार्वजनिक के हित में इस पूरे मामले पर आगे बहस होनी चाहिए जिससे कि ऐसे बदमजा और मामले न खड़े हो सकें। 
आज से बत्तीस बरस पहले जब नारायण दत्त तिवारी अधेड़ हो चुके थे तब कांग्रेस पार्टी की राजनीति में महत्वाकांक्षा रखने वाली एक शादीशुदा महिला से उनके संबंध हुए और यह बेटा पैदा हुआ। यह एक हादसे का नतीजा नहीं था बल्कि उस महिला से उनके बरसों तक रिश्ते रहे। इसकी सैकड़ों तस्वीरें गवाह हैं, और यह बेटा अपने आपको एन डी तिवारी का बेटा साबित करते हुए जाने कितने बरस से अवैध संतान कहलाने की बदनामी भी ढो रहा था। यहां पर हम इस भाषा को लेकर कहना चाहेंगे कि कोई भी बच्चा या बच्ची कभी अवैध नहीं होते। समाज में किसी औरत-मर्द के रिश्ते शादी के बाहर के हो सकते हैं, आपसी रिश्तों में कुछ वर्जित मामले हो सकते हैं, लेकिन औरत-मर्द के किसी फैसले, किसी गलती या किसी गलत काम से पैदा होने वाले बच्चे का उस फैसले से, गलती या गलत काम से कुछ भी लेना-देना नहीं होता। ऐसे बच्चे पूरा हक लेकर एक इंसान की तरह धरती पर आते हैं, और गैरजिम्मेदार समाज की गालियां का बोझ ढोते हैं। 
इस मामले को हम एक बुजुर्ग की किसी पुरानी गलती को मानकर छोड़ भी देते, लेकिन अदालत का फैसला आ जाने के बाद, उसके पहले डीएनए जांच का फैसला आ जाने के बाद भी जिस तरह से एन डी तिवारी इसे अपने खिलाफ साजिश कह रहे हैं, उससे वे किसी हमदर्दी या रियायत के हकदार नहीं रह जाते, बल्कि वे एक तिरस्कार और मखौल का सामान ही रह गए हैं। शादी से परे औरत-मर्द के रिश्ते में कोई अनोखी बात नहीं है, दुनिया में ऐसे अनगिनत मामले रहते हैं। यह भी रहता है कि सामाजिक और सार्वजनिक प्रतिष्ठा के फेर में लोग बहुत से मामलों में एक कड़वे सच को नकारने के लिए आखिरी दम तक कोशिश करते हैं, और वही कोशिश एन डी तिवारी ने भी की। लेकिन आज जब वे इसे अपने खिलाफ साजिश कह रहे हैं, तो यह साबित होता है कि न तो उनका बेटा, न बेटे की मां साजिश कर रहे हैं, बल्कि एन डी तिवारी का अपना डीएनए ही शायद उनके खिलाफ साजिश कर रहा है। ऐसी गंदी बात कहने की वजह से वे अब सिर्फ आलोचना के लायक हैं, कि अपनी औलाद को वे सामाजिक अपमान और तिरस्कार देते हुए एक हल्के इंसान ही साबित हुए हैं। दूसरी बात यह भी नहीं भूलना चाहिए कि एन डी तिवारी के चाल-चलन में सिर्फ यही एक बात अकेली गलती नहीं थी। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें आन्ध्र का राज्यपाल बनाया था और वहां राजभवन के बिस्तर से उनकी जो स्टिंग ऑपरेशन वाली वीडियो पूरे इंटरनेट पर छाई हुई हैं, और जिसकी वजह से उन्हें वह कुर्सी छोडऩी पड़ी, उसे भी भुलाना नहीं चाहिए। वे जनता के पैसों वाले राजभवन में रंगरेलियां मना रहे थे और यह बात सार्वजनिक जीवन के मूल्यों के भी खिलाफ है और जनता पर लदने वाले राजभवन के खर्च को भी नहीं भूला जा सकता। 
हम किसी इंसान की अपनी देह की जरूरतों को अनदेखा करना नहीं चाहते। लेकिन जब यह पूरा सिलसिला एक राजनीतिक दल के नेता का, उस पार्टी की महत्वाकांक्षी महिला के शोषण से जुड़ा हुआ हो, तो उसे सार्वजनिक नजरिए से भी देखना जरूरी है। और राजभवन के रंगीले वीडियो तो कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार दोनों के लिए शर्मनाक सुबूत हैं। इस मामले पर लिखना आज हमें इसलिए भी जरूरी लग रहा है कि ऐसे ही मौके होते हैं जब बाकी लोग इससे सबक ले सकें। क्लिंटन से लेकर दुनिया के अनगिनत नेताओं के सामने ऐसे मौके आते हैं जब उनके भीतर का विश्वामित्र भी मेनका के सामने पिघल जाता है। लेकिन इसकी कीमत सार्वजनिक जीवन में बहुत लंबी चुकानी पड़ती है। नारायण दत्त तिवारी की एक बड़ी कमजोरी यह रही कि जब उनका खरा बेटा अदालत में बाप साबित करने की लड़ाई लड़ रहा था तब भी वे वानप्रस्थ आश्रम की उम्र में राजभवन में रंगीनियों में डूबे हुए थे। उनकी जवानी में न खुफिया कैमरे रहे होंगे और न ही डीएनए जांच की सहूलियत थी। आज का जमाना अधिक खतरनाक है, ऐसे दुस्साहसी लोगों के लिए। इसलिए सबको सचेत करने के लिए आज यहां इस मुद्दे पर लिखा जा रहा है। 

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