25 जुलाई 2012
संपादकीय
भारत के नए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आज कहा कि गरीबी को दूर करना देश की सबसे बड़ी जरूरत है। देश के 13वें राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के तुरंत बाद अपने पहले भाषण में उन्होंने ने कहा कि आधुनिक भारत के शब्दकोश में गरीबी जैसे शब्द की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। भारत के विकास में गरीबों की हिस्सेदारी की वकालत करते हुए प्रणब मुखर्जी ने कहा कि भूख से बड़ा कोई अपमान नहीं है। राष्ट्रपति ने कहा कि हमारा विकास वास्तविक लगे इसके लिए जरूरी है कि हमारे देश के गरीब से गरीब व्यक्ति को महसूस हो कि वह उभरते भारत की कहानी का एक हिस्सा है। भ्रष्टाचार की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कभी-कभी पद का भार व्यक्ति के सपनों पर भारी पड़ जाता है। भ्रष्टाचार एक ऐसी बुराई है जो देश की मनोदशा में निराशा भर सकती है और इसकी प्रगति को बाधित कर सकती है। हम कुछ लोगों के लालच के कारण अपनी प्रगति की बलि नहीं दे सकते।
प्रणब मुखर्जी के रूप में देश को आज चर्चा में आए तमाम नामों के मुकाबले अधिक तजुर्बेकार राष्ट्रपति मिला है, लेकिन गरीबी और भूख की उनकी बातें क्या ऐसे मौके के समारोह में आमतौर पर कही जाने वाली खोखली बातों से कुछ अधिक हैं? सच तो यह है कि आजादी से लेकर अब तक जिस व्यक्ति ने भारत की अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक काम किया, वे प्रणब मुखर्जी ही रहे। वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने कई बजट पेश किए, और इससे परे भी वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में कई दशकों से सबसे महत्वपूर्ण मंत्रियों में से एक रहे। इसके बाद भी आज अगर अनाज के गोदामों में जगह न होने से खुले आसमान तले अनाज सड़ रहा है, देश के बच्चे अफ्रीका के देशों से भी बुरे कुपोषण के शिकार हैं और प्रणब मुखर्जी की कल तक की पार्टी के मंत्री, मुख्यमंत्री, उस पार्टी के कलमाड़ी, उसके गठबंधन के राजा जैसे लोग अगर एक हिंसक सीमा तक दौलत इक_ी करते हैं, और भ्रष्टाचार के नए-नए 'आदर्शÓ स्थापित करते हैं, तो आज ऐसे प्रणब मुखर्जी के ऐसे दर्द में वजन एकदम से कैसे आ जाएगा? उनकी बातें, उनके कल तक के इतिहास को देखते हुए, और उनकी कल तक की पार्टी की आज की सरकार को देखते हुए आंसू के शक्ल के बनाए गए एक दानवाकार गुब्बारे की तरह हैं जिनके भीतर भरी हुई हवा से अधिक कोई वजन नहीं है। भूख को अगर वे एक अपमान मान रहे हैं, और बंगाल में अपने बचपन में लाखों लोगों को मार डालने वाले अकाल का अपने-आपको गवाह बता रहे हैं, तो यह देश एकदम से अपने सारे अनुभव को भुलाकर उनकी बातों को पचा नहीं पाएगा। प्रणब मुखर्जी अपनी पार्टी के एक बहुत अच्छे मैनेजर रहे, सरकार के एक काबिल मंत्री रहे, देश के बड़े-बड़े उद्योगों से अरबों का चंदा जुटाने की काबिलीयत रखने वाले कारोबार के भरोसेमंद नेता रहे, लेकिन कभी भी वे भूख को मिटाने के लिए नहीं जाने गए। उनसे अंबानियों की भूख तो मिटी, लेकिन कालाहांडी में दम तोड़ते लोगों की भूख नहीं मिटी। इसलिए आज हम उनकी नीयत पर शक किए बिना इतना जरूर याद करना चाहते हैं कि कल तक उनका अपना खुद का रिकॉर्ड क्या रहा है? क्या कल तक जब सुप्रीम कोर्ट सड़ते हुए अनाज-गोदामों को गरीबों में बांट देने का हुक्म दे रहा था तब प्रणब मुखर्जी की ही सरकार उनकी ही अगुवाई के वित्त मंत्रालय की तरफ से इसके खिलाफ अदालत में नहीं खड़ी थी? इसलिए आज के शपथ ग्रहण के जलसे में उनकी कही हुई बातों को ईमानदार साबित करने के लिए उनको अपने ही मातहत जिंदगी भर काम करने वाले कांग्रेसियों पर जो दबाव बनाना होगा, उसके लिए नैतिक अधिकार कहां से आएगा? अब कानूनी रूप से प्रणब मुखर्जी कांगे्रस के नहीं रह गए हैं, और सरकार का हिस्सा भी नहीं रह गए हैं। अब अगले पांच बरस उनके पास खोने को कुछ नहीं है, सिवाय अपने विश्वसनीयता के। इसलिए बेहतर यही होगा कि गरीबी और भूख के बारे में आज की कही हुई अपनी बातों को लेकर वे इस सरकार पर मेहनत करें और अपने सारे घोषित और अघोषित अधिकारों और प्रभाव का इस्तेमाल करके अपनी आज की भावना को ईमानदार साबित करें। उन्होंने बचपन में बंगाल के अकाल में लाखों मौतों को करीब से देखा है, और इसके बाद से आधी सदी, पौन सदी वे इस दर्द से मानो अछूते रहकर, बेअसर रहकर सत्ता की राजनीतिकरते रहे। अब आखिरी वक्त में ईमानदारी से भूख को मिटाने की कोशिश उनको करनी चाहिए।

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