संपादकीय
7 जुलाई 2012
दिल्ली में एक ऐसी हवा चल रही है कि अब प्रणब मुखर्जी वित्त मंत्री नहीं हैं तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश की आर्थिक नीतियों में कुछ ऐसे फेरबदल करेंगे जिनसे कि हालात सुधर जाएंगे। हो सकता है कि ऐसी खबरें उस मीडिया के कुछ लोग फैला रहे हैं जो कि किसी एक नेता या पार्टी का भला करने के लिए ओवरटाईम करते हों या किसी का बुरा करने के लिए। और इससे एक ऐसी तस्वीर भी बनती है कि वित्त मंत्री के रूप में प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के काबू के बाहर रहे हों। यह बात सही है कि प्रणब मुखर्जी मनमोहन सिंह के मुकाबले सरकार को अधिक चला रहे थे और वे कांगे्रस पार्टी के भीतर भी अधिक ताकतवर थे, लेकिन ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि इन दोनों के बीच कोई ऐसे मतभेद थे कि वित्त मंत्रालय हाथ आते ही मनमोहन सिंह नीतियों और कार्यक्रमों में फेरबदल करने लगे हैं। लेकिन एक दूसरी खबर, जिसकी वजह से आज हम इस मुद्दे शुरू करके बात को आगे बढ़ाना चाहते हैं, वह है सोनिया गांधी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की। इस कमेटी को एक सरकारी दर्जा दिया गया है और सोनिया गांधी ने इनमें शुरू से ऐसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को रखा है जिनके बागी तेवर कई-कई बार सार्वजनिक रूप से सरकार के खिलाफ रहते हैं, और बहुत से लोग यह मानते हैं कि ये लोग सरकार के लिए परेशानी भी खड़ी करते हैं। योजना आयोग से लेकर वित्त मंत्रालय तक और मनमोहन सिंह तक की नाराजगी इस परिषद से बनी रहती है और इसके सदस्य इससे बेपरवाह अपना काम करते रहते हैं।
भारत में जनकल्याणकारी सरकारी कार्यक्रमों का इतिहास जब लिखा जाएगा तो इन बरसों में एनएसी नाम से चर्चित इस समूह का जिक्र होगा कि इसने सबसे गरीब लोगों के हकों के लिए सोनिया गांधी को बहुत सी बातें समझाईं। दरअसल विदेशी मूल की महिला होने के नाते और नेहरू-गांधी परिवार की राजनीति से हमेशा दूर रहने वाली सोनिया गांधी की समझ देश के मामलों में उतनी अधिक हो नहीं सकती थी जितनी कि भारत में पैदा और यहीं की राजनीति में शुरू से हिस्सेदार रही किसी महिला की हो सकती थी। इसकी कमी उन्होंने शायद देश के बड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं की ऐसी सलाहकार परिषद बनाकर की, जिसकी राय परंपरागत रूप से चुनावी राजनीति और भ्रष्टाचार से लदी हुई कांगे्रस पार्टी की राय से अलग चलती हो। यह एक हिसाब से नीतियां बनाने में एक अच्छी पहल थी क्योंकि सरकार को अपने ढांचे से बाहर के कुछ जानकार, और अच्छे लोगों की राय को मतभेद के बावजूद सुनने की आदत डालनी चाहिए। बाहर बैठे हुए और काम कर रहे लोगों का नजरिया बहुत से मामलों में भीतर के ढांचे में घिस-पिटे लोगों के काम का हो सकता है। सरकारी काम में किसी दखल के बिना सोनिया गांधी की यह सलाहकार परिषद वैचारिक रूप से कई चुनौतियां मनमोहन-सरकार के सामने खड़ी करते रही, और इन दिनों लगातार हम एनएसी की असहमति वाली खबरें छाप भी रहे हैं। अभी-अभी पिछले दिनों सोनिया गांधी ने इस कमेटी में कुछ चर्चित नामों का कार्यकाल पूरा होने पर, उनकी जगह कुछ दूसरे लोगों को रखा जो कि लंबे समय से सामाजिक कार्यकर्ता बने हुए हैं।
सरकारों को अपने ढांचे के बाहर के लोगों को सुनना चाहिए। और ऐसी सलाह देने वाले लोग जब किसी सरकार या पार्टी में बहुत अधिक समय तक स्थाई हो जाते हैं, तो उनकी सलाह बाहर के किसी व्यक्ति की सलाह के बजाय, घर के भीतर की सलाह सरीखी हो जाती है। कोई एक अफसर अंतहीन समय तक एक ही विभाग की कुर्सी पर बना हुआ दिखे, कोई एक मंत्री किसी एक मंत्रालय पर ही जिंदगी भर बना रहे तो धीरे-धीरे उनसे मिलने वाला योगदान घटने लगता है। कोई भी व्यक्ति शुरू के कुछ बरसों में ही अपनी सारी अच्छी सोच को सामने रख सकते हैं, और उसके बाद सोच का नया खून आना कम हो जाता है। कुछ समय पहले भी हमने इस मुद्दे पर लिखा था, लेकिन आज प्रणब मुखर्जी और मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री रहने को लेकर फिर यह बात सूझ रही है कि इस देश की आर्थिक नीतियों और कार्यक्रमों के मामले में वित्त मंत्रालय का काम उन्हीं घिसे-पिटे या बहुत इस्तेमाल हो चुके पुराने दिमागों को देने के बजाय किसी नए और काबिल व्यक्ति को यह काम देना चाहिए। लोगों को खुद ही एक काम की महारत के बाद दूसरे काम को सीखने और करने की चुनौती लेना चाहिए। इसलिए अब यह वक्त आ गया है कि मनमोहन सिंह की जगह कोई और वित्त मंत्रालय को संभाले। बीरबल चाहे कितना ही काबिल सलाहकार क्यों न रहा हो, वह अकबर के समय से आज के योजना आयोग तक लगातार कामयाब नहीं हो सकता था।

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