संपादकीय
9 जुलाई 2012
पिछले कुछ महीनों से केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को आर्थिक पैकेज देने या न देने की खबरें जोरों पर हैं। पाठकों को याद होगा कि हमने इसी अखबार के पहले पन्ने पर एक पिक्सटून बनाकर छापा था कि यूपीए सरकार अपने राष्ट्रपति के लिए दुनिया का सबसे महंगा भाड़े का घर ले रही है। गैरयूपीए पार्टियों के सांसदों और विधायकों के वोट पाने के लिए वित्त मंत्री के रूप में प्रणब मुखर्जी जाते-जाते खुद इन पार्टियों की सरकारों वाले राज्यों को बड़े-बड़े पैकेज दे रहे थे या कि अब यूपीए सरकार उनके जाने के बाद देगी, या कि राष्ट्रपति चुनाव निपट जाने के बाद राज्यों को भेदभाव वाली ऐसी अतिरिक्त मदद मिलेगी, इसका विश्लेषण कुछ हफ्तों बाद ठीक से हो पाएगा। लेकिन हमारे इस मुद्दे पर लिखने और पिक्सटून बनाने के कई दिन बाद उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने इस बात को उठाया। और आज दो बड़ी खबरें इसी अखबार में हम ले रहे हैं कि किस तरह कुछ राज्यों को बहुत बड़े-बड़े आर्थिक पैकेज की चर्चा है।
इस पूरे सिलसिले से हमको एक ऐसे सैद्धांतिक सवाल पर फिर चर्चा की जरूरत लगती है जो कि अभी कोई उठा नहीं रहा है। अभी चंंूकि गरमागरम राजनीति चल रही है इसलिए लंबी सैद्धांतिक बहस का मौका शायद लोगों को नहीं लग रहा है लेकिन केंद्र-राज्य संबंधों पर एक बार फिर बात होनी चाहिए। भारत के संघीय ढांचे में केंद्र सरकार के इस तरह के विवेक के आबंटन घटने चाहिए। जब किसी व्यक्ति या पार्टी की मर्जी से जनता के खजाने का पैसा एक राज्य को कम और दूसरे राज्य को अधिक जा सकता है, तो वह सिलसिला लोकतांत्रिक नहीं है। सरकारिया आयोग ने केंद्र और राज्यों के बीच जिम्मेदारियों और अधिकारों के बंटवारे को लेकर जितनी सिफारिशें की थीं, उनमें से अधिकतर पर अमल नहीं हुआ है। और बिना ऐसे अमल के तब तक तो मामला खिंच रहा था जब तक कि केंद्र में एक ऐसा कोई नेता राज कर रहा था जिसकी बात का पूरे देश में वजन था। आज न तो केंद्र में किसी एक पार्टी की ऐसी ताकत रह गई, और न ही गठबंधन की सरकार में किसी नेता कि ऐसी स्थिति है। कुछ छोटी-छोटी मिसालों को देखें तो बांग्लादेश के साथ रिश्ते देश की विदेश नीति के आधार पर तय नहीं हो सकते क्योंकि यूपीए की नींव की एक बड़ी ईंट कोलकाता में बैठकर उसे अपने राज्य के हितों के खिलाफ मानती है। फिर चाहे बांग्लादेश भारत के लिए परेशानी बनने वाली किसी बड़ी विदेशी ताकत के साथ जाने को बेबस ही क्यों न हो। इसी तरह जयललिता ने अभी तमिल भावनाओं का ख्याल रखते हुए तमिलनाडु से श्रीलंका के सैनिकों का हवाई-प्रशिक्षण रूकवाकर उन्हें वापिस भेजने पर दिल्ली को मजबूर कर दिया, और इसके बाद फिर चाहे श्रीलंका चीन पर आश्रित क्यों न हो जाए। इसी तरह का हाल दूसरे कई मामलों में केंद्र सरकार के राज्यों के साथ चल रहा है। आज भारत में न तो केंद्र राष्ट्रीय हितों के मामलों में इतना मजबूत है कि वह राज्यों को चुप करा सके, और न ही वह संघीय ढांचे के भीतर इतना कमजोर है कि राज्य उससे अपना हक आसानी से ले सकें। इसलिए एक बंदरबांट के अंदाज में जब दिल्ली में लाखों करोड़ों का बजट राज्यों के बीच बांटा जाता है तो राज्यों को शिकायत का मौका भी मिलता है।
ऐसी स्थिति का एक इलाज यह है कि राज्यों के बीच बंटवारे के न सिर्फ अधिक पारदर्शी पैमाने बनें, बल्कि योजना आयोग जैसे नीति-निर्धारक ढांचे में राज्यों के प्रतिनिधि भी बैठें। हम यह तो बिल्कुल ही नहीं कहेंगे कि राज्यों में केंद्रीय टैक्स कम कर दिए जाएं और राज्यों को खुद ही पूरा टैक्स लेने दिया जाए। क्योंकि हर राज्य की कमाई एक जैसी नहीं है, और भौगोलिक कारणों से कुछ राज्यों की जरूरतें अधिक हैं और उनकी इतनी कमाई मुमकिन नहीं है। इसलिए पूरे देश को बांधे रखने के लिए, लोगों के बीच कुछ हद तक बराबरी लाने के लिए केंद्रीय टैक्सों का ढांचा जरूरी भी है। इसके बिना गरीब या पिछड़े हुए, समुद्री सीमा से दूर घिरे हुए, कुदरती दिक्कतों को झेलते हुए राज्य देश की मूलधारा से कट जाएंगे। उत्तर-पूर्वी राज्यों से बाकी देश के बहुत अधिक कमाई नहीं मिलती, लेकिन दो-तीन देशों के साथ फौजी सरहद पर वे ही प्रदेश चौकसी का काम करते हैं।
कुल मिलाकर बात यह है कि केंद्र में एक ऐसी भरोसेमंद और ताकतवर सरकार होनी चाहिए जो कि राज्यों को देश के हित के मुद्दे ठीक से समझा भी सके, और क्षेत्रीय समीकरणों के सामने बेबस होकर जिसे बिछना न पड़े। दूसरी तरफ राज्यों को केंद्रीय खजाने से अधिक न्यायसंगत और तर्कसंगत आधार पर हिस्सा मिलना चाहिए, न कि परमाणु-समझौते और राष्ट्रपति चुनाव में इन राज्यों के वोटों के आधार पर।

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