ऐसे तमाम मर्दों को भी हाथ बंटाना चाहिए जिनको किसी महिला ने जन्म दिया

संपादकीय
19 मार्च 2019



वैसे तो 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर किसी नसीहत का वक्त तकरीबन निकल चुका है लेकिन एक मुद्दा ऐसा जिस पर चर्चा जरूरी है। भारत में संसद में कुल ग्यारह फीसदी सीटों पर महिलाएं हैं। देश की आधी आबादी संसद और विधानसभाओं से लगभग गायब है। कहने के लिए तैंतीस फीसदी सीटों पर महिला आरक्षण का झांसा दशकों से जारी है, और राजनीतिक दल अपनी आदतन बेईमानी के चलते, मर्दाना दबदबे के चलते इस झांसे को हकीकत में बदलने से बचे रहते हैं। लेकिन दो पार्टियों ने हौसला दिखाया है, ओडिशा में नवीन पटनायक ने तीस फीसदी टिकटें महिलाओं को दी हैं, और बंगाल में ममता बैनर्जी ने चालीस फीसदी। इससे बाकी पार्टियों के सामने भी एक दुविधा जरूर खड़ी हुई होगी, लेकिन इसका कोई खास असर अभी दिख नहीं रहा है। कांगे्रस अध्यक्ष राहुल गांधी यह बयान जरूर दे रहे हैं कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनी, तो वे महिला आरक्षण बिल पास करवाकर तैंतीस फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रखवाएंगे। लेकिन इंदिरा और सोनिया की इस पार्टी ने लगातार दस बरस सत्ता में रहने पर भी यह बिल क्यों पास नहीं करवाया, इसका कोई जवाब राहुल के पास है नहीं। हकीकत तो यह है कि राहुल को जो बात पसंद नहीं आई, उस अध्यादेश को उन्होंने मनमोहन सरकार के खिलाफ जाकर दिल्ली पे्रस क्लब में प्रेस कांफे्रंस के बीच फाड़कर फेंक दिया था, और मनमोहन सरकार को मनमसोस सरकार बनकर उनके फैसले को सिर पर बिठाना पड़ा था। अब अगर महिला आरक्षण को लेकर यूपीए के दस बरसों में राहुल अगर सांसद रहते हुए आमरण अनशन पर बैठ गए होते तो बात की बात में वह लागू हो चुका रहता। लेकिन कांग्रस के हाथ से भी वह मौका निकल चुका है और अब वह मौका खोकर एक चुनावी वायदा हाथ में लेकर खड़ी हुई है। दूसरी तरफ भाजपा ऐसे किसी वायदे को छू भी नहीं रही है।
इस नौबत का जनता की तरफ से एक इलाज हो सकता है। चूंकि वोटरों की आधी आबादी महिलाओं की है, इसलिए अगर वे यह तय कर लें कि वे अपने चुनाव क्षेत्र की सबसे अच्छी महिला उम्मीदवार को ही जिताएंगी, फिर चाहे वह किसी भी पार्टी की हो, तो अपने-आपको राष्ट्रीय या ताकतवर कहने वाली पार्टियों की अक्ल पलभर में ठिकाने लग जाएगी। और ऐसा करने के लिए किसी राजनीतिक पहल की जरूरत नहीं है, महिला अधिकारों को लेकर, मानवाधिकार को लेकर, सामाजिक न्याय को लेकर लडऩे वाले कोई संगठन भी सोशल मीडिया के रास्ते सड़क तक ऐसा एक आंदोलन खड़ा कर सकते हैं जिससे अगले कुछ हफ्तों में ही हवा बन जाए। इस देश ने सोशल मीडिया पर ऐसे कई अभियान देखे हैं, जैसे मी-टू, या चौकीदार चोर है, या मैं भी चौकीदार। इसलिए अगर हर लोकसभा क्षेत्र को लेकर सोशल मीडिया पर ऐसी कोई मुहिम छेड़ी जाए कि मेरी सांसद एक महिला ही होगी, और ऐसी मुहिम अगर जोर पकड़ ले, तो बड़ी-बड़ी स्थापित पार्टियों का सारा हिसाब-किताब गड़बड़ा जाएगा।
भारत की महिलाओं को अपने जायज हक के लिए किसी पार्टी या किसी कानून का मोहताज नहीं होना चाहिए। उनके बीच इतना दमखम है कि वे खुद होकर ऐसी नौबत खड़ी कर सकती हैं कि पार्टियां गिरते-पड़ते दौड़ें, और जाकर महिला आरक्षण लागू करें। दुनिया के इतिहास में बहुत से जायज हक मांगे नहीं मिलते हैं, उन्हें छीनकर लेना पड़ता है, और यह छीनना बलपूर्वक नहीं होता है। जिस तरह गांधी ने अंगे्रजों से आजादी अहिंसा और शांति के साथ छीनकर ली थी, उसी तरह का काम भारत की महिलाएं भी कर सकती हैं। यह कहना राजनीतिक दलों की खालिस और खासी बेईमानी है कि उन्हें लोकसभा सीट के स्तर पर मजबूत महिला उम्मीदवार नहीं मिलतीं। जिस देश में पंचायत स्तर पर पंच और सरपंच के लिए आरक्षित तबके तक की महिला गांव-गांव तक मिल जाती हैं, शहर के एक-एक वार्ड में आरक्षित वर्ग की महिला उम्मीदवार मिल जाती हैं, पालिका अध्यक्ष और म्युनिसिपल के लिए महापौर की महिला उम्मीदवार मिल जाती हैं, लेकिन पार्टियों को विधानसभा और लोकसभा सीटों के लिए महिला उम्मीदवार नहीं मिलेंगी! यह पूरी तरह बेईमानी से भरा हुआ झांसा है, और जो पार्टी एक तिहाई टिकटें महिलाओं को न दें, उनके खिलाफ महिलाओं को एक होकर अपने चुनाव क्षेत्र की किसी महिला को ही वोट देना चाहिए। अगली सरकार बनाने के लिए एनडीए और यूपीए के सारे सपने चकनाचूर हो जाएंगे, और इस चकनाचूर कांच के टुकड़ों से बसंती के पैर क्यों लहूलुहान हों, राजनीतिक गब्बरों के पैर लहूलुहान होने चाहिए। इसी चुनाव में जो पार्टी एक तिहाई महिला उम्मीदवार न रखे, उसके उम्मीदवार की जगह किसी भी अच्छी महिला को वोट देकर गब्बरों को सजा देना चाहिए। और यह काम महज महिलाएं करें यह भी जरूरी नहीं, ऐसे तमाम मर्दों को भी इस काम में हाथ बंटाना चाहिए जिनको किसी महिला ने जन्म दिया है। 


(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

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