संपादकीय
31 मार्च 2019

सुप्रीम कोर्ट के एक चर्चित वकील, बागी तेवरों वाले प्रशांत भूषण ने कहा है कि भाजपा लोकसभा का यह चुनाव जीतने के लिए 90 हजार करोड़ रूपए खर्च करेगी। यह रकम इतनी बड़ी है कि इसके बारे में कोई अंदाज लगाना भी आसान नहीं है, लेकिन देश की 543 लोकसभा सीटों पर अगर सब जगह भाजपा उम्मीदवारों पर खर्च करेगी, तो भी हर सीट पर करीब 165 करोड़ रूपए खर्च हो सकते हैं। ये आंकड़ा किसी तरह विश्वसनीय नहीं लग रहा है, और बिना सुबूतों की संभावना के भी ऐसा बयान भाजपा को एक विश्वसनीयता देने के अलावा और कुछ नहीं करता। लेकिन इससे परे एक दूसरी बात समझने की जरूरत है कि एक लोकसभा सीट के लिए चुनाव आयोग द्वारा तय की गई अधिकतम खर्च की सीमा, 70 लाख रूपए का सम्मान बड़ी पार्टियों के कोई नेता नहीं करते। लेकिन चुनाव में सीटों पर खर्च दो तरीके से होता है, एक तो उस सीट पर होने वाला स्थानीय खर्च, और दूसरा पार्टी द्वारा प्रदेश या देश के स्तर पर किया जाने वाला खर्च जो कि उम्मीदवार की खर्च सीमा में नहीं आता।
देश में गंभीर उम्मीदवारों में शायद वामपंथी उम्मीदवार ही ऐसे रहते हैं जो कि सीमा के भीतर खर्च करते हैं, और सीमा से कम ही खर्च करते हैं। बाकी तमाम बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां, और प्रदेश स्तर पर दमखम रखने वाली पार्टियां बेतहाशा खर्च करती हैं, और उम्मीदवार भी अपने स्तर पर ऐसा ही खर्च करते हैं। एक राष्ट्रीय पार्टी के बारे में हमेशा यह चर्चा रहती है कि उसकी अध्यक्ष दस-बीस करोड़ रूपए लेकर लोकसभा की टिकट देती हैं, और सौ-पचास करोड़ रूपए लेकर लोगों को राज्यसभा भेजती हैं। अब ऐसी बातों का कोई सुबूत तो है नहीं, इसलिए उनके नाम सहित इस बात को लिख पाना मुमकिन नहीं है। लेकिन ऐसी चर्चा कुछ दूसरी पार्टियों के लिए भी बाजार में रहती है, और पंजाब के चुनावों में आज से दस बरस पहले एक बड़ी पार्टी के पैनल में आ चुके तीन नामों में से किसी एक को टिकट दिलवा देने पर भी पांच-पांच करोड़ रूपए का रेट दिल्ली के चुनावी बाजार में चल रहा था। छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव के कुछ महीने पहले ही विधानसभा के चुनाव हुए हैं जिनमें मोटा खर्च हुआ है। अब 90 विधानसभा सीटों की जगह कुल 11 लोकसभा सीटों का चुनाव होना है, और ऐसे में एक-एक लोकसभा सीट के तहत 7-8 विधानसभा सीटें रहेंगी, और कार्यकर्ता-मतदाता उसी तरह के खर्च की उम्मीद रखेंगे। छत्तीसगढ़ की एक सबसे महंगी लोकसभा सीट के बारे में एक बड़ी पार्टी के एक जानकार नेता का अंदाज है कि दोनों उम्मीदवारों की तरफ से 25-25 करोड़ रूपए खर्च होंगे। यह बात कुछ लोगों को अविश्वसनीय लग सकती है, और कुछ लोगों को भरोसेमंद भी। लेकिन यह खर्च 70 लाख रूपए की खर्च-सीमा से इतना अधिक है कि चुनाव आयोग के पर्यवेक्षक अगर चौकन्ने रहें, तो वे ऐसे अंधाधुंध खर्च के कई सुबूत की वीडियो रिकॉर्डिंग भी कर सकते हैं।
चुनावों में सीमा से बहुत अधिक खर्च का बड़ा साफ असर होता है कि पार्टियां अपनी सरकार चलते सौ किस्म के गलत काम करके धन्ना सेठों को उपकृत करती हैं, और उनसे मोटी रकम या तो पहले रखवा लेती हैं, या चुनाव के वक्त लेती हैं। दूसरी बात यह होती है कि एक बार जो किसी तरह सांसद बन गए रहते हैं, वे लोग अगले चुनाव की तैयारी में पांच बरस भ्रष्टाचार और दलाली करते गुजार देते हैं, ट्रांसफर-पोस्टिंग के कारोबार में लगे रहते हैं, अपने चुनाव क्षेत्र या अपने प्रदेश में चलने वाले बड़े कारखानों या बड़ी खदानों से मोटी उगाही करते रहते हैं। जब तमाम भ्रष्ट लोगों से वसूली ही उनका मकसद रहता है, तो जाहिर है कि ऐसे भ्रष्टाचार से जनता को बचाने की वे कोशिश भी नहीं कर सकते। छत्तीसगढ़ में हम देखते हैं कि कारखानों और खदानों के लिए पर्यावरण-मंजूरी की जनसुनवाई से लेकर बाद में उनके प्रदूषण और मजदूर कानूनों के उल्लंघन तक कोई भी सांसद कुछ भी नहीं बोलते, और अधिकतर विधायक भी चंदादाताओं को अनदेखा करते चलते हैं। चुनावों के महंगे होने से किसी गरीब पार्टी या गरीब उम्मीदवार की जीत की उम्मीद खत्म सी हो जाती है, और वोटरों को नगदी या सामान देकर खरीदे गए वोटों से पाई जीत से एक ऐसा झांसा खड़ा होता है कि ऐसे सांसद या विधायक जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। जबकि यह जीत के मैनेजमेंट और खरीददारी की क्षमता की कामयाबी का सर्टिफिकेट होता है। चुनाव आयोग भारत में हिंसा के बिना निष्पक्ष चुनाव करवाने में महज तकनीकी रूप से कामयाब है, वह चुनाव को प्रलोभनमुक्त करवाने की अपनी जिम्मेदारी को जरा भी पूरा नहीं कर पा रहा है। कल ही एक खबर थी कि किस तरह चुनाव में कालेधन को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने जितने किस्म के सुझाव मोदी सरकार को दिए थे, वे तमाम खारिज कर दिए गए, सरकार ने उन्हें मंजूर नहीं किया। ऐसी हालत में सुप्रीम कोर्ट को सोचना चाहिए कि उसकी दखल की गुंजाइश कहां निकलती है, और किस तरह वह लोकतंत्र को खरीदे गए तंत्र से अलग करने में अपनी जिम्मेदारी पूरी कर सकता है।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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