निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय

संपादकीय
29 मार्च 2019



मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए-1 सरकार का कार्यकाल यूपीए-2 सरकार से बेहतर माना जाता है कि पहले कार्यकाल में सरकार ने भ्रष्टाचार कम किया, या नहीं किया। इन दोनों कार्यकालों में एक ही फर्क था कि यूपीए-1 अपने दम पर बनी सरकार नहीं थी, और उसे वामपंथियों का बाहरी समर्थन हासिल था। चूंकि सरकार इस सहयोगी के प्रति जवाबदेह थी, इसलिए चौकन्ना भी थी, और वामपंथी अपने समर्थन से जुड़ी हुई अपनी साख का ख्याल रखते हुए सरकार से सवाल भी करते थे। यूपीए-2 को ऐसे समर्थन की जरूरत नहीं रही, और वे पांच साल घपलों से भरे हुए रहे। सरकार के घपलों पर अधिक चर्चा कोई नई बात नहीं होगी, लेकिन सरकार के हिस्सेदार या सरकार के समर्थक दलों से होने वाले नफे पर जरूर बात करनी चाहिए। 

पिछले पांच बरस इस देश ने देखा है कि किस तरह मोदी सरकार से लेकर महाराष्ट्र की राज्य सरकार तक शुरू में भागीदार रही शिवसेना बाद में किस तरह के बागी तेवरों के साथ गठबंधन सरकार से अलग हुई, और सरकार में रहते, या सरकार छोडऩे के बाद, उसने भाजपा और मोदी सरकार के सबसे कटु आलोचक के रूप में काम किया। अगर कतरनों को निकालकर देखा जाए तो शिवसेना ने मोदी के पूरे कार्यकाल में इंटनरल ऑडिटर का काम किया जो कि काम होने के साथ-साथ दफ्तर में बैठकर ऑडिट करते चलते हैं। राज्यों में जहां म्युनिसिपलों में परले दर्जे का भ्रष्टाचार होने का खतरा रहता है, वहां मध्यप्रदेश के जमाने से छत्तीसगढ़ ने इंटरनल ऑडिटर देखे हैं, और इनका फायदा भी देखा है। ठीक इसी तरह मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के तमाम विवादास्पद फैसलों और कामों पर शिवसेना पूरे वक्त चढ़ाई करते दिखती थी, और कई मौकों पर वह कांग्रेस के मुकाबले भी अधिक कटु आलोचक रहती थी। खैर, अब चुनाव के कुछ हफ्ते पहले भाजपा और शिवसेना का चुनावी तालमेल हो गया है, सीटों का बंटवारा भी हो गया है, और अब शिवसेना इन तमाम कतरनों को छोड़कर आगे बढ़ गई है। शिवसेना-भाजपा की विरोधी पार्टियां अगर समझदार चौकन्नेपन से काम लें, तो ये कतरनें पूरे चुनाव में उनकी खासी विश्वसनीय प्रचार सामग्री बन सकती हैं। 

राजनीतिक दलों को अगर अधिक कामयाब होना है, तो उन्हें पार्टी के भीतर पीछे के एक बंद कमरे में अपने सबसे कटु आलोचकों की एक ऐसी टीम को तनख्वाह पर रखना चाहिए जो कि घर के भीतर विपक्ष की तरह काम करके पार्टी को बड़ी गलतियों से बचाने के छोटे-छोटे काम रोजाना ही करती रहे। ब्रिटिश संसदीय प्रणाली में घोषित रूप से छाया मंत्रिमंडल की परंपरा है जिसमें सत्तारूढ़ मंत्रियों के कामकाज पर नजर रखने के लिए विपक्ष अपने एक-एक नेता को तैनात करता है। शिवसेना ने मोदी सरकार के भीतर और बाहर रहते हुए कुछ इसी किस्म का काम किया था। लेकिन आज जब हिन्दुस्तान लोकसभा चुनाव के दौर से गुजर रहा है तो ऐसा महसूस होता है कि हर संसदीय सीट पर सांसद के पीछे ऐसे शैडो-एमपी रहने चाहिए जो कि पूरे कार्यकाल सांसद के काम पर नजर रखें, कमजोरियों को दर्ज करें, और अगले चुनाव की तैयारियों में जुटे रहें। जब हर विधानसभा क्षेत्र और हर संसदीय सीट पर, सरकार के हर मंत्रालय या विभाग पर नजर रखने के लिए ऐसी गंभीर परंपरा शुरू होगी, तो उससे विधायक-सांसद, और मंत्रालयों के कामकाज पर रोजाना भी निगरानी रहेगी, और वहां पर बड़े-बड़े भ्रष्टाचार रूक सकेंगे, या देर से पकड़ आएंगे तो चुनाव के वक्त काम आएंगे।

संसदीय परंपरा में आलोचक-समर्थक, या निगरानी रखने वाले विरोधियों का अपना महत्व होता है। समझदार सरकार को कुछ ऐसे मुखर-आलोचक रखने चाहिए जिनके बारे में सदियों पहले जब लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं थी, उस वक्त कबीर कह गए थे- निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। कबीर कह गए थे कि जो निंदा करते हैं, उन्हें करीब रखना चाहिए, अपने ही आंगन कुटी बनाकर उन्हें बसाना चाहिए, क्योंकि वे बिना पानी या साबुन के हमारे स्वभाव को साफ करते रहते हैं। सदियों पहले की यह एक लाईन आज के हिन्दुस्तान के देश-प्रदेश की सरकारों को गड्ढे में जाने से बचाने की ताकत रखती है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें