कन्हैया को गैरभाजपा पार्टियां सर्वसम्मत उम्मीदवार बनाएं...

संपादकीय
28 मार्च 2019



जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार सीपीआई के सदस्य पहले से हैं, और अब वे बिहार के बेगूसराय से पार्टी की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। उनके खिलाफ भाजपा ने अपने एक बड़बोले बड़े नेता और मंत्री गिरिराज सिंह को उम्मीदवार बनाया है जो कि अपनी सीट बदलने को लेकर कुछ विचलित चल रहे हैं कि पार्टी ने उनसे बात किए बिना उनकी सीट बदल दी। कन्हैया कुमार उस वक्त सुर्खियों में आए जब जेएनयू में छात्र-छात्राओं का प्रदर्शन चल रहा था, और वामपंथी छात्र संगठन को बदनाम करने के लिए ऐसे झूठे वीडियो बनाए गए थे जिनमें भारत के खिलाफ नारे सुनाई पड़ते थे, और बाद में फोरेंसिक जांच में ये वीडियो गढ़े हुए, झूठे साबित हुए। इसके बाद अब जब कन्हैया कुमार मैदान में हैं, तो उन्होंने वामपंथी तौर-तरीकों से कुछ अलग जाकर इंटरनेट पर अपने लिए चंदा जुटाना शुरू किया है। अब तक 28 घंटे में 28 लाख रूपए जुट जाने की खबर है। कन्हैया कुमार के भाषणों के जो वीडियो चलन में हैं, और टीवी पर उनके जो इंटरव्यू दिखाई पड़ते हैं, वे लोगों को बांध लेते हैं कि देश के जटिल मुद्दों को कोई कितनी सरल भाषा में सामने रख सकता है। कन्हैया कुमार दिल्ली पुलिस के हाथों गिरफ्तारी और मुकदमेबाजी भी झेल चुके हैं, और बिहार में जहां कांग्रेस-लालू पार्टी ने दूसरी पार्टियों को साथ लेकर भाजपा के खिलाफ एक बड़ा गठबंधन बनाया है, उसने भी कन्हैया कुमार का साथ देने के बजाय बेगूसराय से राजद का उम्मीदवार खड़ा किया है। यह उम्मीद की जा रही थी कि नई पीढ़ी की नई रौशनी की तरह सामने आए, धर्मनिरपेक्षता के एक बड़े आंदोलनकारी, और साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक बड़े योद्धा की तरह सामने आए कन्हैया कुमार को मोदी विरोध का एक प्रतीक बनाते हुए सभी गैरएनडीए पार्टियां उनका साथ देंगी, लेकिन वैसा होते दिख नहीं रहा है। इन सबसे परे कन्हैया कुमार बेगूसराय से चुनाव लडऩे जा रहे हैं, और बिना किसी चर्चित वंश के, बिना किसी नेता के पसंदीदा हुए, पहली बार के वे ऐसे उम्मीदवार हैं जिनकी शोहरत अपनी पार्टी सीपीआई से भी अधिक है। लेकिन वामपंथी दलों में बूढ़ी हो चली पीढिय़ों के बोझतले दबे होने की जो समस्या है, उसे कम करने के लिए कन्हैया कुमार जैसे कुछ नौजवान लोगों को भी आगे लाने की जरूरत है जो कि पूरी तरह से वामपंथ के प्रति प्रतिबद्ध भी हैं, और संभावनाओं वाले भी हैं। 

चुनाव के वक्त जनता के बीच से इस तरह से पैसा इक_ा होना एक अच्छी बात है। एक तरफ जहां भाजपा और कांग्रेस जैसे पुराने और स्थापित दल बड़ी-बड़ी रकमों का चंदा पाते हैं, वहीं पर बिल्कुल ही फटेहाल कन्हैया कुमार को भी लोग जीतने लायक चंदा जुटाकर दे रहे हैं, यह छोटी बात नहीं है। देश में यह बात भी स्थापित होनी चाहिए कि चुनाव जीतने के लिए किसी का अरबपति या करोड़पति होना जरूरी नहीं है, जो उम्मीदवार लोगों के बीच भरोसा पैदा कर सके उसे एक नोट और एक वोट देकर जनता भी जिता सकती है। कन्हैया कुमार देश के जटिल मुद्दों पर जितनी ईमानदारी और साफगोई से अपनी बात रखते हैं, वह वामपंथी वक्ताओं के बीच भी एक दुर्लभ खूबी है, और देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतों को इस पीढ़ी का इस्तेमाल करना चाहिए, ऐसे लोगों को आगे बढ़ाना चाहिए। यह कांग्रेस और राजद जैसी बड़ी पार्टियों की तंगदिली और तंगनजरिए की एक मिसाल ही है कि वे एक सीट कन्हैया कुमार जैसे प्रतीक के लिए छोडऩे को तैयार नहीं हैं जो कि मोदी सरकार के खिलाफ, भाजपा के खिलाफ, एनडीए के भागीदारों के खिलाफ एक एजेंडा सेट करने का दमखम रखते हैं। अब घोर साम्प्रदायिक और घोर अलगाववादी, अलोकतांत्रिक बयानबाजी के लिए मशहूर गिरिराज सिंह के सामने कन्हैया कुमार देश के भीतर बहस के दो खेमों को खबरों में लाने में भी कामयाब होंगे, और उनके उठाए मुद्दों, सवालों के जवाब न तो आसान होंगे, और न ही खबरों से परे रहेंगे। भाजपा विरोधी पार्टियों को आपस में बात करके ऐसे उम्मीदवार को अपना सर्वदलीय प्रत्याशी बनाना चाहिए क्योंकि देश की संसद में ऐसे होनहार नौजवान की जरूरत है जो कि उसे देशद्रोही साबित करने की साजिशों के खिलाफ भी हौसले के साथ खड़ा रहा। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

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