संपादकीय
26 मार्च 2019

अभी इस पल खबर आ रही है कि लंबे समय से समाजवादी पार्टी से जुड़ी रहीं, उस पार्टी से कई बार संसद पहुंचीं एक भूतपूर्व अभिनेत्री जया प्रदा भाजपा में चली गई हैं। उत्तरप्रदेश की राजनीति में एक वक्त मुलायम सिंह के सबसे करीबी मुस्लिम नेता आजम खां के साथ जया प्रदा, और उनके मार्गदर्शक-मित्र अमर सिंह के रिश्ते सांप-नेवले सरीखे थे, और आजम-अमर सार्वजनिक रूप से ओछी बातें करते भी रहते थे। फिर लोगों ने अभी हाल में यह भी देखा कि किस तरह समाजवादी पार्टी छोड़कर बिना किसी किनारे मंझधार में तैरते अमर सिंह ने अभी-अभी चौकीदारी का काम संभाला था। इसके बाद यह स्वाभाविक ही था कि अनिवार्य रूप से उनके साथ ही चलने वाली जया प्रदा भी भाजपा चली जाएंगी। लेकिन यह दलबदल न तो कोई नई बात हैं, और न ही उत्तरप्रदेश या भाजपा तक सीमित है। अभी हाल के बरसों में उत्तर-पूर्व के छोटे-छोटे राज्यों में दलबदल से पूरी सरकारबदल करने के काम में भाजपा और कांगे्रस दोनों बराबरी से लगी रही हैं, और उत्तर-पूर्व एक अस्थिर सरकारों का इलाका हो गया है। एक वक्त था जब दलबदल, और थोक में दलबदल का रिकॉर्ड हरियाणा में कायम होता था, और वहां ऐसे लोगों के लिए भारतीय राजनीति में पहली बार आयाराम-गयाराम का इस्तेमाल हुआ था।
अभी अधिक वक्त नहीं हुआ है जब इसी जगह पर हमने इस किस्म की दलदली दलबदल-गंदगी को घटाने के लिए चुनाव कानून में ऐसे संशोधन की सलाह दी थी जिससे चुनाव के कई महीने पहले लोगों का दलबदल बंद करवा दिया जाए। किसी को पार्टी बदलने से रोकना अलोकतांत्रिक होगा, इसलिए ऐसे कानून की जरूरत है जिससे चुनाव के छह महीने के भीतर दलबदल करने वाले लोगों के नई पार्टी के निशान पर चुनाव लडऩे पर रोक लगे। कुछ लोग इसे भी अलोकतांत्रिक कह सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र को गटर बनाने पर आमादा लोगों को अगर रोकना है, तो ऐसे किसी कानून की जरूरत है। जिनको दलबदल करना है वे इसे चुनाव के छह महीने पहले कर लें, और मतदाताओं के सामने गंदगी रंग बदलकर पेश न हो।
आज हम छत्तीसगढ़ में हर दिन एक पार्टी छोड़ दूसरी पार्टी में जाते हुए लोग देख रहे हैं। जिस वक्त राज्य में अजीत जोगी की पहली कांगे्रस सरकार आई, तो वह बहुमत की सरकार थी, लेकिन जोगी ने तेरह भाजपा विधायकों का थोक में दलबदल करवाया था। इसके बाद के बरसों में भी इसी किस्म से छोटेमोटे दलबदल होते रहे, और आखिर में अंतागढ़ के विधानसभा उपचुनाव में तो कांगे्रस के उम्मीदवार बनने के बाद मंतूराम पवार का ऐसा हृदय परिवर्तन हुआ था कि उन्होंने नाम वापिस ले लिया, और फिर वे भाजपा में चले गए। इस हृदय परिवर्तन की बातचीत और खरीद-फरोख्त की टेलीफोन रिकॉर्डिंग आज पुलिस जांच के घेरे में है, और छत्तीसगढ़ के तमाम वोटर इनकी आवाजों को अच्छी तरह पहचान भी रहे हैं। लोकतंत्र का मखौल बनाने में जब तमाम बड़ी पार्टियां, या छोटी क्षेत्रीय पार्टियां एक-दूसरे के साथ गलाकाट मुकाबला कर रही हैं, तो लोकतंत्र के नाम पर अतिसंवेदनशील होने के बजाय लोकतंत्र की हत्या को रोकने की कोशिश करनी चाहिए। अभी हाल के बरसों में यह देखने में आया है कि कांगे्रस और भाजपा जैसे एक-दूसरे से सैद्धांतिक रूप से पूरी तरह विरोधी पार्टियां भी एक-दूसरे की गंदगी को लाकर अपने सिर पर बिठाने में जुटी हुई हैं। देश में जनता के सामने दलबदलुओं की लिस्ट को ईवीएम पर पेश कर देना लोकतंत्र नहीं है। इसलिए वे कानून बनाकर चुनाव के छह महीने पहले दलबदल रोक देना चाहिए, और बाद के दलबदल को चुनावी अपात्रता बनाना चाहिए।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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