छत्तीसगढ़ भाजपा का यह ब्लड ट्रांसफ्यूजन या किडनी ट्रांसप्लांट?

संपादकीय
20 मार्च 2019



आम चुनाव के पहले छत्तीसगढ़ के लिए जो सबसे बड़ी खबर बन सकती थी, वह शायद बन चुकी है, अगर भाजपा कल शाम की अपनी इस मुनादी पर कायम रहे कि पिछले चुनाव में उसके जीते हुए दस सांसदों में से किसी को दुबारा उम्मीदवार नहीं बनाया जा रहा है। जिस ग्यारहवीं सीट पर कांग्रेस जीती थी, वहां के हारे हुए भाजपा उम्मीदवार की बात सोचना तो वैसे भी फिजूल होगा क्योंकि पार्टी ने तमाम ग्यारह सीटों पर नए चेहरों को लाने की घोषणा कर दी है। छत्तीसगढ़ के इतिहास का यह शायद सबसे बड़ा चुनावी फैसला है कि तकरीबन तमाम सीटों पर जीती हुई पार्टी ने तमाम नए चेहरों का फैसला लिया है। विधानसभा चुनावों में भाजपा की शर्मनाक हार का हाल यह था कि वह ग्यारह लोकसभा सीटों के तहत आने वाली विधानसभा सीटों के आंकड़ों के मुताबिक एक भी लोकसभा सीट पर पहली पार्टी नहीं थी। जोगी-बसपा गठबंधन की मेहरबानी से वह महज एक लोकसभा सीट, बिलासपुर, पर कांग्रेस से आगे थी। विधानसभा की नब्बे सीटों में से पन्द्रह बरस की सत्तारूढ़ भाजपा कुल पन्द्रह सीटों पर सिमट गई थी, पिछली बार की अपनी सीटों से एक तिहाई से भी कम सीटों पर। और आंकड़े बताते हैं कि अगर आगी-बागी या बसपा-जोगी का सहारा न रहता, तो भाजपा कुल तीन सीटों पर जीती होती। 
भाजपा हाईकमान का यह फैसला सही या गलत तो चुनावी नतीजों के बाद ही साबित हो पाएगा, फिलहाल यह एक साहसी फैसला है जो कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की खराब किडनी को देखते हुए उसके ब्लड-ट्रांसफ्यूजन जैसा है, या क्या ऐसा कहना बेहतर नहीं होगा कि पार्टी यहां पर किडनी ट्रांसप्लांट ही कर रही है? पार्टी के बार बदन का पूरा खून बदल दे रही है, और इससे वह एक नई जिंदगी की उम्मीद कर रही है। आज जब चुनाव के नामांकन शुरू हो चुके हैं, तो यह बात मायने नहीं रखती कि मौजूदा सांसद कैसे थे, उन्होंने काम ठीक से किया या नहीं। अब मायने सिर्फ यही बात रखती है कि किसकी जीत की कितनी संभावना है। और जाहिर है कि भाजपा अपने सांसदों की जीत को लेकर जरा भी भरोसे में नहीं थी, इसलिए पूरे के पूरे बल्ब एक साथ बदल डालूंगा वाले इश्तहार की तरह भाजपा ने छत्तीसगढ़ में तमाम चेहरों को बदल डालने का फैसला सुनाया है। जहां तक पिछले पांच बरस में संसद में छत्तीसगढ़ के लोकसभा सदस्यों की कही हुई बात का सवाल है, तो जिस किसी को एक भी सांसद की कही एक भी बात याद हो, उसे एक बड़ा ईनाम दिया जाना चाहिए। ये तमाम सांसद राज्य और केन्द्र की भाजपा सरकारों पर परजीवियों की तरह बैठे हुए पेट भरते रहे, और पार्टी को ऐसी बदहाली में लाकर छोड़ दिया है। राज्य की भाजपा सरकार, और प्रदेश का भाजपा संगठन तो इस बदहाली के लिए जिम्मेदार थे ही, संसद में मौनव्रत रखे हुए छत्तीसगढ़ी सांसद भी इस हाल के लिए जिम्मेदार थे जिनका सदन में कहा हुआ एक-एक शब्द शायद देश को दस-दस हजार रूपए का पड़ा होगा। 
चूंकि भाजपा इस फैसले के साथ एक बड़ा हौसला दिखा रही है, इसलिए उसे यह भी सोचना चाहिए कि वह वंशवाद से किस तरह छुटकारा पा सकती है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने-आपको परिवारमुक्त नेता बताते हैं, दूसरी तरफ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का परिवार भी चुनाव में राजनीति से परे है, ऐसे में भाजपा को छत्तीसगढ़ में अपने मटियामेट होने की वजहों में वंशवादी राजनीति के योगदान को भी आंकना चाहिए, और इसे खत्म करना चाहिए। अगर भाजपा में मोदी-शाह वंशवाद को घटा न सके, तो फिर उनके मंत्री किस मुंह से पप्पू की पप्पी जैसी घटिया जुबान बोलकर बच सकते हैं? भारतीय राजनीति में जिस कुनबापरस्ती को लेकर जनसंघ के जमाने से भाजपा कांग्रेस को कोसती आ रही है, वह कुनबापरस्ती छत्तीसगढ़ में भाजपा में भी सिर चढ़कर बोल रही है, और इस मौके पर भाजपा उसको भी किनारे कर सकती है। आज ही सुबह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने ब्लॉग पर लिखा है कि वंशवाद की राजनीति से देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को नुकसान हुआ है। यह मौका है जब वे नुकसान घटाने की जिम्मेदारी में अपना हिस्सा बंटा सकते हैं, और छत्तीसगढ़ सहित बाकी देश में टिकटें बांटते हुए इसकी शुरुआत कर सकते हैं। आज जब यह लिखा जा रहा है, तभी खबर आ रही है कि छत्तीसगढ़ के मौजूदा सभी दस भाजपा सांसद आज शाम प्रदेश के सबसे वरिष्ठ भाजपा सांसद रमेश बैस के घर पर इकट्ठा हो रहे हैं, और यह मजमा ब्लड ट्रांसफ्यूजन या किडनी ट्रांसप्लांट के काम में कैसे अड़ंगा डाल सकता है, यह देखना भी बड़ा दिलचस्प होगा। फिलहाल पहली नजर में भाजपा का यह फैसला प्रदेश के संगठन को हिला गया है, ठीक उसी तरह जिस तरह छत्तीसगढ़ में कल अपने गठबंधन के भागीदार अजीत जोगी से चर्चा बिना, उनको बताए बिना, मायावती ने अपने उम्मीदवार घोषित करके हिला दिया था। चुनाव वैसे भी नाटकीय उठापटक का दौर होता है, और छत्तीसगढ़ में ये नाटक पारसी थियेटर के अंदाज में पांव पटक-पटककर, जोर-जोर से बोलकर चल रहे हैं। बिना मनोरंजन टैक्स के इन नाटकों का मजा लें।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

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