संपादकीय
4 मार्च 2019

राजनीति या सार्वजनिक जीवन में कुछ लोगों के सामने सायास या अनायास, ऐसे मौके आते हैं जब वे आम से खास हो सकते हैं। इन शब्दों का किसी ऐशोआराम या किसी दर्जे से लेना-देना नहीं है, बल्कि महानता की उस संभावना से लेना-देना है जो कि कभी-कभी ही किसी का दरवाजा खटखटाती है, और एक मौका पेश करती है कि लोग चाहें तो अपनी खामियों से उबरकर बेहतर बन सकें, महान बन सकें। कुछ लोग ऐसा मौका आने पर अपना तंगनजरिया, अपनी तंगमतलबपरस्ती छोड़कर चाहे खुद महान बनने के लिए बेहतर बन जाते हैं, या फिर ईमानदारी से दुनिया को बेहतर बनाने के लिए। नतीजा यह होता है कि उनका इतिहास जहां से शुरू होता है, उसके खासे आगे जाकर खत्म होता है। उनका कामकाज, या उनकी जिंदगी, जो भी पहले खत्म हो, तब तक वे खुद को और दुनिया को बेहतर बनाकर जाते हैं।
लेकिन कई ऐसे लोग रहते हैं जिनके सामने जब संभावना आकर खड़ी हो जाती है, तो उनमें से कोई अपनी बददिमागी दिखाते हुए उस संभावना को लात मारते हैं, और यह साबित करने में जुट जाते हैं कि ऐसी संभावना आने के बावजूद वे दरअसल किस मिट्टी के बने हुए हैं। अब मिट्टी की जुबान नहीं होती, वरना वह ऐसे कई लोगों के बारे में साफ-साफ कह देती कि इन लोगों को उससे नहीं बनाया गया है। ऐसे लोगों में से कुछ अपनी पुरानी खामियों से चिपके हुए, अपनी कमजोरियों को खूबियां मानते हुए संभावना को दुत्कारते हैं कि उन्हें किसी की जरूरत नहीं है। उन्हें अपने बाहुबल पर बहुत भरोसा होता है, और वे नया इतिहास लिखने का दावा भी करते हैं, और नया भविष्य गढऩे का भी। ऐसे लोग अतिमहत्वाकांक्षी, और महत्वोन्मादी होते हैं, आत्ममुग्ध होते हैं, और अपना बखान करते हुए वे बाकी दुनिया को हिकारत के साथ देखते हैं।
कुछ लोगों को ये तमाम विशेषण किसी खास नेता, या कुछ नेताओं पर लागू होते हुए लग सकते हैं, लेकिन किसी एक पर या कुछ लोगों पर हमला करने की यहां पर हमारी कोई नीयत नहीं है, हम महज इस पर चर्चा करना चाहते हैं कि जब लोगों के पास महान बनने की संभावना आती है, तो उसकी अहमियत को समझे बिना किस तरह बहुत से मदमस्त लोग अपनी बददिमागी में उस संभावना को कुचलते हुए, और लगभग उस पर थूकते हुए आगे बढ़ निकलते हैं, फिर चाहे वे हकीकत में गड्ढे में ही क्यों न गिर रहे हों। हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र का इतिहास इस बात का गवाह है कि किस तरह लोग अपनी बददिमागी के चलते आसमान से जमीन पर गिरते हैं, और हमेशा के लिए चूर-चूर हो जाते हैं। लेकिन लोकतंत्र में व्यक्ति बहुत महत्वपूर्ण नहीं होते, प्रदेश, देश या दुनिया अधिक मायने रखते हैं, इसलिए सार्वजनिक ओहदों पर बैठे हुए आत्ममुग्ध लोग अपने कार्यकाल पूरे होने तक अपने दायरे में इतनी तबाही भी करके जाते हैं कि उसकी भरपाई आने वाले बरसों तक नहीं हो पाती।
हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में कुछ नेताओं को इस कसौटी पर कसने की जरूरत है, और भविष्य में लोगों को इन पर फैसला सोच-समझकर करना चाहिए। इसलिए भी इन पर सोच-समझकर फैसला करना चाहिए क्योंकि इन्हें यह खुशफहमी हो चुकी रहती है कि उनके सिर पर ताज, और नीचे सिंहासन हमेशा के लिए है। ऐसे ही लोगों के लिए किसी ने लिखा था- तुमसे पहले तो जो इक शख्स यहां तख्त-नशीं था, उसको भी अपने खुदा होने पर इतना ही यकीं था...
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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