डॉक्टर-इंजीनियर बनाने के दबाव में बनते मुर्दे और शिक्षा से जुड़ी कुछ और बातें

संपादकीय
26 दिसंबर 2015

राजस्थान के कोटा में देश भर से पहुंचे छात्र-छात्राओं को आईआईटी, आईआईएम, और मेडिकल कॉलेजों जैसी जगहों पर दाखिले के लिए तैयार करने के कई कारखाने चल रहे हैं। एक-एक बच्चे पर लाखों रूपये साल खर्च होते हैं, और उनको स्कूली पढ़ाई के घंटों से बचाने के लिए इस उद्योग के शहर में यही कोचिंग सेंटर फर्जी स्कूलें भी चलाते हैं ताकि वहां गए बिना, पढ़े बिना बच्चों को हाजिरी मिलती रहे, और वे पूरी ताकत बड़े कॉलेजों के दाखिला-इम्तिहान की तैयारी में लगा सकें। यह एक सैकड़ों या हजारों करोड़ साल का कारोबार हो गया है, और इसने भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी की है। आज इस पर लिखने की जरूरत इसलिए आ पड़ी है कि कोटा के ऐसे बच्चों में कल एक लड़के ने खुदकुशी कर ली, और वह इस बरस का 29वां ऐसा बच्चा है। मां-बाप के लिए वह लिख छोड़ गया है कि उन्होंने उस पर बहुत खर्च किया है, और अब वह उनसे अगले जन्म में मिलेगा। 
क्या भारत की सबसे बड़ी शैक्षणिक संस्थाएं दाखिले के एक ऐसे तरीके पर निर्भर हैं जिसे मोटी रकम खर्च करके, जिम में बहाए हुए पसीने की तरह दिमागी पसीना बहाकर जीता जा सकता है? अगर आंकड़े सही हैं, तो इससे पता लगता है कि आईआईटी और आईआईएम की बहुत सी सीटें कोटा जैसे कारखाने से निकले बच्चों से भर जाती हैं, या ऐसे ही कुछ कम मशहूर दूसरे शहरों के ऐसे ही प्रशिक्षण संस्थानों के रास्ते भर जाती हैं। तो ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि जिनके पास ऐसे महंगे कारखानों में दाखिले के लिए लाखों रूपये नहीं हैं, क्या वे लोग ऐसी प्रतिष्ठित और ऊंची पढ़ाई का हक खो बैठते हैं, और यह किस तरह की सामाजिक बराबरी है जो अमीरों और गरीबों के बीच मौकों का इतना बड़ा फासला पैदा कर देती है? यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें पढऩे का हक कोटा जैसी महंगी दुकानों के कोटे बंट जाता है? 
अब इस मुद्दे का एक दूसरा पहलू यह है कि पढ़ाई में जिसे जहां चाहे दाखिला मिले, या न मिले, क्या ऐसी अस्वाभाविक तैयारी में बच्चों को इस तरह झोंक देना मां-बाप की समझदारी है जिसमें बच्चे जान दे देने को बेबस होते हैं? और यह तो हम इस बरस की उन 29 आत्महत्याओं की बात कर रहे हैं जो कि पुलिस रिकॉर्ड में आ चुकी है। उन हजारों बच्चों की बात तो सामने आ भी नहीं पाती जो मरने से एक कदम पीछे टंगे हुए हैं, और भारी मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। मां-बाप अपने बच्चों को अपनी खुद की हसरतों को पूरा करने के लिए इस कदर झोंक देते हैं कि वे बच्चे न तो अपनी पसंद की पढ़ाई कर पाते, और न ही अपनी क्षमता की। मां-बाप की उम्मीदों को पूरा करने, उन पर खरा उतरने का दबाव इतना बड़ा रहता है कि भारत में मां-बाप की इज्जत करने वाले लाखों-करोड़ों स्कूली बच्चे अपनी हसरतों को कुचलते हुए मां-बाप द्वारा छांटी गई पढ़ाई को करने को बेबस रहते हैं। ऐसे तरीकों से कोई बच्चे बड़े कॉलेजों में चाहे पहुंच जाएं, यह उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने का तरीका नहीं है। और भारत में सामाजिक स्तर पर मां-बाप के लिए ऐसे व्यापक परामर्श की जरूरत है जो कि अपने बच्चों को उनकी हसरतों के मुताबिक आगे बढऩे का मौका देने की समझ दे। 
दुनिया के विकसित और सभ्य देश इस बात की मिसाल हैं कि बच्चे अपनी जिंदगी में सबसे आगे उन्हीं दायरों में बढ़ते हैं जो उनकी पसंद के होते हैं। उनकी प्रतिभा और उनका हुनर उन्हीं क्षेत्रों में उन्हें सबसे आगे ले जाता है जो उन्हें पसंद होते हैं। भारत में एक किस्म से ऐसी बेअक्ल दौड़ चलती रहती है जिसके सामने गिनी-चुनी चार-पांच मंजिलें रहती हैं। यह पूरा सिलसिला एक ऐसी बाजार व्यवस्था को माकूल बैठता है जो कि ऐसे गिने-चुने कॉलेज चलाती है, और कॉलेजों के भी पहले तैयारी की ऐसे कारखाने चलाती है। यह तो हम सिर्फ दो पहलुओं पर बात कर रहे हैं। इनसे थोड़ा सा परे हटें, तो देश में बाकी किस्म के लाखों ऐसे निजी कॉलेज हैं जो कि नाम के लिए तो किसी शिक्षा समिति के चलाए हुए हैं, लेकिन वहां पर कैपिटेशन फीस की ऐसी बड़ी दुकानें चलती हैं, जिनकी पहुंच देश के सबसे बड़े नेताओं तक होती हैं। ऐसे में देश अपनी तमाम संभावनाओं को एक पैसे वाले तबके के हाथों बेच रहा है, पढऩे की संभावनाओं को भी, और नौकरी की संभावनाओं को भी। और यह सिलसिला न थमते दिखता है, न बंद होते दिखता है, और न ही वापिस लौटते दिखता है। ऐसे में गरीब के पास क्या बगावत के अलावा और कोई रास्ता बचता है? 
भारत की शिक्षा से जुड़े हुए ऐसे मुद्दों पर देश भर में सामाजिक चर्चा की जरूरत है, लेकिन शिक्षा के कारखानेदार शायद ही समाज के लोगों को ऐसी चर्चा के लिए एकजुट होने दें। बाजार का कारोबार मीडिया को भी फायदा पहुंचाता है, और ताकत की कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को भी, ऐसी दुधारू गाय को कोई क्यों छेड़ेंगे?






















































मोदी और नवाज शरीफ एक बहुत ही ऐतिहासिक मोड़ पर

संपादकीय
25 दिसंबर 2015

भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बहुत ही खतरनाक रफ्तार की विदेश नीति सामने रख रहे हैं। अभी-अभी कुछ मिनट पहले अफगानिस्तान के संसद भवन का उद्घाटन करने के साथ-साथ उनकी ट्वीट से यह खबर आई कि वे काबुल से दिल्ली लौटते हुए लाहौर में रूकेंगे, और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को उनके जन्मदिन की सालगिरह की बधाई देते हुए आएंगे। विदेश नीति पर बारीकी से नजर रखने वाले लोग एकदम हक्का-बक्का हैं कि जिस पाकिस्तान के साथ सरहद से लेकर राजधानियों तक अभी कुछ हफ्ते पहले तक इतनी तनातनी चल रही थी कि दोनों देशों के बीच क्रिकेट तक के आसार नहीं बन पाए हैं, उन दोनों देशों के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की एक बैठक एक तीसरे देश में अघोषित और अचानक हुई। उसके तुरंत बाद भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को मोदी सरकार में पहली बार इतना महत्वपूर्ण काम करने मिला, और वे बिना प्रधानमंत्री अकेले पाकिस्तान जाकर सबसे मिलकर आईं। और आज मोदी पाकिस्तान होते हुए भारत लौट रहे हैं, इन दोनों देशों के बीच ऐसा पहली बार हो रहा है। अभी तक कोई प्रधानमंत्री दूसरे को जन्मदिन की बधाई देने उसके देश नहीं गया था, और हम हैरान होने के साथ-साथ इस सद्भावना के हिमायती भी हैं। सवाल यही है कि मोदी की ऐसी पहल, या पाकिस्तान की ऐसी गर्मजोशी के बाद अगर तनाव के कोई हालात सामने आए तो क्या होगा? लेकिन हम आशंकाओं से डरकर पहल न करने के खिलाफ हैं, और इन दोनों देशों के बीच खुले दिल से बातचीत की जो नई पहल हो रही है, उसे खतरों के बीच भी एक बहुत ही सकारात्मक बात मान रहे हैं। 
कुछ लोगों का यह भी अंदाज है कि मोदी और नवाज शरीफ एक ऐसी नौबत लाना चाहते हैं जब अगले बरस का नोबल शांति पुरस्कार तय हो रहा हो, और दुनिया के सामने शांति की एक बड़ी मिसाल पेश करने के नाम पर, पेश करने के लिए इन दोनों प्रधानमंत्रियों को संयुक्त रूप से यह पुरस्कार मिल जाए। ऐसा होना इन दोनों नेताओंं के इतिहास में तो पहली बार होगा ही, यह इन दोनों देशों के इतिहास में भी पहली बार होगा। भारत और पाकिस्तान के तनाव और फौजी-आतंकी टकराव का आधी सदी से अधिक का इतिहास है। और ऐसे में सरहद से लेकर देश के भीतर दुश्मन के आतंकी हमलों से चौकसी तक के काम दोनों देशों पर इतने महंगे पड़ रहे हैं कि गरीबों के मुंह का निवाला छीनकर फौजी सामान खरीदे जा रहे हैं, जासूसी और निगरानी रखने की मशीनें खरीदी जा रही हैं। 
सरहद के दोनों तरफ हिन्दुओं और मुस्लिमों, और सिखों की रिश्तेदारियां, दोनों के तीर्थ, दोनों के सांस्कृतिक केन्द्र इस तरह बिखरे हुए हैं कि मानो एक बदन के भीतर दिल और दिमाग के बीच कोई दीवार खड़ी कर दी गई हो। दोनों देशों के संगीतकार, कलाकार, खिलाड़ी, और फिल्मकार लगातार अमन की कोशिश करते हैं, और दोनों देशों की जनता के बीच एक-दूसरे के लिए तब तक कोई नफरत खड़ी नहीं होती है, जब तक कि कोई धार्मिक, साम्प्रदायिक, या राजनीतिक नेता, या कोई फौजी वर्दी नफरत की बातें नहीं भड़काती हैं। ऐसे में भाजपा के चुनाव प्रचारक के रूप में नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान के खिलाफ चाहे जो कुछ कहा हो, आज अगर वे भारतीय प्रधानमंत्री की हैसियत से पाकिस्तान के साथ दोस्ती को नई ऊंचाईयों पर ले जाना चाह रहे हैं, और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ खुलकर इसमें उनके साथ हैं, तो हम भी ऐसी पहल के हिमायती हैं। हम भारत और पाकिस्तान के राजनीतिक विपक्ष से यह भी उम्मीद करेंगे कि इन दोनों नेताओं, या इनकी पार्टियों द्वारा पहले की गई भड़काऊ बातें याद न दिलाएं, और इन दोनों देशों के इतिहास में एक बेहतर दिन आने की संभावना में अपना योगदान दें। पिछले कुछ हफ्तों में भारत में कांग्रेस पार्टी ने बड़ी गैरजिम्मेदारी से बीते दिनों की भड़काऊ बातों को याद दिलाया था, और मोदी पर ताना कसा था कि उन्होंने पाकिस्तान को सबक सिखाने की कौन-कौन सी बातें कही थीं। हम ऐसे भड़कावे के खिलाफ हैं। राजनीतिक विरोध के दूसरे घरेलू मोर्चे हो सकते हैं, लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच हथियारों की जगह बच्चों का खाना, उनकी दवा, उनकी किताबें खरीदी जाएं, तो किसी राजनीतिक पार्टी को ऐसी संभावना का विरोध नहीं करना चाहिए। मोदी और नवाज शरीफ एक बहुत ही ऐतिहासिक मोड़ पर हैं, और उनको अपने-अपने घरेलू विरोधों को अनदेखा करते हुए दुनिया का एक नया इतिहास रचना चाहिए। 

सत्ता के असर में भाजपा का चाल-चलन भी कांग्रेस जैसा

संपादकीय
24 दिसंबर 2015

भाजपा के भीतर वित्त मंत्री अरूण जेटली के क्रिकेट मामलों को लेकर जो बखेड़ा खड़ा हुआ है, वह पार्टी के लिए एक बड़ी बेचैनी की वजह बन गया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की चेतावनी के बावजूद सांसद कीर्ति आजाद ने जेटली के खिलाफ मोर्चा जारी रखा है, और भाजपा के भीतर-बाहर रहते आए दो और बड़बोले जेटली-विरोधी नेता, राम जेठमलानी, और सुब्रमण्यम स्वामी भी कीर्ति आजाद के साथ, या जेटली के खिलाफ जुट गए हैं। हालांकि किसी भी इतनी बड़ी पार्टी में ऐसी बगावत न कोई बड़ी बात है, और न ही नई, लेकिन फिर भी भाजपा के सामने आज अपनी छवि का सवाल है कि उसके एक सबसे दिग्गज माने जाने वाले नेता, वित्त मंत्री अरूण जेटली क्रिकेट संघ के अपने कार्यकाल के बड़े भ्रष्टाचार का आरोप झेल रहे हैं, और पार्टी के ही सांसद याद दिला रहे हैं कि मोदी ने कहा था कि न खाऊंगा, न खाने दूंगा। 
चूंकि यह मामला दिल्ली से जुड़ा हुआ है इसलिए इसे मीडिया का अनुपातहीन अधिक कवरेज मिलता है, और भाजपा के भीतर जो लोग मोदी, शाह, या जेटली के आलोचक हैं, या उनसे असहमत हैं, उनको भी इस मोर्चे से एक मौका मिल रहा है। फिर एक बात यह भी है कि जेटली पंजाब भाजपा से आए हैं, वहां राज्य विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, जेटली लोकसभा का चुनाव वहां से बुरी तरह हारे हुए हैं, और आज वहां भाजपा की भागीदार, सत्तारूढ़ अकाली दल से भी जनता की भारी नाराजगी दिख रही है। ऐसे में पंजाब में जेटली की वजह से छोटे या बड़े कैसे भी एक और नुकसान की वजह बन सकती है। 
कीर्ति आजाद को निलंबित करना भाजपा के लिए जरूरी था क्योंकि पार्टी के निर्देश के खिलाफ लगातार अभियान चलाना, पार्टी में और लोगों को भी उकसाने वाला हो सकता था। फिर हर पार्टी की यह जिम्मेदारी भी होती है कि वह सही या गलत कुछ भी होने पर भी अपने बड़े लोगों को बचाने का काम करे। जेटली चाहे इस मामले में गलत भी हों, पार्टी उन्हें बचाते दिख रही है, यह एक अलग बात है कि भाजपा संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिन शब्दों में जेटली का बचाव किया है, वह बचाव अधिक है या उन पर हमला अधिक है, यह लोगों को समझ नहीं आ रहा है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से हवाला मामले से लालकृष्ण अडवानी पाक-साफ निकलकर आए थे, उसी तरह इस मामले से जेटली बाहर निकलकर आएंगे। अब उस वक्त तो हवाला आरोपों के आते ही अडवानी को इस्तीफा देना पड़ा था, तो क्या आज यह जेटली के लिए भी एक इशारा है? 
अभी जब हम यह लिख ही रहे हैं, उसी वक्त खबर आ रही है कि भाजपा के वृद्धाश्रम, मार्गदर्शक-मंडल की एक बैठक हो रही है जिसमें कीर्ति आजाद के मामले पर विचार किया जाएगा। यह मार्गदर्शक मंडल पहले भी बिहार-चुनाव जैसे मामले पर विचार कर चुका है, और अपनी बेचैनी जाहिर कर चुका है, लेकिन उसका नतीजा कुछ नहीं निकला। जिस तरह एक वक्त कांग्रेस पार्टी पर अकेली इंदिरा गांधी का राज चलता था, उसी तरह आज भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी का राज चल रहा है, और उनसे असहमति पूरी तरह से महत्वहीन दिख रही है। इक्का-दुक्का आजाद, स्वामी, जेठमलानी एक बड़े से पेट के भीतर जमालघोटा के बीज की तरह असहमति वाले लोग हैं, और यह असहमति कोई असर डालने लायक ताकत नहीं रखती है। आज मोदी-अमित शाह का जो एकाधिकार केन्द्र सरकार और भाजपा पर है, वह अभूतपूर्व है, और उसकी कोई काट किसी के पास नहीं है। 
दूसरी बात यह भी कि ईमानदारी जैसे मुद्दे पर पिछले महीनों में मोदी सरकार ने जिस किस्म की बर्दाश्त दिखाई है, उससे अब यह भी मुद्दा नहीं रह गया कि भ्रष्टाचार सामने आने पर सरकार की सेहत पर कोई फर्क पड़ेगा। भाजपा का कुल रूख केन्द्र से लेकर उसकी सरकारों वाले राज्यों तक अब वैसा ही रह गया है जैसा कि कांग्रेस के भ्रष्टाचार के दिनों में रहता था। यह सब देखकर लगता है कि सत्ता का अपना एक ऐसा असर होता है जो लोगों की धार को खत्म कर देता है, नैतिकता के सारे दावों को फीका कर देता है, और पक्ष-विपक्ष के चाल-चलन में फर्क मिटा देता है।

दौलतमंद मुजरिम से वसूलना चाहिए जांच-मुकदमे का खर्च और मोटा मुआवजा भी

संपादकीय
23 दिसंबर 2015

देश में इन दिनों ऐसे चर्चित जुर्म छाए हुए हैं जिनके पीछे करोड़पति-अरबपति लोग पकड़ाए हैं। बड़े लोगों के शामिल होने से खबरें भी बड़ी बन जाती हैं, और पुलिस थाने से लेकर अस्पताल या अदालत तक ऐसे लोगों की हिफाजत के लिए, भीड़ को दूर रखने के लिए पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ती है। जो बड़े लोग छूट जाते हैं, उनके बारे में हमको कुछ नहीं कहना है, लेकिन जो बड़े लोग मुजरिम साबित होते हैं, उनसे सरकार को जांच और मुकदमे का खर्च वसूलना चाहिए। ऐसे लोग अपने पीछे जमीन-जायदाद छोड़ जाते हैं, और देश के कानून में यह फर्क करने की जरूरत है कि संपन्न अपराधी को सजा दिलवाने में सरकार गरीबों के हक का पैसा खर्च न करे। कुछ लोगों को यह सलाह अटपटी लग सकती है क्योंकि न्याय की नजर में गरीब और अमीर का फर्क नहीं रखा गया है, लेकिन हमारी यह सलाह बहुत ही न्यायसंगत इसलिए है क्योंकि देश की जांच और मुकदमे की क्षमता बड़ी सीमित है, और लाखों बेकसूर बिना सुनवाई, अधूरी जांच, और अदालतों की बाकी किस्म की लेटलतीफी के चलते जेलों में बंद हैं, और अदालतें आधी सदी से अपनी क्षमता बढ़ाने की मांग करती चल रही है। यह आए दिन होता है कि पुलिस अदालत में किसी अभियुक्त को पेशी पर न लाने के लिए अर्जी दाखिल करती है कि पुलिस-बल न होने की वजह से पेश नहीं किया जा रहा, और अगली तारीख दी जाए। 
अब हम कुछ मामलों को देखें, जैसे संजय दत्त का मामला, मनु शर्मा का मामला, इंद्राणी मुखर्जी का मामला, या सुब्रत राय सहारा से लेकर विजय माल्या जैसे लोगों के अभी चल रहे मामले, इनमें से जो भी और जब भी मुजरिम साबित हों, उनसे जांच और मुकदमे की पूरी लागत सरकार को वसूल करना चाहिए। किसी गरीब से तो यह लागत नहीं ली जा सकती, और संपन्न अपराधी पर सरकार ऐसा खर्च नहीं कर सकती। हम ऐसे ताकतवर लोगों के पैसों से उनकी जांच या उनके मुकदमे तेज करने, या उनके पक्ष में कोई फैसला करने, या सजा में रियायत की बात नहीं कर रहे। हम महज सजा हो जाने के बाद इस जुर्म पर हुए सरकारी खर्च को इन लोगों की दौलत से वसूलने की बात कर रहे हैं। जिस तरह दुपहिए पर थोड़ा जुर्माना लगता है, और बड़ी गाड़ी पर अधिक जुर्माना लगता है, वैसा ही बड़े लोगों के जुर्म पर भी होना चाहिए। एक अपराधी की छोड़ी हुई दौलत का इस्तेमाल उसका परिवार करे, और जांच का बोझ देश उठाए, ये ठीक नहीं है। 
भारत के कानून में अमरीकी अंदाज में एक और फेरबदल करने की बात बहस में बनी हुई है जिसे अमरीकी कानूनी-जुबान में प्ली-बार्गेन कहते हैं। इसमें मुजरिम और शिकार परिवार के बीच कुछ तरह के मामलों में कुछ तरह का समझौता अदालत से परे भी हो सकता है जिसे अदालत मंजूर करती है, और जांच एजेंसी के साथ भी मुजरिम का ऐसा समझौता हो सकता है जिसे अदालत मानती है। भारत में जो लोग संपन्न लोगों के जुर्म के शिकार होते हैं, उन्हें मुजरिम को सजा से कुछ भी हासिल नहीं होता। ऐसे मामलों में भी हमने यह लिखा है कि जब यह साबित हो जाए कि मुजरिम संपन्न हैं, और उसके जुर्म के शिकार कमजोर तबके के हैं, तब मुजरिम की संपत्ति से जुर्म के शिकार लोगों को एक बड़ा मुआवजा देने का प्रावधान कानून में करना चाहिए। अब यह प्ली-बार्गेन जैसे किसी रास्ते हो सकता है, या उसके बिना भी कानून बनाकर हो सकता है, यह जानकार लोगों के बीच विचार-विमर्श का मुद्दा है। हमारी राय यहीं तक सीमित है कि मुजरिम की संपत्ति का इस्तेमाल उसके जुर्म की जांच पर भी खर्च होना चाहिए, और उसके जुर्म के शिकार को मुआवजा देने में भी।

संसद जनता की संतुष्टि के बजाय समझदार कानून बनाने का हौसला दिखाए

संपादकीय
22 दिसंबर 2015

दिल्ली में हुए देश के सबसे चर्चित बलात्कार केस में एक नाबालिग किशोर की कू्ररता के बाद से लगातार देश में यह बहस चल रही है कि हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में अगर किशोर उम्र के लोग शामिल रहते हैं, तो उनको नाबालिग होने की रियायत दी जाए, या फिर उनकी सजा भी बालिग मुजरिमों की तरह रहे। इसके साथ-साथ यह पिछला पूरा हफ्ता इसलिए निर्भया को लेकर खबरों में रहा कि उसके मां-बाप दिल्ली में लगातार यह सार्वजनिक अभियान चलाते रहे कि छोटी सजा पूरी करने के बाद सुधारगृह से निकल रहा अब नौजवान हो चुका निर्भया का किशोर-बलात्कारी न छोड़ा जाए। इसके लिए दिल्ली महिला आयोग ने भी आखिरी रात, आधी रात के बाद तक सुप्रीम कोर्ट को जगाया, लेकिन अदालत ने ऐसे किसी कानून के न होने की बात कहते हुए इस रिहाई को रोकने से मना कर दिया। देश में चारों तरफ सोशल मीडिया सहित मीडिया में भी लगातार यह अभियान चल रहा है कि इस नौजवान को सजा के बाद भी न छोड़ा जाए। संसद अभी ऐसे एक कानून को बनाने पर विचार कर ही रहा है जिसके तहत ऐसे गंभीर अपराधों में किशोरावस्था के अपराधियों को भी आज के मुकाबले अधिक कड़ी सजा दी जा सके।
दिक्कत यह है कि भारत में किसी एक मामले को लेकर जब जनभावनाएं बहुत भड़कती हैं, तो उनको शांत करने के लिए एक नए कानून को दमकल की तरह इस्तेमाल किया जाता है। यह सोचने की तकलीफ अधिक मुश्किल होती है कि मौजूदा कानूनों का बेहतर इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया, किसी किशोर अपराधी की सोच को समय रहते सुधारने का जिम्मा सरकार और समाज क्यों नहीं कर पाए, और सजा के दौरान अपराधियों की सोच को सुधारना किसी कैद के मुकाबले अधिक जरूरी क्यों है? इन तमाम बातों को सोचने और करने के लिए बहुत से तथ्यों और तर्कों की जरूरत पड़ती है। उसके बजाय सजा को अधिक बड़ा या कड़ा कर देना एक आसान और लुभावना नारा रहता है, और जब जनदबाव अधिक पड़ता है तो सरकारें और राजनीतिक दल इसी शॉटकट का इस्तेमाल करते हैं। नतीजा यह होता है कि अक्सर कोई अधकचरा कानून बन जाता है, जिससे नफे के बजाय नुकसान अधिक होने लगता है, या फिर उसमें छूट के रास्ते निकालना आसान होता है। यह भी होता है कि जब किसी दिक्कत की जड़ कहीं और होती है, तब पत्तों को पानी से धोकर पेड़ को चकाचक दिखा दिया जाता है।
जनदबाव के सामने ऐसा दबने और झुकने की नौबत तब आती है जब सरकारें समय रहते अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती हैं। और जब भड़की हुई भावनाएं मीडिया में लपटों के साथ दिखती हैं, और मीडिया उनको हवा देने का काम और करता है, तब संसद के पास भी समझदारी से बहस करने की गुंजाइश नहीं बचती, और वक्त भी नहीं बचता। ऐसे में बनने वाले कानून फिर कुछ बरसों में संशोधन की जरूरत के साथ खड़े हो जाते हैं, और तब तक उन कानूनों का इस्तेमाल कई बेकसूरों पर मार की तरह पड़ता है।
हम किसी बदले की भावना से बनाए गए कानूनों के खिलाफ हैं। किसी एक मुजरिम को देखते हुए बनाया गया कानून भी बड़ा नुकसानदेह हो सकता है, और उसमें सुधार की भावना के बजाय बदले की भावना हावी रहती है। निर्भया नाम के इस दिल दहलाने वाले केस को लेकर विचलित भावनाओं के साथ जनदबाव में जो कानून बन रहा है, उसमें हो सकता है कि समाजशास्त्रियों, और मनोवैज्ञानिकों, परामर्शदाताओं की राय को जगह न मिल पाई हो। इस मुद्दे पर देश इतना विचलित है कि इस पर सार्वजनिक बहस आसान भी नहीं है। ऐसे में संसद को जनता की संतुष्टि के बजाय एक समझदार कानून बनाने का हौसला भी दिखाना चाहिए।

महिलाओं का शोषण रोकने और बराबरी का हक दिलाने एक मजबूत आंदोलन जरूरी

संपादकीय
21 दिसंबर 2015

ब्रिटेन की एक महिला सांसद ने मांग की है कि वे गर्भावस्था की छुट्टी पर हैं, और इस दौरान संसद मतदान होने पर उनको घर या अस्पताल से वोट डालने का हक मिलना चाहिए। ब्रिटेन की तरह ही भारत में वही संसदीय प्रणाली चल रही है जिसमें जेल में बंद सांसद-विधायक या अस्पताल में भर्ती सांसद-विधायक को स्ट्रेचर पर सदन में लाकर उनसे वोट डलवाया जाता है, और अगर वे आने की हालत में नहीं है, तो उनको वोट डालने का हक नहीं मिलता। दुनिया में रोजाना महिलाओं से जुड़े हुए मुद्दों पर नए-नए सवाल उठ रहे हैं, और सदियों से चली आ रही महिला-विरोधी, और पुरूष प्रधान व्यवस्था में फेरबदल के लिए मांग उठती हैं। दुनिया की भाषा में बदलाव लाना पड़ रहा है, और महिलाओं के खिलाफ जो देश सबसे अधिक कट्टर और भेदभाव वाला है, उस सऊदी अरब में भी महिलाओं को पहली बार चुनाव लडऩे का मौका मिला, वोट डालने का मौका मिला, और महिलाएं जीतकर आईं भी। भारत में भी म्युनिसिपलों और पंचायतों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होने के बाद स्थानीय संस्थाओं में उनकी लीडरशिप लगातार बढ़ रही है, और वे तजुर्बा भी हासिल कर रही हैं। 
दुनिया की कुछ बड़ी कंपनियां अपने पुरूष कर्मचारियों को भी पिता बनने के मौके पर गर्भावस्था से जुड़े कामकाज के लिए छुट्टी देनी की व्यवस्था बढ़ाते चल रहे हैं, और कुछ विकसित, सभ्य देशों में महिलाओं के बराबरी की ही छुट्टी पुरूष को भी मिलने लगी है। लेकिन भारत महिलाओं की हालत कानूनी रूप से बराबर होने के बावजूद उन्हें बराबरी का हक मिलने में अभी पता नहीं कितनी सदियां और लगेंगी। इसकी एक वजह यह है कि संसद में दशकों से चले आ रहे महिला आरक्षण विधेयक को पास करवाने में किसी पार्टी की दिलचस्पी नहीं दिख रही है, और अगर कांग्रेस-भाजपा जैसी दो पार्टियां मिलकर इस आरक्षण के लिए कोशिश करतीं तो यह कबका कानून बन चुका होता। लेकिन अलग-अलग तो ये दोनों पार्टियां महिला आरक्षण की बात करती हैं, इसे कानून बनवाने के लिए एक साथ बैठने को जब ये तैयार नहीं होतीं, तो अब तो धीरे-धीरे करके महिला आरक्षण विधेयक नाम के शब्द भी हवा से खो गए हैं। 
देश में अगर महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना है, तो यह एक बहुत जरूरी कानून था, और जिस तरह अभी के बरसों में निर्भया के मुद्दे को लेकर सरकार को आनन-फानन एक कानून बनाना पड़ा, उसी तरह का एक आंदोलन महिला आरक्षण के लिए भी चलाया जाना जरूरी है। जब देश की आधी आबादी अपने हक के लिए एक साथ उठ-खड़ी होगी तो कोई भी पार्टी एक सीमा से अधिक उसे टाल नहीं सकेगी। इसके साथ-साथ कुछ और मुद्दे ऐसे हैं जिन पर केन्द्र और राज्य सरकारों को, सरकारों से परे निजी क्षेत्र को काम करने की जरूरत है। कामकाज की जगहों पर महिलाओं के शोषण की घटनाएं आमतौर पर दबी रह जाती हैं, क्योंकि इन तमाम जगहों पर ताकत की कुर्सियों पर आदमी बैठे रहते हैं, और सदियों की उनकी मर्दाना सोच यह समझ भी नहीं पाती कि कौन-कौन सी बातें महिला के शोषण के दायरे में आती हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए। एक तरफ तो मौजूदा कानूनों का इस्तेमाल न करने पर सरकारी और गैरसरकारी संस्थानों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। आज हालत यह है कि किसी महिला कर्मचारी-अधिकारी को एक रिपोर्ट लिखाने के लिए भी थाने के बाद अदालत के चक्कर लगाने पड़ते हैं, और सारी व्यवस्था महिला को कुचलने में जुटी हुई दिखती है। 
भारत को एक मजबूत महिला आंदोलन की जरूरत है, और ऐसे आंदोलनकारियों को चाहिए कि वे राजनीतिक दलों में, सरकार और न्यायपालिका में बैठी हुई महिलाओं को घेरकर उनसे उनकी जिम्मेदारी पर सवाल करें, और अगर महिला मुद्दों पर उनका साथ नहीं मिले, तो उनका भांडाफोड़ भी करें। यह सिलसिला एक आक्रामक तरीके से चलना जरूरी है, और यह नामुमकिन भी नहीं दिखता है। इसके लिए बस महिलाओं को उठ-खड़ा होना होगा। 

देश की सबसे बड़ी पंचायत सजावट की अलमारी नहीं

संपादकीय
20 दिसंबर 2015

राज्यसभा में केन्द्र सरकार या राष्ट्रपति की तरफ से दस ऐसे लोगों को मनोनीत किया जाता है जो कि राजनीति से परे जिंदगी के अलग-अलग दायरों में कामयाबी हासिल कर चुके खास लोग होते हैं, और जिस तरह पुराने जमाने के किसी राजा के दरबार में नवरत्न हुआ करते थे, उसी तरह आज भी ऐसे रत्नों को वहां रखकर सदन की शोभा बढ़ाने का काम होता है। हालांकि इसका एक कागजी मतलब यह भी होता है कि अलग-अलग दायरे से आए हुए लोगों के अनुभव, और उनके ज्ञान का फायदा संसद को मिल सके। 
लेकिन पिछली आधी सदी का इसका अनुभव बहुत ही खराब रहा है। इन लोगों में से गिने-चुने ही ऐसे रहे जिन्होंने अपने पेशे या अपने दायरे के तजुर्बे का फायदा सदन को दिया हो। आमतौर पर ये गुपचुप बैठे रहते हैं, या कि कभी-कभी जया बच्चन की तरह अपनी पार्टी की नीतियों को लेकर बात करते हैं। लेकिन संसद में मनोनयन से लाए जाने वाले लोगों की खूबियों का फायदा भारतीय लोकतंत्र को मिला हो ऐसा देखने में नहीं आता। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने देश की इस सबसे बड़ी पंचायत में सजावट के लिए ऐसे लोगों को बिठाने के खिलाफ पहले भी लिखा है। और अब अगर देखें तो संसद से निकली हुई जानकारी हमारे विरोध को जायज करार देती है। अभी जो दस लोग राज्यसभा में हैं उनमें से एक मणिशंकर अय्यर कांग्रेस के पुराने नेता हैं और पेशेवर राजनेता हैं। उनको भी एक लेखक बताकर इस दर्जे में राज्यसभा में लाना परले दर्जे का नाजायज काम था, लेकिन यूपीए सरकार ने अपने रहते वह किया था। दूसरी तरफ भारत रत्न सचिन तेंदुलकर से लेकर, फिल्मी अभिनेत्री रेखा तक, और एक बहुत ही जागरूक फिल्मकार, लेखक और शायर जावेद अख्तर भी राज्यसभा में मनोनीत किए गए थे, जिनका कार्यकाल अभी जारी है। अब राज्यसभा में इनकी हाजिरी देखें, तो सचिन और रेखा कुल पांच फीसदी हाजिरी वाले लोग हैं। लेकिन जो लोग हाजिर हुए भी हैं उनको अगर देखें, तो जावेद अख्तर ने अब तक संसद में एक भी सवाल नहीं पूछा, यही हाल एक उद्योगपति अनु आगा का है, यही हाल रेखा का है, और यही हाल के. पाराशरण का है जो कि यूपीए सरकार के समय भारत के अटार्नी जनरल थे, सुप्रीम कोर्ट में हर दिन बहस करने का उनका पेशा ही था, लेकिन संसद में उन्होंने एक भी सवाल नहीं पूछे। इसके बाद के आंकड़े देखें कि कौन लोगों ने कितनी बहसों में हिस्सा लिया तो रेखा और सचिन के नाम के साथ फिर एक बड़ा सा शून्य लिखा दिखता है।
देश की संसद अभी तो पिछली कुछ बरसों से काम न करते दिख रही है, और सांसदों को देश की जनता मुफ्तखोर मानती है। बोलचाल की जुबान में लोग मुफ्तखोर की जगह उर्दू का एक अधिक अपमानजनक शब्द, हरामखोर, इस्तेमाल करते हैं, जिसका मतलब है काम पूरा न करके भी खाने वाले लोग। अब हमारी इस भाषा को संसद खारिज कर सकती है, और इसके खिलाफ विशेषाधिकार हनन भी ला सकती है, लेकिन उससे देश की जनता की सोच नहीं बदली जा सकती। जिस सचिन तेंदुलकर को देश ने सबसे बड़ा सम्मान दे दिया है, उसके बाद न तो सचिन का कोई सम्मान बढ़ाया जा सकता था, और न ही संसद का सम्मान ऐसे लोगों से बढ़ सकता जो कि संसद की कार्रवाई में कुछ जोड़ सकें। लोगों को याद होगा कि कुछ लोगों के मनोनयन के पीछे सरकार की बदनीयत की चर्चा भी होती है। अब जिस तरह से समाजवादी पार्टी की तरफ से जया बच्चन को राज्यसभा में मनोनीत करने के तुरंत बाद कांग्रेस पार्टी ने एक दूसरी अभिनेत्री रेखा को वहीं ले जाकर बिठा दिया, और यह बात जगजाहिर थी कि इन दोनों अभिनेत्रियों के संबंध अपने निजी जीवन को लेकर बहुत ही खराब हैं, और दोनों में अनबोला है। ऐसे में बिना किसी राष्ट्रीय योगदान के किसी अभिनेत्री को संसद में ला बिठाना, उससे बेहतर यह होता कि नसीरुद्दीन शाह जैसे किसी अभिनेता को वहां लाया जाता जो कि संसद के बाहर भी जागरूक होकर देश के मुद्दों पर हौसले के साथ खुलकर बोलते हैं। लेकिन राजनीतिक दल बहुत ही तंगदिली से ऐसी कुर्सियों पर लोगों को लाकर बिठाते हैं, और इसलिए भी राष्ट्रपति के नाम पर होने वाला यह मनोनयन खत्म होना चाहिए। वैसे भी राजनीतिक दल अपने सांसद-विधायकों की संख्या के अनुपात में अपने पसंदीदा लोगों को राज्यसभा में लाते हैं, और उसमें भी ऐसी सीटों की बिक्री और नीलामी की खुली चर्चा हमेशा से होती आई है। पूरी की पूरी राज्यसभा के इस ढांचे को बदलना तो एक मुश्किल बात होगी, लेकिन खिलाड़ी-कलाकार जैसे कोटे से लोगों को लाकर संसद की सीट को बर्बाद करने के बजाय राष्ट्रपति ऐसे नवरत्नों की एक कमेटी अलग से बना ले, और समय-समय पर उनकी बैठक करके, उनकी राय लेकर, सरकार को सुझाव भेज दे। आज संसद में जितनी घटिया बातें होती हैं, और जितनी खराब नीयत से वहां काम होता है, हो सकता है कि उस स्तर पर जाकर ये भले लोग मुंह न खोल पाते हों। जो भी हो, देश की सबसे बड़ी पंचायत को हम सजावट की अलमारी नहीं मानते। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। 

सोनिया-राहुल एक अभूतपूर्व मोड़ पर

संपादकीय
19 दिसंबर 2015

कांग्रेस पार्टी के लिए आज एक बड़ा और ऐतिहासिक दिन है। पार्टी के दो मुखिया, सोनिया और राहुल गांधी, पार्टी का वर्तमान और भविष्य, पहली बार अदालती कटघरे में खड़े हो रहे हैं, और यह पहला मौका है जब सरकार के किसी पद पर रहे बिना कांग्रेस अध्यक्ष-उपाध्यक्ष अदालत जा रहे हैं। इसके पहले इंदिरा और संजय गांधी भी अदालत और जांच आयोग का सामना कर चुके हैं, लेकिन इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रह चुकी थीं, और संजय गांधी आपातकाल में सरकारी मशीनरी के बेजा इस्तेमाल, और जनता पर जुल्म के बहुत से आरोप लगे थे। सोनिया और राहुल एक बिल्कुल अलग किस्म के मामले में अदालत में हैं, जो कि एक नागरिक की हैसियत से सुब्रमण्यम स्वामी नाम के वर्तमान भाजपा नेता ने दायर किया हुआ है, और यह कांग्रेस पार्टी, नेशनल हेराल्ड प्रकाशित करने वाली कंपनी की जमीन-जायदाद, शेयर, और फंड-कर्ज से जुड़े हुए कंपनी-कानून तोडऩे के आरोप वाला एक मामला है। यह एक जटिल तकनीकी मामला है, और जनता की नजर में इसमें अधिक भ्रष्टाचार कुछ नहीं दिखता, क्योंकि देश के लोग यह मानकर चलते हैं कि कांग्रेस पार्टी सोनिया-राहुल की सम्पत्ति है, और सोनिया-राहुल ही कांग्रेस पार्टी की अकेली सम्पत्ति हैं। ऐसे में इन दोनों पक्षों में से कौन किसका क्या इस्तेमाल करता है, यह आम लोगों की नजर में जुर्म नहीं बनता, यह एक अलग बात है कि कंपनी-कानून नेशनल हेराल्ड के मामले में टूटा है या नहीं। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर पिछले कई दिन से संसद को चलने नहीं दिया, और उसने यह माहौल बनाने की कोशिश की कि सुब्रमण्यम स्वामी के पीछे मोदी सरकार है, और सोनिया-राहुल को प्रधानमंत्री की पहल पर निशाना बनाया जा रहा है। लेकिन देश में राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले सभी लोग इस बात को जानते हैं कि सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा में हमेशा से नहीं रहे, और वे अटल बिहारी से लेकर अरूण जेटली तक बहुत से भाजपा नेताओं के खिलाफ सार्वजनिक अभियान चलाने वाले रहे हैं। वे इसके पहले भी जयललिता से लेकर कांग्रेस की सरकारों तक के खिलाफ बहुत से अदालती मामले लड़ चुके हैं, और जीत भी चुके हैं। इसलिए यह आरोप निहायत बेबुनियाद है कि वे भाजपा की ओर से सोनिया-राहुल पर हमला कर रहे हैं। सुब्रमण्यम स्वामी दरअसल एक ऐसा पिन निकला हुआ हथगोला हैं, जो कि जिस हाथ में रहे, उस हाथ को भी विस्फोट में टुकड़ा-टुकड़ा कर सकता है। 
लेकिन इस अदालती कार्रवाई से परे, अपने तमाम राजनीतिक जीवन में सोनिया और राहुल पहली बार सड़क और अदालत की लड़ाई में उतरे हैं, और अब वे घर पर आराम से बैठकर राजनीति करने वाले नहीं रहकर, सार्वजनिक राजनीति की अग्नि परीक्षा से गुजर रहे हैं। कांग्रेस ने यह समझदारी दिखाई है कि दिल्ली में उसने सड़कों पर नौटंकी नहीं करना तय किया, हालांकि यह एक अलग बात है कि सोनिया-राहुल का साथ देते हुए दिखने के लिए देश भर में कांग्रेस के लोग आज प्रदर्शन कर रहे हैं।  पिछले दस बरस के यूपीए राज में सोनिया-राहुल ने बहुत सावधानी से अपने आपको सरकार के हर फैसले से अलग रखा था, और कागजों पर कहीं भी उनका नाम नहीं था। मनमोहन सिंह नाम का एक वफादार ड्राइवर रखकर सोनिया-राहुल पीछे की सीट पर बैठे सरकार चला रहे थे, और स्टियरिंग पर कहीं भी उनकी उंगलियों के निशान नहीं थे। इसलिए यूपीए सरकार के दस बरसों के अनगिनत और अंतहीन अपराधों में उनकी कोई भागीदारी अदालत के लायक नहीं रही, लेकिन वे एक बिल्कुल ही लगभग घरेलू मामले में उलझ गए हैं। एक ही कमरे में बैठे कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा इस पूरे नेशनल हेराल्ड के मामले में मानो अपनी ही जैकेट की एक जेब से निकालकर कांग्रेस की जायदाद दूसरी जेब में रख रहे थे, और दूसरी जेब से निकालकर तीसरी जेब में रख रहे थे, और इस बीच शायद कांग्रेस के दिग्गज वकीलों को भी यह अंदाज नहीं था कि कोई कानून टूट सकता है। इस पूरे घरेलू लेन-देन में दिक्कत केवल यही रही कि एक कंपनी, एक राजनीतिक दल, और दूसरी कंपनी के लेन-देन देश के कुछ कानूनों के तहत सही ठहराए जाते हैं, या नहीं।
इस मामले के नतीजे पर जाने की अभी जल्दबाजी नहीं करना चाहिए क्योंकि निचली अदालत से शुरू होकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हुए इसमें बरसों लगना तय है, और मोदी सरकार के सोनिया-परिवार से संबंध चाहे जैसे हों, यह मामला दायर करने वाले सरकार से परे के एक बेकाबू सुब्रमण्यम स्वामी हैं जो कि आए दिन सुप्रीम कोर्ट पहुंचते ही रहते हैं। इसलिए कानूनी कार्रवाई से परे एक राजनीतिक लड़ाई कांग्रेस की इन दिनों सुस्त चल रही जिंदगी में शुरू हुई है, और लोग यह तुलना किए बिना नहीं रह पा रहे हैं कि आज ही के दिन 1978 में इंदिरा गांधी गिरफ्तार हुई थीं। खुद सोनिया गांधी ने लोगों को ऐसी तुलना करने के लिए उकसाया है, यह कहकर कि वे इंदिरा की बहू हैं, और किसी से नहीं डरती हैं। यह उनका अभूतपूर्व राजनीतिक तेवर है, और भारत की चुनावी राजनीति जिन तेवरों से प्रभावित होती है, उनमें यह पार्टी के फायदे का तेवर भी हो सकता है। कांग्रेस पार्टी को अपनी वर्तमान और अपनी भावी लीडरशिप के इर्द-गिर्द जुटने का यह एक बड़ा मौका मिल रहा है, और पार्टी विपक्ष की राजनीति के तेवर दिखाते दिख भी रही है। देश की जनता दिलचस्पी के साथ यह देखेगी कि आज अदालत में भी नौबत आने पर सोनिया-राहुल जमानत की अर्जी देंगे, या जेल जाना पसंद करेंगे। दूसरी तरफ दिल्ली की राजनीति के इस भारी उथल-पुथल ने भाजपा के भी चेहरे पर शिकन डाली है, और उसे कांग्रेस का रूख भांपते हुए चलना पड़ेगा। 

सूदखोरी और देह शोषण का एक नया तरीका आन्ध्र में

संपादकीय
18 दिसंबर 2015

आंध्र की विधानसभा में इस वक्त बड़ा हंगामा हो रहा है। वहां पर एक से अधिक राजनीतिक दलों के विधायकों से जुड़ी साहूकारी कंपनियों ने महिलाओं को छोटे-छोटे कर्ज दिए, और जब वे चुका नहीं पाईं, तो उन्हें सेक्स-रैकेट में धकेल दिया। पिछले कुछ दिनों से इसे लेकर प्रदेश में बड़ी गिरफ्तारियां हो रही थीं, और आज विधानसभा में आरोपों और हंगामे का दिन रहा। विधानसभा या संसद में हंगामे में लिखने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इन जगहों पर यह आम बात है। लेकिन सूदखोरी और देह शोषण के जो नए-नए अंदाज दुनिया में सामने आते हैं वे देखते ही बनते हैं। लोगों को याद होगा कि हिन्दी की पुरानी फिल्मों में जिस तरह जीवन नाम का एक अभिनेता सूदखोर के किरदार करता था, और कभी बच्चों को बंधुआ मजदूर बनाता था, कभी महिलाओं का शोषण करता था, और कभी घर-जमीन पर कब्जा करता था। यह सिलसिला अलग-अलग कई तरह की शक्लों में आज भी जारी है। 
एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश भर में जन-धन योजना लागू करके हर गरीब का खाता खुलवाने का काम कर रहे हैं, और लोगों को छोटे-छोटे कर्ज कम कागजी खानापूरी पर भी देने की योजना शुरू कर चुके हैं, और दूसरी तरफ इस अंदाज की सूदखोरी देश के विकसित राज्यों में से एक, आन्ध्र में चल रही है। लेकिन एक तरफ तो सूदखोरी का यह अंदाज चल रहा है, और दूसरी तरफ देश भर में बहुत से प्रदेशों में चिटफंड कंपनियां लोगों को धोखा देकर लाखों करोड़ रूपए जमा करवा चुकी हैं, और लूटकर भाग चुकी हैं। इनमें छत्तीसगढ़ जैसे गरीब प्रदेश भी हैं, जहां लोगों ने अपनी जमीन बेचकर भी ऐसी कंपनियों में पैसा लगा दिया था, और ये कंपनियां रातों-रात दफ्तर बंद करके भाग गईं। 
पैसा देने के नाम पर, और पैसा लेने के नाम पर जब कभी धोखाधड़ी होती है, वह स्थानीय अफसरों और पुलिस की जानकारी के बिना नहीं होती। और जब ऐसे सिलसिले के कई महीने गुजर जाते हैं, तब जाकर बहुत सी शिकायतों के बाद सरकार की आंख खुलने का नाटक करती है, और जब तक लोगों की तलाश शुरू होती है, तब तक वे सब खा-पीकर भाग चुके रहते हैं, और उनके स्थानीय एजेंट ही पकड़ में आते हैं। यह सिलसिला सत्ता की मेहरबानी के बिना नहीं चलता, और पश्चिम बंगाल जैसा जागरूक राज्य यह देख चुका है कि किस तरह मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की पार्टी के मंत्री ऐसी जालसाज कंपनी में शामिल थे, और आज जेल में हैं। 
हम पहले भी इसी जगह यह लिख चुके हैं कि देश और अलग-अलग प्रदेशों में केन्द्र और राज्य सरकारों को आर्थिक अपराधों को लेकर खुफिया एजेंसी बनाने की जरूरत है जो कि अपराध शुरू होते ही उस पर नजर रखे, और लूट अधिक बढ़ सके, उसके पहले ही अपराधियों को दबोच सके। जब पूरा खेत खाली हो जाता है, तब कीड़ों को मारने के लिए जहर लेकर पहुंचने का कोई फायदा नहीं होता। हर राज्य को दूसरे राज्य के जालसाजी के उजागर हो चुके मामलों से सबक लेना चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि मुजरिमों के लिए राज्यों की सरहद कोई मायने नहीं रखती, और वे एक जगह कामयाब होने के बाद बाकी जगहों पर जाकर भी वही तरीका इस्तेमाल करते हैं। 
आन्ध्र में सूदखोरी की आड़ में गरीब कर्जदार महिलाओं के देह शोषण का सिलसिला बहुत भयानक है। और जैसी कि खबर आ रही है इसमें सत्ता और विपक्ष से जुड़े हुए लोग शामिल हैं। तो ऐसे मामले में मुख्यमंत्री को बिना देर किए हुए इस मामले को सीबीआई के हवाले करना चाहिए क्योंकि जहां राजनीति के बाहुबली मुजरिमों के सरदार हों, वहां पर स्थानीय जांच मुमकिन नहीं हो सकती। 

किसानों की जान बचाना मुमकिन तो है, लेकिन...

संपादकीय
17 दिसंबर 2015

छत्तीसगढ़ मेंं किसानों की आत्महत्या पर एक तरफ तो सरकार की कमजोरी जाहिर होती है कि वह धान का बोनस नहीं दे पाई, धान खरीदी में कई तरह की गड़बडिय़ां हुईं, सरकार की तैयारी सूखे के हिसाब से बांध के पानी की नहीं थी, और दूसरी तरफ कल विधानसभा में इस पर चर्चा के दौरान पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर ने जिस लहजे में आत्महत्या करने वाले किसानों को श्रद्धांजलि दी, उससे एक नई कड़वाहट पैदा हो गई। मंत्री का यह कहना कि उनको नहीं मालूम कि खुदकुशी करने वाले किसान थे या नहीं, मरने वाले, खुद जान देने वाले किसानों के परिवारों के जख्मों पर नमक सरीखा है। खुद सत्तारूढ़ भाजपा के लोग इस बात पर हैरान थे कि एक वरिष्ठ और अनुभवी मंत्री किस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। खैर, यह भाजपा की अपनी सोच है कि वह अपनी मंत्रियों के बारे में क्या सोचती है, हम तो किसानी से जुड़े हुए मुद्दों पर बात करना चाहते हैं जिस पर आज छत्तीसगढ़ की विधानसभा भी इसी वक्त बात कर रही है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अभी विधानसभा में कई तरह की राहतों की घोषणा की है, लेकिन उनका फायदा लोगों को मिलने तक पता नहीं और कितने किसान जान दे चुके होंगे। इसलिए इन फायदों से परे यह समझने की जरूरत है कि किसानी की ऐसी बदहाली भविष्य में न रहे इसलिए जो किया जा सकता है, उस पर सरकार को विचार करना चाहिए। 
छत्तीसगढ़ धान पर टिका राज्य होने की वजह से गरीबी और फटेहाली से गुजरती ही रहता है। ऐसे में राज्य सरकार को किसानों की अर्थव्यवस्था को धान से परे भी ले जाने की कोशिश करनी चाहिए। कई ऐसी फसलें हैं, जो धान के मुकाबले अधिक कमाई देती हैं, लेकिन किसान उतना हौसला नहीं जुटा पाते क्योंकि नए बीज, नई तकनीक, और नए खतरे झेलने की उसकी ताकत नहीं है। दूसरी तरफ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि के साथ-साथ कुछ दूसरी बातों को भी जोडऩा बहुत जरूरी है। ग्रामोद्योग के तहत एक लंबी लिस्ट आती है कि किस तरह ग्रामीण रोजगार बढ़ सकते हैं। इसमें लोग हस्तशिल्प से लेकर हाथकरघा तक का काम कर सकते हैं, वनोपज पर आधारित काम हो सकता है, बागवानी के काम हो सकते हैं, मधुमक्खी पालन और मशरूम उगाने जैसे काम हो सकते हैं, सिल्क और लाख से जुड़े काम हो सकते हैं, डेयरी का काम हो सकता है, और इनसे न सिर्फ लाखों रोजगार पैदा होंगे, बल्कि किसान किसी सूखे या अकाल की नौबत आने पर भूखों नहीं मरेगा, खुदकुशी नहीं करेगा। 
लेकिन सरकार की आम सोच के चलते ऐसी व्यापक ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर काम नामुमकिन दिखता है। यह काम धान खरीदी के मुकाबले बहुत अधिक मुश्किल और बिखरा हुआ होगा, और इसके लिए सरकार को अपने आम भ्रष्टाचार से बाहर निकलकर, कल्पनाशीलता और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक ऐसे काम बढ़ाने पड़ेंगे, तब जाकर किसानों की मौत थम सकेगी, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुधर सकेगी। गांवों के पास किसानी के बाद भी खासा वक्त बचे रहता है, और इसके इस्तेमाल के लिए न तो कोई बड़ी तकनीक लगती है, और न ही बिजली लगती है। ऐसे कामों के बारे में भारत का अनुभव भी बहुत लंबा है। लेकिन सरकार को शहरी सोच से आजाद होकर ग्रामीण स्वरोजगार के इस देश के अनुभव का उपयोग करना पड़ेगा, तब जाकर लोगों की जिंदगी बच पाएगी।