30 मई 2011
अफगानिस्तान में कल नाटो के एक हमले में 14 बेकसूर फिर मारे गए। तालिबानी आतंकियों के शक में नाटो सेना के विमानों ने कुछ घरों पर हवाई हमले किए जिनमें दो महिलाएं और 12 बच्चे भी मारे गए और इसके लिए अफसोस जाहिर करने के साथ-साथ नाटो ने यह दावा भी किया है कि कुछ आतंकी भी मारे गए हैं। पश्चिमी देशों के ऐसे हमले मध्य-पूर्व के देशों पर तो चल ही रहे हैं, भारत के पड़ोस में पाकिस्तान पर भी तरह-तरह के हवाई हमले बड़ी संख्या में बेकसूरों को मार रहे हैं और इसके चलते भी अमरीका और उसके गुर्गों के खिलाफ नफरत फैल रही है। यह नफरत देशों के बीच के टकराव के रूप में तो सामने नहीं आ पा रही क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े गुंडे से निपटने की ताकत किसी दूसरे देश में अब नहीं बची है लेकिन यह संस्कृतियों के टकराव और धर्मों के टकराव की शक्ल में बुरी तरह छा गई है।
पश्चिमी देश अपने अंदाज का लोकतंत्र, अपनी मनमर्जी की रफ्तार से, अपने मनचाहे बमों के साथ बांधकर दूसरे देशों पर गिराने के लिए एक तरफ तो सीआईए जैसी साजिश करने वाली कातिल खुफिया एजेंसी के हवाले से झूठे सुबूत गढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ वे बेबस देशों के मासूम बाशिंदों को अपने घर में जिंदा रहने का हक भी नहीं दे रहे। ये वे देश हैं जो पर्यावरण के नाम पर, जंगली जानवरों के नाम पर, बाल मजदूरों के नाम पर, मानवाधिकार के नाम पर अपने आपको परले दर्जे का जिम्मेदार साबित करते हुए बाकी तमाम देशों पर कभी आयात-निर्यात की शर्तें थोपते हैं तो कभी उनका आर्थिक बहिष्कार करते हैं। उनकी मर्जी पर न चलने वाले देश को वे घेरकर उसी तरह मारते हैं जिस तरह जंगल में हथियारबंद शिकारी हांका लगाकर घेरकर उन जंगलों के निवासी जानवरों को मारते हैं। पाक-अफगान सरहद पर तालिबानियों को मारने के नाम पर संदिग्ध तालिबानियों से कई-कई गुना अधिक मासूम लोगों को अमरीकी हवाई हमले मारे जा रहे हैं। दुनिया में इससे एक ऐसा टकराव खड़ा हो रहा है जिसके खतरे से अमरीकी और पश्चिमी जनता को डराकर उनसे तरह-तरह की फौजी कार्रवाई के लिए मंजूरी पाकर पश्चिमी सरकारें बाकी देशों के लाखों लोगों को मार रही हैं। यह एक किस्म से ऐसा जंगलराज हो गया है जिसमें सबसे ताकतवर के तो तमाम हक हैं, लेकिन उससे कमजोर लोगों का हक सिर्फ गुलाम बने रहने का है। जब अंग्रेजी साम्राज्यवाद दुनिया में फैला था तो वह नावों पर चढ़कर और घोड़ों पर चढ़कर गया था, और एक वक्त के बाद वह वापिस लौट गया था एक बहुत लंबी लहर के सैलाब की तरह। लेकिन आज अमरीका की अगुवाई में साम्राज्यवादी देशों का गिरोह जो कर रहा है वह कभी खत्म न होने वाली एक गुलामी के सिलसिले की शुरुआत है जिसके चलते ये पश्चिमी देश किसी देश को पानी के कुएं की तरह बनाकर रखेंगे तो किसी देश को तेल की कुएं की तरह। किसी देश को वे गुलामों के कैदखाने की तरह रखेंगे तो कहीं पर वे उस देश के कारखाने, कैदखाने के कारखाने की तरह चलाएंगे।
मनमोहन सिंह जैसे नेताओं और भारत के लोकतंत्र पर हावी बाजार व्यवस्था के चलते इस देश की लगाम थामे हुए लोग अमरीका के साथ वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं जैसे एक तांगे की लगाम थामा हुआ इंसान उस पर सवार किसी शाही सवारी के साथ करता है। अमरीका के गुलाम की तरह जब मनमोहन सिंह हिन्दुस्तान की तरफ से यहां के लोगों की भावनाओं के नाम का 17 रूपए के नोट के तरह का एक नोट छापकर अमरीकी राष्ट्रपति को पेश करते हैं कि भारत की जनता उनसे बहुत मोहब्बत करती है तो उससे यह साबित होता है कि यह प्रधानमंत्री भारत की जनता से किस कदर कटा हुआ है। इराक पर अमरीकी हमले के वक्त जिस भारत का मुंह अब खुलने के लायक भी नहीं बचा, अफगानिस्तान में रोजाना बेकसूरों को मार डालने वाले नाटो हमलों के खिलाफ जिस भारत का मुंह खुलने लायक भी नहीं बचा, पाकिस्तान में आए दिन द्रोन हमलों से बेकसूरों को मारने के खिलाफ जिस भारत का मुंह खुलने लायक भी नहीं बचा, उस भारत का मुंह इतिहास में दिखने लायक नहीं बचेगा। नेहरू का यह देश जिसने कि दुनिया के हर बड़े मामले में उस वक्त अपनी दखल रखी, आज हाशिये पर हाथ बांधे खड़े एक ताबेदार की तरह हत्यारे बुश की तारीफ में चारण और भाट की तरह चापलूसी कर रहा है। यह उसी नेहरू की पार्टी का प्रधानमंत्री है जिसने अपने पूरे युग को प्रभावित किया, पूरे विश्व को प्रभावित किया। आज उस पार्टी ने न नेहरू की रीति का कोई नामलेवा है न उनकी नीति का।
ऐसे में हम भारत की जनता से जागने की अपील करते हैं कि वह ऐसी मुर्दा और कारोबारी, चापलूस और कायर सरकार से कोई उम्मीद किए बिना अपने बीच एक ऐसी जागरूकता खड़ी करे कि जिससे यह सरकार हिल जाए। मध्य-पूर्व के कई देशों में तरह-तरह आंदोलन अभी सामने आए हैं और उनके पीछे के कारण चाहे जो हों, उनको एक बहुत बड़ा जनसमर्थन मिला है। भारत में अमरीकी-गिरोह की हैवानियत के खिलाफ इंसानियत को जगाने और एकजुट करने की जरूरत है। यहां पर हम इंसानियत को एक आदर्श मतलब की शक्ल में इस्तेमाल कर रहे हैं, न कि आज प्रचलित इंसानियत के रूप में।
अफगानिस्तान में कल नाटो के एक हमले में 14 बेकसूर फिर मारे गए। तालिबानी आतंकियों के शक में नाटो सेना के विमानों ने कुछ घरों पर हवाई हमले किए जिनमें दो महिलाएं और 12 बच्चे भी मारे गए और इसके लिए अफसोस जाहिर करने के साथ-साथ नाटो ने यह दावा भी किया है कि कुछ आतंकी भी मारे गए हैं। पश्चिमी देशों के ऐसे हमले मध्य-पूर्व के देशों पर तो चल ही रहे हैं, भारत के पड़ोस में पाकिस्तान पर भी तरह-तरह के हवाई हमले बड़ी संख्या में बेकसूरों को मार रहे हैं और इसके चलते भी अमरीका और उसके गुर्गों के खिलाफ नफरत फैल रही है। यह नफरत देशों के बीच के टकराव के रूप में तो सामने नहीं आ पा रही क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े गुंडे से निपटने की ताकत किसी दूसरे देश में अब नहीं बची है लेकिन यह संस्कृतियों के टकराव और धर्मों के टकराव की शक्ल में बुरी तरह छा गई है।
पश्चिमी देश अपने अंदाज का लोकतंत्र, अपनी मनमर्जी की रफ्तार से, अपने मनचाहे बमों के साथ बांधकर दूसरे देशों पर गिराने के लिए एक तरफ तो सीआईए जैसी साजिश करने वाली कातिल खुफिया एजेंसी के हवाले से झूठे सुबूत गढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ वे बेबस देशों के मासूम बाशिंदों को अपने घर में जिंदा रहने का हक भी नहीं दे रहे। ये वे देश हैं जो पर्यावरण के नाम पर, जंगली जानवरों के नाम पर, बाल मजदूरों के नाम पर, मानवाधिकार के नाम पर अपने आपको परले दर्जे का जिम्मेदार साबित करते हुए बाकी तमाम देशों पर कभी आयात-निर्यात की शर्तें थोपते हैं तो कभी उनका आर्थिक बहिष्कार करते हैं। उनकी मर्जी पर न चलने वाले देश को वे घेरकर उसी तरह मारते हैं जिस तरह जंगल में हथियारबंद शिकारी हांका लगाकर घेरकर उन जंगलों के निवासी जानवरों को मारते हैं। पाक-अफगान सरहद पर तालिबानियों को मारने के नाम पर संदिग्ध तालिबानियों से कई-कई गुना अधिक मासूम लोगों को अमरीकी हवाई हमले मारे जा रहे हैं। दुनिया में इससे एक ऐसा टकराव खड़ा हो रहा है जिसके खतरे से अमरीकी और पश्चिमी जनता को डराकर उनसे तरह-तरह की फौजी कार्रवाई के लिए मंजूरी पाकर पश्चिमी सरकारें बाकी देशों के लाखों लोगों को मार रही हैं। यह एक किस्म से ऐसा जंगलराज हो गया है जिसमें सबसे ताकतवर के तो तमाम हक हैं, लेकिन उससे कमजोर लोगों का हक सिर्फ गुलाम बने रहने का है। जब अंग्रेजी साम्राज्यवाद दुनिया में फैला था तो वह नावों पर चढ़कर और घोड़ों पर चढ़कर गया था, और एक वक्त के बाद वह वापिस लौट गया था एक बहुत लंबी लहर के सैलाब की तरह। लेकिन आज अमरीका की अगुवाई में साम्राज्यवादी देशों का गिरोह जो कर रहा है वह कभी खत्म न होने वाली एक गुलामी के सिलसिले की शुरुआत है जिसके चलते ये पश्चिमी देश किसी देश को पानी के कुएं की तरह बनाकर रखेंगे तो किसी देश को तेल की कुएं की तरह। किसी देश को वे गुलामों के कैदखाने की तरह रखेंगे तो कहीं पर वे उस देश के कारखाने, कैदखाने के कारखाने की तरह चलाएंगे।
मनमोहन सिंह जैसे नेताओं और भारत के लोकतंत्र पर हावी बाजार व्यवस्था के चलते इस देश की लगाम थामे हुए लोग अमरीका के साथ वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं जैसे एक तांगे की लगाम थामा हुआ इंसान उस पर सवार किसी शाही सवारी के साथ करता है। अमरीका के गुलाम की तरह जब मनमोहन सिंह हिन्दुस्तान की तरफ से यहां के लोगों की भावनाओं के नाम का 17 रूपए के नोट के तरह का एक नोट छापकर अमरीकी राष्ट्रपति को पेश करते हैं कि भारत की जनता उनसे बहुत मोहब्बत करती है तो उससे यह साबित होता है कि यह प्रधानमंत्री भारत की जनता से किस कदर कटा हुआ है। इराक पर अमरीकी हमले के वक्त जिस भारत का मुंह अब खुलने के लायक भी नहीं बचा, अफगानिस्तान में रोजाना बेकसूरों को मार डालने वाले नाटो हमलों के खिलाफ जिस भारत का मुंह खुलने लायक भी नहीं बचा, पाकिस्तान में आए दिन द्रोन हमलों से बेकसूरों को मारने के खिलाफ जिस भारत का मुंह खुलने लायक भी नहीं बचा, उस भारत का मुंह इतिहास में दिखने लायक नहीं बचेगा। नेहरू का यह देश जिसने कि दुनिया के हर बड़े मामले में उस वक्त अपनी दखल रखी, आज हाशिये पर हाथ बांधे खड़े एक ताबेदार की तरह हत्यारे बुश की तारीफ में चारण और भाट की तरह चापलूसी कर रहा है। यह उसी नेहरू की पार्टी का प्रधानमंत्री है जिसने अपने पूरे युग को प्रभावित किया, पूरे विश्व को प्रभावित किया। आज उस पार्टी ने न नेहरू की रीति का कोई नामलेवा है न उनकी नीति का।
ऐसे में हम भारत की जनता से जागने की अपील करते हैं कि वह ऐसी मुर्दा और कारोबारी, चापलूस और कायर सरकार से कोई उम्मीद किए बिना अपने बीच एक ऐसी जागरूकता खड़ी करे कि जिससे यह सरकार हिल जाए। मध्य-पूर्व के कई देशों में तरह-तरह आंदोलन अभी सामने आए हैं और उनके पीछे के कारण चाहे जो हों, उनको एक बहुत बड़ा जनसमर्थन मिला है। भारत में अमरीकी-गिरोह की हैवानियत के खिलाफ इंसानियत को जगाने और एकजुट करने की जरूरत है। यहां पर हम इंसानियत को एक आदर्श मतलब की शक्ल में इस्तेमाल कर रहे हैं, न कि आज प्रचलित इंसानियत के रूप में।
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