सोने का अंडा देने वाली मुर्गी के खिलाफ कारोबार की कहानी




राजकपूर पर उनकी बेटी की लिखी या तैयार की गई किताब बहुत कम दाम पर बाजार में लाई गई है। बेटी का तर्क है कि पिता पर किताब को अधिक से अधिक लोग ले सकें इसलिए ऐसा किया गया। मैं इस मौके पर कपूर खानदान पर टीवी समाचार बुलेटिनों के बिछ जाने की चर्चा में जगह खराब करना नहीं चाहता, किताबों के बारे में बात करना चाहता हूँ।
किताबों के दाम ऐसे हैं कि आम लोग किताबें खरीदने की सोच भी नहीं सकते। अभी हिन्दी का एक उपन्यास लेने को जी किया तो ढाई सौ रुपए का था। किसी से लेकर पढ़ लिया क्योंकि एक जीवन में एक उपन्यास को एक बार से अधिक पढऩे का काम भी क्या पडऩा है? दाम इतना कम भी नहीं था कि उसे खरीदकर, पढ़कर औरों को दे देता।
यह मेरे लिखने का खासा पुराना मुद्दा है। एक किताब की टाइपिंग, प्रूफ रीडिंग, छपाई और बाइंडिंग मिलकर अगर हजार प्रतियों की लागत पचास रुपए प्रति कॉपी आती है तो उसे प्रकाशक बाजार में ढाई-तीन सौ रुपए में लाता है। लेखक का दस फीसदी की प्रचलित रायल्टी के मुताबिक वह सो प्रतियां दे देता है और उम्मीद करता है कि लेखक उस किताब पर गोष्ठिïयां करवाएगा, उसकी समीक्षा छपवाएगा। प्रकाशक सरकारी या संस्थागत खरीदी के अपने बंधे5बंधाए कारोबार के तहत किताब की प्रतियां खपा देता है और लिखित-अलिखित कमीशन देने के बाद भी वह खासी कमाई कर लेता है।
तीन सौ की किताब में लिखित अलिखित कमीशन सौ रुपए, लेखक की रॉयल्टी और छपाई की लागत सौ रुपए और प्रकाशक की कमाई सौ रुपए। शायद ऐसा ही हिसाब बैठता होगा। मुझे इन सबकी कमाई के अनुपात से शिकायत नहीं है सिवाय इसके कि इससे पाठक किताबों से दूर भाग रहा है।
किताब का दाम आज के प्रचलित बाजार से आधा कर दिया जाए तो संभावित खरीददार दुगुने नहीं, चार गुना हो जाएंगे। खरीदने की ताकत का पिरामिड कुछ ऐसे ही अनुपात में बढ़ता होगा। लेकिन प्रकाशक किताब के महंगे लाइबे्ररी संस्करण छपवाकर पहले से पहचाने गए खरीददारों के बीच उसे खपाकर मानो चैन की नींद सोता है। नए खरीददार तबके की तलाश में वह कहां धूप-बारिश में भटकेगा?
इसलिए किताबों का बाजार सिमटते चल रहा है। लोगों के पास मनोरंजन के बहुत से और जरिए हो गए हैं जो अधिक लुभावने और संस्ते भी हैं। इनसे दिमाग पर जोर भी कम पड़ता है और आस-पास के दायरे में उस पर बात करने वाले भी अधिक मिलते हैं।
लेकिन प्रकाशन व्यवसाय ने धीरे-धीरे ऐसे हालात पैदा हो जाने दिए हैं या पैदा कर दिए कि किताबों के खरीददार एक सम्पन्न, शिक्षित, कुलीन तबको के लोग ही रह जाएं। सरकारी या संस्थागत खरीदी पर टिक गया किताब-कारोबार लेखक और पाठक, दोनों का नुकसान कर रहा है और मेरा मानना है कि खुद का भी। आबादी में जब किताबों के खरीददारों का अनुपात घटता चला जाए ओर उस पर किसी को फिक्र न हो, तो मैं इसे व्यापार के रूप में भी घाटे का काम मानता हूँ। ग्राहकों का आधार छोटा करते चलने से उस पर बहुत बड़ी इमारत तो कभी भी खड़ी नहीं हो सकती।
हिंदी साहित्य में किताबों का जो आम आकार है, उसमें दस पैसे प्रति पेज से अधिक की लागत नहीं आती। उसे एक रुपए प्रति पेज बेचने का क्या तुक है? साहित्यकारों में से कुछ को मैंने समझाने की कोशिश की कि वे प्रकाशक पर दबाव क्यों नहीं डालते कि उनकी किताबों के सिर्फ पेपर-बैक छापे जाएं, सस्ते कागज पर, ताकि उन्हें अधिक से अधिक लोग पढ़ें। लेखकों का कहना था कि प्रकाशन व्यवसाय पर उनका बस नहीं चलता।
मैंने उनसे कहा कि हम खुद अपनी किताबें छापने जा रहे हैं और इसमें और लेखकों की कुछ किताबें भी छापी जा सकती हैं तो उनका कहना था कि हमारा बाजार का नेटवर्क सीमित रहेगा ओर पुस्तक-प्रकाशक पूरे देश में किताब बेचने की ताकत रखता है। इस बात पर मेरे पास कहने को सचमुच कुछ नहीं था।
देश की अलग-अलग भाषाओं में लेखकों ने सस्ती किताबों के कुछ प्रयोग शायद किए होंगे। कुछ प्रकाशकों ने भी सस्ती किताबें छापी हैं, लेकिन कम से कम हिंदी पाठक के लिए बात कुछ बनी नहीं है। मैं हिंदी के लेखक के भूखों मरकर शहादत देने की वकालत नहीं कर रहा। मैं सिर्फ यह बताना चाहता हूँ कि खरीददार और पाठक बढऩे से लेखक का भला होगा। आज उसके लिए पारखी, मोटे तौर पर सिर्फ प्रकाशक रह गया है। कल अगर पाठक दस गुना हो जाएंगे तो लेखक के लिए उत्कृष्टïता की चुनौती भी बनी रहेगी और संभावनाएं भी अधिक रहेंगी। हो सकता है कि बहुत से लेखक, प्रकाशक के मौजूदा तंग दायरों वाले इंतजाम में अपने को अधिक सुरक्षित पाते हों, लेकिन जो लेखक आगे बढऩा चाहते हैं उनको प्रकाशक की बारी-बारी रफ्तार से आगे भी निकलना होगा, उसकी उंगली छोड़कर।
देश और दुनिया के बहुत से हिस्सों में लेखक अपनी किताबें बेचते घूमते भी हैं। हिंदी में ीाी ऐसा हो तो कोई बुराई नहीं है। ऐसी दस-बीस फेरियों में ही उन्हें समझ आ जाएगा कि पढऩे में दिलचस्पी रखने वालों के लिए किताबें खूब महंगी हैं और जो आसानी से उन्हें खरीद सकते हैं, उनके पास किताबों से अधिक लुभावने बहुत से विकल्प हैं।
ग्राहक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की तरह का हो सकता है रोज एक किताब खरीदकर, लेकिन उसे किताबों के कारोबारी एक बार मैं ही हलाल करने के फेर में रहते हैं। एक इंसान या दफ्तर की अलमारी में सज जाने वाली महंगी साजिल्द किताब के बजाय सस्ती पेपर बैक किताब बेहतर होगी, उसे बिना दर्द और बिना आशंका लोग दूसरों को पढऩे भी दे सकेंगे कि वापिस न भी आई तो ढाई-तीन सौ की चपत नहीं पड़ेगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें