पाकिस्तान से परमाणु खतरे पर


23 मई 2011
पाकिस्तान में कल फिर एक फौजी ठिकाने पर तालिबानी आतंकियों ने हमला किया
और कराची के बंदरगाह पर इस हमले का निशाना शायद वहां उतरने वाले अमरीकी
और नाटो के फौजी सामानों को रोकना था। जो भी हो, यह एक बड़ी फिक्र की बात
है कि सीधे फौजी ठिकाने पर हमला करने लायक ताकत पाकिस्तान में बसे हुए और
वहां काम कर रहे आतंकियों के हाथ है। वहां पर एक अकेले ओसामा बिन लादेन
या दाऊद इब्राहीम को सरकारी हिफाजत से जगह मिल जाना एक अलग किस्म का
मामला हो सकता है लेकिन एक देश की फौज पर अगर आतंकी ऐसा हमला कर सकते हैं
तो कल उनके हाथ क्या पाकिस्तान के परमाणु हथियारों तक भी पहुंच सकते हैं?पाकिस्तानी हुक्मरान ऐसी किसी अटकल के जवाब में यह कह सकते हैं कि वहां
उनका पूरा काबू अपने परमाणु हथियारों पर है लेकिन हम आए दिन यह देख रहे
हैं कि वहां की एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री की हत्या से लेकर वहां बसे
आतंकियों के भारत आकर हमले करने तक, बहुत से ऐसे मामले हैं जिनके बारे
में दुनिया को ऐसा शक है कि वहां की फौज, वहां की फौजी खुफिया एजेंसी या
वहां की सरकार के दूसरे तबके कई किस्म के आतंक और दूसरे हमलों में शामिल
हैं। ऐसे में आज हमको यह एक बड़ा खतरा दिखता है कि कोई धर्मान्ध, कट्टर
अफसर ऐसा भी हो सकता है जो आगे-पीछे की सोचे बिना परमाणु हथियारों के
इस्तेमाल की सोच ले। इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान में फौजी हुकूमतें
आती-जाती रही हैं और जहां फौज का इतना जलवा हो वहां परमाणु बटन पर हाथ
रखने वाले लोग अगर गैरफौजी भी हैं तो बंदूक की नोंक पर वे अपने हाथ कब तक
रोक पाएंगे?अमरीका के भीतर एक मांग बढ़ती चली जा रही है कि पाकिस्तान को अमरीकी मदद
बंद की जाए। पाकिस्तान में अमरीका के खिलाफ नफरत आसमान पर है। पाकिस्तानी
सरकार गले-गले तक भ्रष्ट है, कुनबापरस्त है और फौजियों के सामने अक्सर
बेबस दिखती है। ऐसे में पड़ोस का भारत सबसे अधिक खतरे में है और इसके
बारे में अमरीका क्या सोचता है यह कम से कम खबरों में तो साफ नहीं है।
लेकिन भारत को इस बारे में अमरीका सहित दुनिया के उन तमाम देशों से अधिक
आक्रामक तरीके से, अधिक वजन के साथ बात करनी चाहिए क्योंकि अगर कोई आतंकी
या सिरफिरी या धर्मान्ध ताकतें बंदूक की नोंक पर पाकिस्तानी सरकार से
परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की नौबत ला खड़ी करे तो क्या होगा? अमरीका
तो दूर बसा हुआ है और भारत सरकार के आज के मंत्री और यहां के
प्रधानमंत्री जब अमरीका के पाकिस्तान पर लादेन जैसे हमले की संभावना को
खारिज करते हैं, और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के मुखिया का यह बयान
सामने आता है कि भारत के ठिकाने उसने हमलों के हिसाब से छांटे हुए हैं,तो यह एक भारी तनाव की स्थिति लगती है।
हम किसी भी कोने से किसी हमले या लड़ाई की बात नहीं करते क्योंकि हमारा
यह मानना है कि भारत और पाकिस्तान के बीच कोई भी और लड़ाई सिवाय इन दो
देशों का नुकसान करने के और किसी का नुकसान नहीं करेगी। और इन दोनों ही
देशों में अपनी घरेलू जरूरतें इतनी अधिक हैं कि फौजी साज-सामान पर बर्बाद
करने को इन दोनों के ही पास फिजूल की कोई रकम नहीं होनी चाहिए। पाकिस्तान
के भीतर के आतंकी खतरे अलग किस्म के हैं, लेकिन भारत के भीतर इतने बड़े
इलाके में नक्सल आतंक का खतरा है और वे भी आए दिन जहां-जहां तक वार कर
सकते हैं वहां-वहां तक वर्दीधारियों और साधारण जनता, दोनों को थोक में
मार रहे हैं। इस नक्सल आतंक का सरहद के पार किसी दूसरे देश से लेना-देना
भी नहीं है और ये अपने-अपने घरेलू खतरे हैं। इसलिए जब पाकिस्तान में
आतंकी हमले से कोई बड़ा नुकसान होता है तो भारत के कुछ लोग हो सकता है कि
नक्सल मोर्चे की अपनी लाशों को भूलकर यह तसल्ली पाने लगते हों कि
पाकिस्तान ने जैसा बोया है वैसा काट रहा है। लेकिन यह बात समझने की जरूरत
है कि चाहे सरकार की गलतियों से ही ऐसी नौबत क्यों न आई हो, भारत के
नक्सली हों या पाकिस्तान के धर्मांध आतंकी, इन दोनों से अगर लोकतंत्र
कमजोर होता है तो उसका बुरा नतीजा सिर्फ उसी देश की सरहद के भीतर तक नहीं
रहेगा। इन दोनों देशों को एक दूसरे के भीतर के आतंकी खतरों को लेकर वहां
की गैरआतंकी सरकारों या ताकतों से हमदर्दी रखने की जरूरत है और एक ऐसा
माहौल भी बनाने की जरूरत है जिससे कि दहशतगर्दी कम हो। भारत का नक्सल
आतंक तो पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह से नहीं लगा है लेकिन पाकिस्तान की
आतंकी ताकतें भारत के खिलाफ बुरी तरह लगी हुई हैं। ऐसे में पाकिस्तान की
सरकार को घेरकर आतंक के मोर्चे पर खड़े रखने का काम भी अंतरराष्ट्रीय
दबाव से भारत को करवाना होगा।
लेकिन हम आखिर में फिर उस बड़ी फिक्र की चर्चा करेंगे कि किसी परमाणु
हमले की हालत में क्या होगा? भारत के भीतर की अस्पतालों की खबर कुछ समय
पहले आई थी कि परमाणु हमले से बचाव की अस्पतालों की कोई तैयारी नहीं है।
और हम पाकिस्तान जैसी अस्थिरता से गुजर रहे किसी भी देश के भीतर हथियारों
की हिफाजत के दिलासे को बहुत भरोसेमंद कभी नहीं मानते। अमरीका से इस सवाल
का सार्वजनिक जवाब मांगना चाहिए।



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