धरती को बचाने की फिक्र कई शक्लों में सामने आती है। कुछ लोगों ने अमरीका में फेंके गए खाने के सामानों पर गुजारा करना शुरू किया है जिनको 'फ्रीगनÓ कहा जाता है। ये लोग ऐसा नहीं कि खाना खरीदने का खर्च नहीं उठा पाते, धरती पर बोझ घटाने के लिए ये सामान बचाते हैं और कुछ महीने पहले ऐसे लोगों के बारे में नहीं लिखा भी गया था। फिर ऐसी गाडिय़ां आने लगी जो डीजल या पेट्रोल के बजाय बैटरी से चलती हैं और उनसे प्रदूषण सड़कों पर बहुत कम होता है। लेकिन अभी चीन से एक नइ्र फिक्र सामने आई है कि ऐसी गाडिय़ों की बैटरी चार्ज करने के लिए जो बिजली लगती है उसे बनाने के लिए बिजलीघरों से भारी प्रदूषण होता है। दूसरा बड़ा प्रदूषण है ऐसी गाडिय़ों की बैटरियों से। हर दो बरस मे ये बैटरियां बेकार हो जाएंगी और इनके ढेर से निपटने का कोई जरिया नहीं होगा। बैटरियों पर ढेर पेट्रोलियम के प्रदूषण से कहीं बढ़कर होगा।
गांधी ने उस समय किफायत की बात शुरू की जब पर्यावरण को बचाने की बात की भी जरूरत शुरू नहीं हुई थी। गांधी को छोड़ें तो जैन धर्म ने तो और पहले ही संचय के खिलाफ नसीहत दी थी। इस धर्म के कार्यकर्ता न अधिक खाते, न अधिक सामान इस्तेमाल करते और न ही इक_ïा करते। पर्यावरण के लिए इससे बड़ी कौन सी बात हो सकती थी? यह एक अलब बात हे कि इस धम्र को मानने वालों की दावतों में सामानों की सम्पन्न बरबादी देखते ही बनती है, और संचय की नसीहत से परे ही इस धर्म का पालन करने वाले दिखते हैं। लेकिन बाकी मजहबों की नसीहत का हाल इससे बहुत बेहतर होता हो ऐसा भी नहीं, लेकिन आज बात यहां मजहब की नहीं करनी है।
बाजार से सामान खरीदते हुए जहां जरूरत न हो फैली बैग के लिए मना करते हुए हमारे मन को यह तसल्ली हो जाती है कि हमने धरती पर बोझ नहीं बढ़ाया। अभी दो ही दिन पहले मैं प्रोडक्ट और पैकिंग डिजाइनिंग की बात करते हुए सोच रहा था कि ऐसी पैकिंग जिसका दुबारा सार्थक उपयोग न हो सके, उस पर अतिरिक्त टैक्स क्यों न लगाया जाए? क्यों न डिजाइनिंग के पाठ्यक्रमों में इसकी किफायत और इसके दुबारा उपयोग की संभावनाओं को एक पूरे डिप्लोमा या डिग्री के रूप में शामिल किया जाए?
अपने आस-पास मुझे जब रंग-पेंट और तेल-ग्रीस से खाली हुई बाल्टियां बरसों इस्तेमाल होते दिखती हैं तो कुछ तसल्ली होती है। लेकिन साथ-साथ जब प्लास्टिक के सामानों की दुकानों पर जग, ग्लास और कटोरे दिखते हैं तो लगता है कि चाय, कॉफी, बोनविटा या अचार जैसे सामान ऐसी पैकिंग में क्यों नहीं आते?
लेकिन आज एक ऐसी फिक्र के बारे में यहां लिखना है कि जिसे सुनकर लोगों को अजीब लगेगा।
अमरीका की एक युवती, टोनी वर्नेली ने तय कर रखा था कि वह कभी मां नहीं बनेगी, क्योंकि उसे लगता था कि धरती को अगर बचाना है तो इसका दोहन करने वाली आबादी कम रखनी होगी। वह एक नई जिंदगी, एक नए बच्चे को पर्यावरण पर सबसे बड़ा बोझ मानती थी। पन्द्रह बरस की उम्र में उसने मांसाहार छोड़ दिया था क्योंकि मांसाहार के पशु-पक्षी तैयार करने का उद्योग बहुत अधिक पानी मांगता है और मांस के लायक होने तक पशु धरती पर बोझ रहते हैं।
उसकी एक लंबी कहानी अभी अमरीका में छपी है लेकिन हम अपने काम का हिस्सा उसमें से निकालें तो वह यह है कि वह गर्भवती हो गई और दहशत में जाकर उसने गर्भपात करवाया। फिर बरसों तक डॉक्टरों के सामने गिड़गिड़ा कर उसने नसबंदी करवाई। सत्ताईस बरस की युवती की नसबंदी करने कोई डॉक्टर तैयार नहीं हुआ। क्योंकि इनको लगता था कि किसी दिन उसका इरादा बदल सकता है। लेकिन आखिर में एक डॉक्टर ने उस पर यह अहसान किया।
टोनी ने अपने पुरुष मित्रों से, पति से, सबसे यह बात साफ कर दी कि वह कभी मां नहीं बनेगी, यह जानकार कुछ लोग उसके साथ रहे, कुछ चले गए। उसने बाद में अपने पति के साथ यह भी तय किया कि वे लोग साल में सिर्फ एक बार हवाई यात्रा करेंगे क्योंकि उससे बहुत प्रदूषण होता है।
इस लंबी कहानी से एक तो धरती के लिए फिक्र की गंभीरता का एक नया पैमाना सामने आता है जिस पर सोच विचार की जरूरत है। दूसरी बात यह कि एक नई जिंदगी को धरती पर बोझ मानने की अमरीकी या सम्पन्न तबके की वजहं अलग हैं जो भारत की आधी, गरीब, आबादी जैसे तबकों से बिल्कुल अलग है।
कुछ महीने पहले एक विदेशी फोटोग्राफर परिचित ने मुझे कवर्धा के बैगा इलाके की कुछ तस्वीरें भेजीं। इनमें बच्चे ऐसे पुराने टायर से खेलकर खुश थे जिसकी गाड़ी को किसी और ने ही इस्तेमाल किया होगा। इनकी महिलाएं तेल के खाली डिब्बों में पानी भर रही थीं, जाहिर है कि दस-पन्द्रह किलो तेल एक साथ तो इनकी बस्ती मिलकर भी न खरीद सके। इनमें से एक बच्चा या बूढ़ा शहरी सफारी पहना हुआ था, जो कि जाहिर है कहीं से इस्तेमाल होती हुई यहां तक पहुंची थी।
अमरीकी युवती टोनी का बच्चा पैदा होते ही रोज आधा दर्जन नैफीज (भारी भरकम लंगोट) इस्तेमाल करके फेंकता, उसके लिए पुरा कमरा सजाता, हर सामन की पैकिंग आती, और मरने तक वह अमरीकी कागज, कपड़ा, प्लास्टिक, ईंधन, बिजली (कोयला) की शक्ल में शायद दस-बीस किलो रोज खर्च करता।
पर्यावरण की फिक्र बहुत अच्छी है लेकिन भारत के गरीब तबके के संदर्भ में हालत बहुत अलग भी हैं। यहां की आधी आबादी की खपत इतनी कम है और गढऩे, पैदा करने, बनाने की क्षमता उसकी इतनी अधिक है कि वह धरती पर बोझ नहीं है। वह धरती की संभावनाओं को इस तरह से इस्तेमाल करना जानता है कि उससे धरती को नुकसान नहीं पहुंचता जैसे एक गरीब किसी पेड़ पर अपने दस बच्चों को चढ़ाकर अपने काम के फल-फूल, पत्ते तोड़ते चलता है, उससे पेड़ का नुकसान नहीं होता। लेकिन जब एक अमीर अपने घर के लिए, फर्नीचर के लिए एक पेड़ को कटवाता है या कटी लकड़ी को खरीदता है, तो वह हजार गरीबों से हजार गुना अधिक बोझ बन जाता है।
गरीब को पर्यावरण शब्द पढऩा नहीं सीखना होता। वह जिंदगी के अपने बेबस-किफायत के अंदाज के चलते पर्यावरण पे्रमी रहता ही है। दूसरी तरफ बड़े होटलों के एयरकंडीशंड कमरों में रूककर वहां के आलीशान हॉल में बैठक करने के लिए प्लेन और कार से आने-जाने वाले शहरी पर्यावरण-प्रेमी अपनी इस फिक्र से सिलवटें धरती के माथे पर डालते हैं।
ऐसी फिक्र देखकर मुझे अक्सर लगता है कि समाज की फिक्र और सरोकार के तमाम कामों से ऐशो आराम की तमाम फिजूलखर्ची को खत्म करने की बात सामाजिक संगठनों के स्तर पर क्यों नहीं होती? क्यों इनके नारों के मुताबिक ही सामाजिक ऑडिट इनके आयोजनों का नहीं होता कि इनके फिक्र-कीर्तन से धरती पर बोझ कितना बढ़ा?
फिर मेरा खून खौलता है सरकार चलाते उन लोगों को देखकर जिन्होंने आबादी की ताकत के इस्तेमाल ही योजनाएं बनाकर जनता और धरती दोनों की दिक्कतें तो दूर नहीं कीं, जो बढ़ती आबादी को अपने सारे निकम्मेपन की आसान वजह पाकर निठल्ले बैठे हैं। अगर गांधी की सुझााई ग्रामीण, हाथ के उद्योगों की अर्थव्यवस्था को जिंदा ही रहने दिया जाता तो भी देश की गरीब आबादी देश की ताकत होती। लेकिन इस पर नेता-अफसर-ठेकेदार के त्रिशूल ने विदेशी टेक्नालॉजी, मशीनें बेचने के लिए ऐसा हमला किया कि हाथ निहत्थे हो गए।
न तो अलग से परिवार कल्याण कार्यक्रम पर खर्च करने की जरूरत थी, न ही पर्यावरण को बचाने के लिए खर्च करना होता, अगर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की सस्ती योजनाएं बनतीं, उन पर गांधीवादी ईमानदारी से अमल होता, तो ये दोनों विभाग बेरोजगार हो गए होते।
धरती पर जहां खपत का खतरनाक अंदाज है वहां तो टोनी की तरह की फिक्र जरूरी है, लेकिन यहां तो स्टेशनों पर फेंकी गई पानी की खाली बोतल को गरीब बरसों इस्तेमाल करता है, सैकड़ों-हजारों बार। वह एक लिटर की बोलत लेकर जाता है और फारिग होकर आ जाता है। शहरों में सम्पन्न तबका जितनी बार शौचालय या मूत्रालय जाता है, ऐसी दस बोतलें एक साथ, एक-एक बार में फ्लश कर आता है।
लेकिन इन तमाम बातों पर फिक्र भी जरूरी है। मैं सुबह घर से दफ्तर जाता हूं तो रास्ते में महंगे राजकुमार कॉलेज पहुंचते बच्चों की बड़ी-बड़ी कारें लगभग कतार में चलते दिखती हैं। मुझे लगता है कि क्यों कॉलेज ही पहल करके बच्चों के ऐसे समूह नहीं बनवा देता जो बारी-बारी से एक-एक की कार में आ सकें? क्यों आरामदेह बसें नहीं हो सकतीं, जिनके बार-बार कॉलेज आने पर एक फीस वसूल की जाए? क्यों हर शहर अपने को सुधारने के बारे में स्थानीय दिक्कतें नहीं पहचानता और क्यों उनका इलाज नहीं ढूंढता? क्यों राज्य सरकारें बहुत से सालाना सम्मानों को देने के लिए स्तरहीन चेहरे ढूंढने के बजाय ऐसी ठोस बातों के लिए पुरस्कार और सम्मान रखती जिनसे सचमुच ही धरती का भला हो?
क्यों समाज रात की शादियों को दोपहर में नहीं लाता ताकि बिजली बच़े क्यों पार्टियों में प्लास्टिक पर रोक नहीं लगती? क्यों पेड़ों की जगह शहरों में होर्डिंग्स फल-फूल रहे हैं? क्यों कोई संगठन लोगों के घरों में बेकार पड़े सामानों के इस्तेमाल का कोई आंदोलन छेड़ता?
ऐसे कई सवाल इस मुद्दे पर सोचते हुए परेशान करते हैं। कल जब छत्तीसगढ़ विधानसभा में अपने दफ्तर में बैठे नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा अस्थमा से निपटने का इनहेलर लें चुके तो उन्होंने मुझसे कहा कि वे आज सदन में बोल नहीं पाएंगे क्योंकि अभी उनकी एंजियोप्लास्टी हुई है और बोलते हुए वे उत्तेजित हो जाते हैं।
मैं अस्थमा या एंजियोप्लास्टी से तो बचा हूं लेकिन लिखते हुए उत्तेजित जरूर हो जाता हूँ। शायद इसलिए कि मेरी इस फिक्र से उन माथों पर कोई बल नहीं पड़ते जहां खुद ब खुद पडऩे चाहिए थे। और फिक्र करने वाले जो पेशेवर माथे हो गए हैं, उनके ऐशो-आराम की फिजूलखर्ची देख धरती के माथे पर बल पड़ते हैं। धरती भी सोचती है- जिसके ऐसे-ऐसे यार, उसको दुश्मन की क्या दरकार।
-सुनील कुमार
गांधी ने उस समय किफायत की बात शुरू की जब पर्यावरण को बचाने की बात की भी जरूरत शुरू नहीं हुई थी। गांधी को छोड़ें तो जैन धर्म ने तो और पहले ही संचय के खिलाफ नसीहत दी थी। इस धर्म के कार्यकर्ता न अधिक खाते, न अधिक सामान इस्तेमाल करते और न ही इक_ïा करते। पर्यावरण के लिए इससे बड़ी कौन सी बात हो सकती थी? यह एक अलब बात हे कि इस धम्र को मानने वालों की दावतों में सामानों की सम्पन्न बरबादी देखते ही बनती है, और संचय की नसीहत से परे ही इस धर्म का पालन करने वाले दिखते हैं। लेकिन बाकी मजहबों की नसीहत का हाल इससे बहुत बेहतर होता हो ऐसा भी नहीं, लेकिन आज बात यहां मजहब की नहीं करनी है।
बाजार से सामान खरीदते हुए जहां जरूरत न हो फैली बैग के लिए मना करते हुए हमारे मन को यह तसल्ली हो जाती है कि हमने धरती पर बोझ नहीं बढ़ाया। अभी दो ही दिन पहले मैं प्रोडक्ट और पैकिंग डिजाइनिंग की बात करते हुए सोच रहा था कि ऐसी पैकिंग जिसका दुबारा सार्थक उपयोग न हो सके, उस पर अतिरिक्त टैक्स क्यों न लगाया जाए? क्यों न डिजाइनिंग के पाठ्यक्रमों में इसकी किफायत और इसके दुबारा उपयोग की संभावनाओं को एक पूरे डिप्लोमा या डिग्री के रूप में शामिल किया जाए?
अपने आस-पास मुझे जब रंग-पेंट और तेल-ग्रीस से खाली हुई बाल्टियां बरसों इस्तेमाल होते दिखती हैं तो कुछ तसल्ली होती है। लेकिन साथ-साथ जब प्लास्टिक के सामानों की दुकानों पर जग, ग्लास और कटोरे दिखते हैं तो लगता है कि चाय, कॉफी, बोनविटा या अचार जैसे सामान ऐसी पैकिंग में क्यों नहीं आते?
लेकिन आज एक ऐसी फिक्र के बारे में यहां लिखना है कि जिसे सुनकर लोगों को अजीब लगेगा।
अमरीका की एक युवती, टोनी वर्नेली ने तय कर रखा था कि वह कभी मां नहीं बनेगी, क्योंकि उसे लगता था कि धरती को अगर बचाना है तो इसका दोहन करने वाली आबादी कम रखनी होगी। वह एक नई जिंदगी, एक नए बच्चे को पर्यावरण पर सबसे बड़ा बोझ मानती थी। पन्द्रह बरस की उम्र में उसने मांसाहार छोड़ दिया था क्योंकि मांसाहार के पशु-पक्षी तैयार करने का उद्योग बहुत अधिक पानी मांगता है और मांस के लायक होने तक पशु धरती पर बोझ रहते हैं।
उसकी एक लंबी कहानी अभी अमरीका में छपी है लेकिन हम अपने काम का हिस्सा उसमें से निकालें तो वह यह है कि वह गर्भवती हो गई और दहशत में जाकर उसने गर्भपात करवाया। फिर बरसों तक डॉक्टरों के सामने गिड़गिड़ा कर उसने नसबंदी करवाई। सत्ताईस बरस की युवती की नसबंदी करने कोई डॉक्टर तैयार नहीं हुआ। क्योंकि इनको लगता था कि किसी दिन उसका इरादा बदल सकता है। लेकिन आखिर में एक डॉक्टर ने उस पर यह अहसान किया।
टोनी ने अपने पुरुष मित्रों से, पति से, सबसे यह बात साफ कर दी कि वह कभी मां नहीं बनेगी, यह जानकार कुछ लोग उसके साथ रहे, कुछ चले गए। उसने बाद में अपने पति के साथ यह भी तय किया कि वे लोग साल में सिर्फ एक बार हवाई यात्रा करेंगे क्योंकि उससे बहुत प्रदूषण होता है।
इस लंबी कहानी से एक तो धरती के लिए फिक्र की गंभीरता का एक नया पैमाना सामने आता है जिस पर सोच विचार की जरूरत है। दूसरी बात यह कि एक नई जिंदगी को धरती पर बोझ मानने की अमरीकी या सम्पन्न तबके की वजहं अलग हैं जो भारत की आधी, गरीब, आबादी जैसे तबकों से बिल्कुल अलग है।
कुछ महीने पहले एक विदेशी फोटोग्राफर परिचित ने मुझे कवर्धा के बैगा इलाके की कुछ तस्वीरें भेजीं। इनमें बच्चे ऐसे पुराने टायर से खेलकर खुश थे जिसकी गाड़ी को किसी और ने ही इस्तेमाल किया होगा। इनकी महिलाएं तेल के खाली डिब्बों में पानी भर रही थीं, जाहिर है कि दस-पन्द्रह किलो तेल एक साथ तो इनकी बस्ती मिलकर भी न खरीद सके। इनमें से एक बच्चा या बूढ़ा शहरी सफारी पहना हुआ था, जो कि जाहिर है कहीं से इस्तेमाल होती हुई यहां तक पहुंची थी।
अमरीकी युवती टोनी का बच्चा पैदा होते ही रोज आधा दर्जन नैफीज (भारी भरकम लंगोट) इस्तेमाल करके फेंकता, उसके लिए पुरा कमरा सजाता, हर सामन की पैकिंग आती, और मरने तक वह अमरीकी कागज, कपड़ा, प्लास्टिक, ईंधन, बिजली (कोयला) की शक्ल में शायद दस-बीस किलो रोज खर्च करता।
पर्यावरण की फिक्र बहुत अच्छी है लेकिन भारत के गरीब तबके के संदर्भ में हालत बहुत अलग भी हैं। यहां की आधी आबादी की खपत इतनी कम है और गढऩे, पैदा करने, बनाने की क्षमता उसकी इतनी अधिक है कि वह धरती पर बोझ नहीं है। वह धरती की संभावनाओं को इस तरह से इस्तेमाल करना जानता है कि उससे धरती को नुकसान नहीं पहुंचता जैसे एक गरीब किसी पेड़ पर अपने दस बच्चों को चढ़ाकर अपने काम के फल-फूल, पत्ते तोड़ते चलता है, उससे पेड़ का नुकसान नहीं होता। लेकिन जब एक अमीर अपने घर के लिए, फर्नीचर के लिए एक पेड़ को कटवाता है या कटी लकड़ी को खरीदता है, तो वह हजार गरीबों से हजार गुना अधिक बोझ बन जाता है।
गरीब को पर्यावरण शब्द पढऩा नहीं सीखना होता। वह जिंदगी के अपने बेबस-किफायत के अंदाज के चलते पर्यावरण पे्रमी रहता ही है। दूसरी तरफ बड़े होटलों के एयरकंडीशंड कमरों में रूककर वहां के आलीशान हॉल में बैठक करने के लिए प्लेन और कार से आने-जाने वाले शहरी पर्यावरण-प्रेमी अपनी इस फिक्र से सिलवटें धरती के माथे पर डालते हैं।
ऐसी फिक्र देखकर मुझे अक्सर लगता है कि समाज की फिक्र और सरोकार के तमाम कामों से ऐशो आराम की तमाम फिजूलखर्ची को खत्म करने की बात सामाजिक संगठनों के स्तर पर क्यों नहीं होती? क्यों इनके नारों के मुताबिक ही सामाजिक ऑडिट इनके आयोजनों का नहीं होता कि इनके फिक्र-कीर्तन से धरती पर बोझ कितना बढ़ा?
फिर मेरा खून खौलता है सरकार चलाते उन लोगों को देखकर जिन्होंने आबादी की ताकत के इस्तेमाल ही योजनाएं बनाकर जनता और धरती दोनों की दिक्कतें तो दूर नहीं कीं, जो बढ़ती आबादी को अपने सारे निकम्मेपन की आसान वजह पाकर निठल्ले बैठे हैं। अगर गांधी की सुझााई ग्रामीण, हाथ के उद्योगों की अर्थव्यवस्था को जिंदा ही रहने दिया जाता तो भी देश की गरीब आबादी देश की ताकत होती। लेकिन इस पर नेता-अफसर-ठेकेदार के त्रिशूल ने विदेशी टेक्नालॉजी, मशीनें बेचने के लिए ऐसा हमला किया कि हाथ निहत्थे हो गए।
न तो अलग से परिवार कल्याण कार्यक्रम पर खर्च करने की जरूरत थी, न ही पर्यावरण को बचाने के लिए खर्च करना होता, अगर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की सस्ती योजनाएं बनतीं, उन पर गांधीवादी ईमानदारी से अमल होता, तो ये दोनों विभाग बेरोजगार हो गए होते।
धरती पर जहां खपत का खतरनाक अंदाज है वहां तो टोनी की तरह की फिक्र जरूरी है, लेकिन यहां तो स्टेशनों पर फेंकी गई पानी की खाली बोतल को गरीब बरसों इस्तेमाल करता है, सैकड़ों-हजारों बार। वह एक लिटर की बोलत लेकर जाता है और फारिग होकर आ जाता है। शहरों में सम्पन्न तबका जितनी बार शौचालय या मूत्रालय जाता है, ऐसी दस बोतलें एक साथ, एक-एक बार में फ्लश कर आता है।
लेकिन इन तमाम बातों पर फिक्र भी जरूरी है। मैं सुबह घर से दफ्तर जाता हूं तो रास्ते में महंगे राजकुमार कॉलेज पहुंचते बच्चों की बड़ी-बड़ी कारें लगभग कतार में चलते दिखती हैं। मुझे लगता है कि क्यों कॉलेज ही पहल करके बच्चों के ऐसे समूह नहीं बनवा देता जो बारी-बारी से एक-एक की कार में आ सकें? क्यों आरामदेह बसें नहीं हो सकतीं, जिनके बार-बार कॉलेज आने पर एक फीस वसूल की जाए? क्यों हर शहर अपने को सुधारने के बारे में स्थानीय दिक्कतें नहीं पहचानता और क्यों उनका इलाज नहीं ढूंढता? क्यों राज्य सरकारें बहुत से सालाना सम्मानों को देने के लिए स्तरहीन चेहरे ढूंढने के बजाय ऐसी ठोस बातों के लिए पुरस्कार और सम्मान रखती जिनसे सचमुच ही धरती का भला हो?
क्यों समाज रात की शादियों को दोपहर में नहीं लाता ताकि बिजली बच़े क्यों पार्टियों में प्लास्टिक पर रोक नहीं लगती? क्यों पेड़ों की जगह शहरों में होर्डिंग्स फल-फूल रहे हैं? क्यों कोई संगठन लोगों के घरों में बेकार पड़े सामानों के इस्तेमाल का कोई आंदोलन छेड़ता?
ऐसे कई सवाल इस मुद्दे पर सोचते हुए परेशान करते हैं। कल जब छत्तीसगढ़ विधानसभा में अपने दफ्तर में बैठे नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा अस्थमा से निपटने का इनहेलर लें चुके तो उन्होंने मुझसे कहा कि वे आज सदन में बोल नहीं पाएंगे क्योंकि अभी उनकी एंजियोप्लास्टी हुई है और बोलते हुए वे उत्तेजित हो जाते हैं।
मैं अस्थमा या एंजियोप्लास्टी से तो बचा हूं लेकिन लिखते हुए उत्तेजित जरूर हो जाता हूँ। शायद इसलिए कि मेरी इस फिक्र से उन माथों पर कोई बल नहीं पड़ते जहां खुद ब खुद पडऩे चाहिए थे। और फिक्र करने वाले जो पेशेवर माथे हो गए हैं, उनके ऐशो-आराम की फिजूलखर्ची देख धरती के माथे पर बल पड़ते हैं। धरती भी सोचती है- जिसके ऐसे-ऐसे यार, उसको दुश्मन की क्या दरकार।
-सुनील कुमार
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