26 मई 2011
पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी की ऐतिहासिक और अभूतपूर्व सफलता के बाद उनकी स्टाईल की साड़ी भारी लोकप्रिय हो गई। एक वजह यह भी है कि करीब साढ़े तीन सौ रुपए की यह साड़ी बहुत से लोग खरीद व पहन सकते हैं। ममता बैनर्जी के पूरे व्यक्तित्व को देखें तो उनमें बहुत समय बाद एक ऐसी सादगी दिखती है जो कि बंगाल के बहुत से कम्युनिस्टों में भी नहीं दिखती। जहां तक हमें याद पड़ता है चुनाव के वक्त ममता ने अपनी संपत्ति का जो ब्यौरा दिया था, और जिसे किसी ने चुनौती नहीं दी थी उसके मुताबिक उनके पास तेरह हजार के गहने, तीन लाख की बैंक व बीमा बचत, एक लाख अठारह हजार बैंक में और अठाईस हजार रुपए नगद थे। न कोई कार और न कोई दूसरी चीज।
सोमवार को ममता अपनी जनता की सरकार की एक मात्र सदस्य थीं जो लालबती, काफिले के बिना राईटर्स बिल्डिंग पहुंची। ममता की सैंट्रो आम कारों की तरह ट्रैफिक सिग्नल पर रुकती है और पुलिस को हिदायत है कि उनकी गाड़ी के लिए ट्रैफिक ना रोका जाए। इन दोनों बातों को जोड़कर अगर देखें तो लगता है कि पश्चिम बंगाल के एक ऐसी जननायिका सामने आई है जिसके तेवर लड़ाकू हैं और जीवनशैली गांधीवादी। आज की राजनीति में जब औने-पौने नेता भी भ्रष्टाचार की कमाई से लाखों की घडिय़ां पहने दसियों लाख की कारों में चलते हैं और शादियों पर करोड़ों का खर्च करते हैं तो जनता की छाती पर सांप लोटने लगता है, क्योंकि यह सब होता तो उसी की कमाई से है। कांगे्रस के भीतर ऐसे अश्लील और हिंसक प्रदर्शन को सोनिया गांधी की नसीहत के बाद भी देखा जा सकता है, जबकि सोनिया गांधी और उनके परिवार का सार्वजनिक जीवन सादगी का दिखता है। ऐसे में अगर इतिहास बनाने वाली ममता बैनर्जी सादगी की एक नई मिसाल पेश करती है तो भारत के कुछ दूसरे नेताओं पर शायद उसका कुछ फर्क पड़े।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम सत्ता की लालबत्तियों और सायरनों के खिलाफ कितनी बार कितना कड़ा लिखते आए हैं, लेकिन ममता बैनर्जी जैसा हौसला दिखाने वाले नेता कम ही होते हैं। हम यह देखकर हैरान होते हैं कि किस तरह वे नेता भी अपने खुद के शहर, अपने मोहल्ले में लालबत्तियों और सायरनों के साथ काफिले में आते-जाते हैं जिन्हें यह चमक महज पांच बरसों के लिए जनता से मिलती है। जनता को सड़क पर चलते मवेशियों की तरह लाठियों से धकेलकर, गालियां देकर पुलिस किनारे करती है और लालबत्ती-काफिले दूसरों के थम जाने की कीमत पर तीर की रफ्तार से निकल जाना चाहती हैं। इनमें सरकार के लोग भी हैं, विधानसभा के लोग भी हैं और ऊंची अदालतों के लोग भी हैं। हम ममता बैनर्जी की इस इंसानियत के लिए तारीफ करेंगे कि वे साधारण कार में बिना लालबत्ती, बिना दूसरों को सड़कों पर रोके हुए अपने दफ्तर आ-जा रही हैं।
यह वह देश है जिसमें आधे से अधिक आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जी रही है। जहां के बच्चे ऐसे भयानक कुपोषण के शिकार हैं कि अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर सहारा रेगिस्तान के देशों के बच्चों से भी बुरी हाल का बताते हैं। यहां पर इलाज के बिना गर्भवती महिलाएं हर बरस लाखों में मरती हैं। ऐसे में जब जनता के पैसों पर सत्ता का सुख भोगने वाले अपने आसपास के तमाम कमरों को भारी बिजली जलाकर ठंडा करके रखते हैं तो इस ठंडक का ठीक उल्टा होता है जनता के दिल में जो कि यह देखकर उतना ही जलता है। यही हाल गाडिय़ों के गैरजरूरी काफिले का होता है, यही हाल सत्ता के दूसरे खर्चों का होता है।
हिन्दुस्तान की अदालतें सरकारी खर्च पर, फिजूलखर्च पर कोई लगाम लगाने की हिम्मत इसलिए नहीं करतीं क्योंकि वे खुद सायरन और लालबत्ती वाला सुख भोगने की आदी हो गई हैं। छत्तीसगढ़ में जब हाईकोर्ट की इमारत बन रही थी तब उसके लिए मंजूर किए गए बजट बहुत अधिक बढ़वाने के लिए राज्य सरकार पर जिस तरह का दबाव डाला गया था उस बारे में हमने कुछ बरस पहले छापा भी था। आज भी इस राजधानी में नगर निगम की नई इमारत को एक महल की तरह बनाया गया है जो कि चारों तरफ गंदे पड़े हुए शहर में टाट पर मखमल के पैबंद की तरह दिखता है। जिस छत्तीसगढ़ में रियायती चावल बिना गरीब आधे पेट सोते थे वहां पर राजभवन में साल भर के दो-चार जलसों के लिए अंधाधुंध राजसी और सामंती तौर-तरीकों का हॉल बनवाया गया और इस लोकतंत्र में उसे दरबार हॉल नाम दिया गया! दरअसल भारत में लोकतंत्र तो आ गया लेकिन लोकतंत्र के लिए सम्मान नहीं आ पाया। मुगलों और अंग्रेजों की जुबान अब तक जारी है और उसी तरह के शान-शौकत की आदतें जारी हैं।
सरकारी फिजूलखर्ची के खिलाफ लोगों को अदालतों में जनहित याचिका लेकर जाना चाहिए और इनमें यह भी साफ करना चाहिए कि खुद अदालतें ऐसी तमाम रईसी भोग रही हैं इसलिए उन्हें खुद संविधान के कुछ जानकार लोगों से राय लेनी चाहिए। आज भारत की अदालतें, खासकर बड़ी अदालतें, ऐसे मामलों पर कोई फैसला देने के लायक इसलिए नहीं रह गई हैं क्योंकि इससे उनके अपने खुद के सुख प्रभावित होंगे। इसीलिए हम अदालत से बाहर के संविधान विशेषज्ञों की राय की सलाह दे रहे हैं। आज एक तरफ तो इस देश में रोज पन्द्रह रुपए का खाने वाले को गरीबी की रेखा के ऊपर मानने की सरकारी जिद चल रही है, दूसरी तरफ पन्द्रह रुपए में कैसे किसी का दो वक्त का पेट भर सकता है यह बताने वाला कोई नहीं है। ऐसे गरीब देश में अगर सत्ता पर बैठे लोग अपने-आपको जनता के पैसों से ऐशोआराम देने का काम करते हैं और सत्ता की काली कमाई से बाद में ऐसा ही काम अपने निजी जीवन में करते हैं तो इसके खिलाफ एक आक्रामक जनमत तैयार करने की जरूरत भी है और अदालत तक जाने की भी।
ममता बैनर्जी की शक्ल में एक नई सादगी सामने आई है और देश के हित में इसका इस्तेमाल होना चाहिए।
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