मतदान के लिए दुविधा खड़ी करने वाले


चुनाव के वक्त अकसर मन में एक बात उठती है कि अच्छी पार्टी के बुरे कैंडीडेट और बुरी पार्टी के अच्छे कैंडीडेट गर आमने-सामने हों तो किसे वोट दिया जाए? यह दुविधा तब भी कोई कम नहीं होती जब एक तरफ साम्प्रदायिक विचारधारा की पार्टी का कोई अच्छा जनसेवक उम्मीदवार हो और दूसरी तरफ घोषित रूप से अपने को धर्म निरपेक्ष पार्टी का कहनो वाला, लेकिन भीतर से उतना ही साम्प्रदायिक, भू-माफिया या भ्रष्टï उम्मीदवार हो। जिन लोगों को विचारधारा की फिक्र होती है उनकी भावनाओं से भी जब पार्टी खिलवाड़ करते हुए बहुत ही लुच्चे को पार्टी प्रत्याशी बनाती है, तो वह मतदाताओं की संवेदनशीलता को चुनौती होती है।
यह बात अभी दो घटनाओं से और एक बहस से सामने आई। प. बंगाल में लोगों ने देखा कि राजधानी कोलकाता में लगी शहरी आग चार दिनों तक बेकाबू रही हजारों दूकानें जल गईं और अरबों का नुकसान हुआ। दूसरा इसी राज्य में बर्ड फ्यू फैला, चार तारीख से मुर्गियों की मौतों की जानकारी राज्य सरकार को मिली लेकिन केन्द्र सरकार को ग्यारह तारीख की शाम पांच बजे खबर की गई। एक तो मुर्गियों का धंधा वैसे ही नाजुक धंधा रहता है जिसमें सभी लोग चौकन्ना रहते हैं और प. बंगाल में तो सत्तारूढ़ वाममोर्चे के दलों के लोग शासन-प्रशासन को गांव-गांव तक कब्जे में रखते हैं। मोबाइल फोन से  इन दिनों  पल भर में खबर फैलती हैं, ऐसे में बर्ड-फ्लू के  समाचार को कोलकाता या दिल्ली पहुंचाने के लिए सात दिन लगे! इस बीच की तस्वीरें इतनी भयानक हैं कि राज्य सरकार के पास इस संक्रमण से लोगों को बचाने का कोई इंतजाम नहीं था और मरी मुर्गियां लेकर लोग घूम रहे थे, बिना मास्क, बिना दस्ताने। जहां पर केन्द्र सरकार से आए तकनीकी कर्मचारी अंतरिक्ष यात्रियों की तरह की सील बंद पोशाकों में यह काम कर रहे थे, बंगाल की बेखबर जनता खुले हाथों से बिना नकाब।
इन दो बातों के अलावा भी बीच-बीच में खबरें आती हैं कि वहां राशन के इंतजाम में कैसी बदहाली है। हमने कुछ समय पहले अपने अखबार 'छत्तीसगढ़Ó में रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह वहां बीस हजार राशन दूकानें हैं और फूड विभाग में अठारह हजार कर्मचारी हैं। इंतजाम इतना खराब कि माक्र्सवादी शिकंजे वाले गांव-कस्बों में भी भूखे ग्राहकों ने राशन दूकानें लूटना शुरू किया। अभी एक ओर दिल दहलाने वाली खबर, दूसरी खबरों के सैलाब में दब गई। नंदीग्राम में जहां उद्योग बनने को लेकर लगातार खूनी संघर्ष चल रहा था, वहां पर बड़ी संख्या में दबी हुई लाशें मिलीं। क्या सत्तारूढ़ वाममोर्चे के स्थानीय दबंगों की जानकारी के बिना ऐसा हो सकता था? और जब बंगाल की ही बात हो रही है तो वहां के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री बुद्घदेव भट्टïाचार्य का नंदीग्राम संघर्ष के दौरान दिया गया वह भयानक बयान मुझे नहीं भूलता जिसमें उन्होंने अपनी पार्टी की हिंसा को जायज ठहराया था। उसी वक्त हमने गुजरात में सत्तारूढ़ मोदी द्वारा अपनी पार्टी अपने संगठनों के हिंसा की छूट को याद किया था। क्या साम्प्रदायिक हिंसा और धर्मनिरपेक्ष हिंसा को जायज ठहराने वाली सरकारों में से किसी का जुर्म कम गिना जा सकता है? एक धर्म के मतभेद पर टिकी हिंसा है तो दूसरी राजनीति के मतभेद पर टिकी हुई।
लेकिन पहले लिखे जा चुके इन तर्कों से परे अब एक बात लगती है कि क्या विचारधारा प्रशासन का विकल्प हो सकती है? क्या मोदी के अच्छे प्रशासन की सफलता को अनदेखा किया जा सकता है? गुजरात में मोदी के आने के पहले जो प्लेग फैला था सूरत में, उस सूरत की मोदी ने सूरत बदलकर रख दी। अभी वह देश का सबसे साफ शहर ठहराया गया है। लोगों को याद होगा कि इसी सूरत में प्लेग के दौरान आने वाली रेलगाडिय़ों में आगे के स्टेशनों में लोग चढऩा नहीं चाहते थे। दक्षिण गुजरात में बाढ़ आई तो लोगों का कहना है कि मोदी ने बहुत काबिलीयत से इससे जूझकर दिखाया।
दो साल पहले जब सूरत समेत दक्षिण गुजरात में बाढ़ से भारी तबाही हुई तो जान-माल के भारी नुकसान के साथ ही आम नागरिकों को समझ नहीं आ रहा था कि जीवन को पटरी पर कैसे लाया जाए। बाढ़ का पानी उतरा तो घरों में छत की ऊंचाई तक कीचड़ जमा था। अनाज, पानी सामान तो खराब हुआ पर घरों को रहने लायक साफ करना भी मुश्किल हो गया क्योंकि उस समय सूरत में मजदूर एक घर साफ करने की मजदूरी 35-40 हजार रुपए मांग रहे थे। ऐसे समय में राज्य सरकार ने सूरत म्युनिसिपल और आरएसएस समेत अनेक समाजसेवी संगठनों के साथ मिलकर घरों की सफाई की, कचरे की निकास और स्वास्थ्य सेवा का काम बखूबी किया। सूरत वासियों को प्रशासनिक दक्षता का जो अनुभव हुआ यह उसी का नतीजा था कि सूरत और उसके आसपास चुनाव में सोनिया-राहुल के दौरे का कोई असर नहीं हुआ और बीजेपी यहां भारी बहुमत से जीती।
वैसे भी साम्प्रदायिक दंगों के जख्मों के ऊपर, गुजरात एक अच्छी सरकार और अच्छा प्रशासन देख रहा है। राज्य बहुत से कांगे्रसी और वामपंथी राज्यों के मुकाबिले बेहतर शासन-प्रशासन पा रहा है। विचारधारा साम्प्रदायिक न होती तो और भी बेहतर होता, लेकिन धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के साथ किसी राज्य में बुरे प्रशासन का क्या तर्क बन सकता है? क्या धर्म निरपेक्षता कहती है कि नालायकी और निकम्मेपन से काम करो? यह भी कोई तर्क हो सकता है कि हम नालायक हैं, लेकिन धर्मनिरपेक्ष हैं?
विचारधारा और प्रशासन, इन दोनों मोर्चों पर लोग अच्छे हो सकते हैं। कोई-कोई राज्य टुकड़ों में ये दोनों काम कर दिखाते हैं। अभी छत्तीसगढ़ सरकार ने गरीबों को तीन रुपए किलो चावल देना शुरू किया तो भाजपा विरोधी हिल गए। इस योजना की हमने तारीफ की तो कुछ लोगों ने कहा कि भाजपा की सरकार को आप क्या वापिस लाना चाहते हैं? अब अगर छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार जनकल्याण की एक बड़ी योजना लागू करना चाहती है तो इसके बाद जनता तय करेगी कि उसे किसे वोट देना है। अगर छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार में राशन व्यवस्था, केन्द्र सरकार के मुताबिक, वामपंथी बंगाल से बहुत बेहतर है, तो क्या इसके लिए हम भाजपा की नीतियों को कोसें?
यह वही धान का कटोरा है जिसे चालीस से अधिक बरस भोपाल में बैठी सरकारों ने लूटा, जिसमें दो तो छत्तीसगढ़ से गए कांगे्रसी मुख्यमंत्री भी थे। राज्य बनने के बाद हमने देखा कि किस कदर हमारे हक, बाकी मध्यप्रदेश के पेट में जा रहे थे। ऐसे में आज अगर यह खुशहाल राज्य अपने तमाम भ्रष्टïाचार के बीच भी गरीबों को सस्ता चावल दे रहा है तो क्या इस मौके पर भी भोपाली-कांगे्रसी शोषण की तारीफ की जाए?
लोगों को यह फर्क समझाना होगा कि अच्छा प्रशासन और अच्छी विचारधारा, इनमें से कोई एक-दूसरे का विकल्प नहीं हो सकता। और अगर चुनावी हिसाब से जनता को कोई गलतफहमी होती भी है तो वह अच्छे प्रशासन के पक्ष में ही होती है। अच्छा प्रशासन सिर चढ़कर बोलता है और मोदित्व का खतरा उस तरह सतह पर नजर नहीं आता।
मेरा यह भी मानना है कि धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाली ताकतों की आसमान छूती असफलता से ही देश में कोई राज्य जातिवादियों के हाथ गया तो कोई साम्प्रदायिक लोगों के। अपनी नीयत की बेईमानी और अपने भ्रष्टïाचार, अपनी नालायकी को जनता की नासमझी कहकर टाला नहीं जा सकता। लोकतंत्र में चुनाव महज सिद्घांतों के आधार पर नहीं लड़े जाते, अच्छा शासन-प्रशासन भी मायने रखता है, शायद अधिक ही।
ऐसे में मतदाता के लिए दुविधा खड़ी करने वाले असफल ही होंगे, इनकी कोई क्या मदद कर लेगा।

- सुनील कुमार

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें