पिछले दो दिनों में दो मामले सामने आए। दिल्ली के कनॉट प्लेस इलाके में दस बरस पहले पुलिस अफसरों ने दो बेकसूरों को आतंकवादी बताकर रूबरू मार डाला था और फिर फोरेंसिक एक्सपर्ट ने भी झूठी रिपोर्ट देकर पुलिस को बचाया था। दस अफसरों को इन हत्याओं के लिए अदालत ने कसूरवार करार दिया है और अगले हफ्ते इनकी सजा तय होगी।
दूसरा मामला कोलकाता का है जहां एक मुसलमान लड़का एक हिंदू उद्योगपति की बेटी से शादी करने के कारण दबाव झेल रहा था। उद्योगपति की ताकत के कारण उसे प्रताडि़त किया जा रहा था और जब उसकी लाश पड़ी मिली तो पुलिस ने आनन-फानन इसे आत्महत्या करार दे दिया।
इस मामले में अदालत की लताड़ के बाद प. बंगाल की वाममोर्चा सरकार को लगा कि उसके अफसरों से गलती हो गई। सरकार ने पुलिस कमिश्नर सहित कुछ और आला अफसरों का कोलकाता से तबादला कर दिया।
दो और घटनाएं छत्तीसगढ़ की हैं। अभी-अभी एक सरकारी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री और मंत्रियों की मौजूदगी में एक बड़ा अफसर विभाग की उपलब्धियों को इतने खुलासे से इतनी देर तक बखान करता रहा कि बाद में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के कहने को कुछ रह नहीं गया। लेकिन जिन लोगों से यह हक छिना, उनको भी इस स्थिति में कुछ अटपटा नहीं लगा।
आखिरी बात, जिससे आज इस मुद्दे पर लिखना तय किया, आज सुबह के एक अखबार में छपा है। छत्तीसगढ़ से दक्षिण कोरिया प्रशिक्षण पाने गए एक दल ने लौटकर कहा कि वे वहां अफसरों को मिली आजादी देखकर अभिभूत हो गए। जाहिर है कि इस टीम में अफसर ही रहे होंगे। छत्तीसगढ़ के दोनों प्रमुख दल आधा दर्जन आईएएस अफसरों के यह सोचते लौटने को देख सहम जाएंगे। बारी-बारी से दोनों दलों के लोग सरकार पर यह तोहमत तो लगाते ही रहते हैं कि उस पर अफसर शाही हावी है और फिर यहां के अफसर कोरिया का गुणगान करते लौटें कि वहां अफसरों को बहुत अधिक आजादी हे, तो इस पर नेताओं और पार्टियों के कान खड़े होने चाहिए।
लेकिन गले तक मालाओं के आने-जाने से घिसे हुए कानों पर जूं रेंगने का अहसास नेताओं को नहीं हो पाता। कान वे संवेदनशीलता खो न चुके होते तो नेताओं को दिखता कि अफसर कहां-कहां उनका हक छीन रहे हैं, वाहवाही पाने के कौन से मौके पर माला पहन तस्वीर खिंचाने में मंत्री को पीछे धकेल अफसर आगे हो जा रहे हैं।
दिल्ली में एक काउंटर में बेकसूरों का कत्ल, कोलकाता में बड़े उद्योगपति की मर्जी पर नाचते बड़े अफसर, छत्तीसगढ़ में एक तरफ वाहवाही लूटते अफसर तो दूसरी तरफ और अधिक वाहवाही की चाह रखने वाले अफसर।
अफसरशाही अपनी जिम्मेदारियों से मुंह चुराकर, अब तक न मिले अधिकारों पर लार टपकाते खड़े हैं। इनकी आखिरी मंजिल वह होगी जाह ंमंत्री सचिव को सर-सर कहते हुए खड़ा होगा। आज भी बहुत से कमजोर मंत्री ऐसा करते हैं और उनको ऐसा करने से रोकने वाला अपुसर एक आध ही कोई होगा।
लोकतंत्र एक लचीली व्यवस्था है। इसमें जब-जब राजनीतिक नेतृत्व का जोर आ जाता है, तब-तब अफसरशाही हावी हो जाती हे। चाहे वह काम गलत रहा हो, प्रधानमंत्री के रूप में जब एक भरी पे्रस कांफे्रंस में राजीव गांधी ने विदेश सचिव को हटाने की बात कही थी, तो बाकी नौकरशाही समझ गई थी कि अब उनका राज नहीं चलेगा, उन्हें काम करना पड़ेगा। अविभाजित मध्यप्रदेश के दिनों में मिट्टïीतेल की कालाबाजारी को लेकर मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने रायपुर की आमसभा में संभागीय कमिश्नर को हटाने की घोषणा की थी।
अफसरों को प्रताडि़त करना ठीक नहीं लेकिन सरकार की उपलब्धियों पर सार्वजनिक वाहवाही पाने के मौकों पर अफसरों का अवैध कब्जा ठीक नहीं। जनता और विपक्ष की गालियां तो सत्तारूढ़ नेता ही खाते हैं, इसलिए वाहवाही के मौके भी उन्हीं को मिलने चाहिए। लेकिन लोकतंत्र की यह व्यवस्था तब गड़बड़ाती है जब नेता अपने काम को सीखने में और उस पर मेहनत करने में भरोसे के बजाय महज राजनीति करते रह जाते हैं या इन्हीं अफसरों के सामने नंगे होकर, भागीदारी में कमाई करने लगते हैं। भ्रष्टïाचार में हम बिस्तर लोगों में कौन किस पर हावी होता है इस पर क्या कहा जा सकता है।
मंत्री तो औसतन कुछ बरस के लिए ही आते और चले जाते हैं, अफसर पूरी नौकरी सरकार में रहते हैं। फिर मंत्रियों को उनके अनुभव और जानकारी के मुताबिक तो विभाग मिलते नहीं, कितनी ताकत उस मंत्री की है उस हिसाब से कमाई वाला विभाग ही उसे मिलता है। ऐसे में अधिकांश मंत्री काफी मामलों में अपने अफसरों की जुबान बोलने लगते हैं। नीतियां बनाने का अपना काम भी छोड़कर वे अफसरों की बताई नीतियों पर अंगूठा लगाने को उतारू दिखते हैं।
कुछ मंत्री तो अफसरों के बताए तरीके से राजनीतिक व्यवहार भी करना शुरू कर देते हैं राजनीतिक-लोकतांत्रिक जरूरतों को समझना छोड़कर।
बंदूकबाज पुलिसियों से लेकर बिना वर्दी वाले नौकरशाहों तक, लोकतंत्र पर एक अलोकतांत्रिक बोझ बुनकर ये बैठ गए हैं। जिनको लोकतंत्र में पानी की तरह बनकर, बिना कोई स्वाद जोड़े, घुल जाना था, वे लोग इमली, मिर्च, नमक या शक्कर जैसे अपने स्वाद जोड़ रहे हैं।
लेकिन बड़ा खतरा ये है कि नेताओं को ये खतरा भी अब नहीं लगता।
-सुनील कुमार
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें