कुछ लोग इसे भी फैलाएं




कल एक मोबाइल फोन पर पन्द्रह मिनट लंबा एक सेक्स सीन देखने मिला। उत्तर भारत के शहरी इलाके के सम्पन्न सवर्ण लगते एक लड़के और लड़की के बीच का सेक्स दिन दहाड़े सड़क किनारे एक कार में मोबाइल फोन के मूवी कैमरे से रिकॉर्ड किया गया। कार के शीशों पर लगी फिल्म के कारण शायद भीतर यह जोड़ा बेफिक्र था कि लोग उन्हें देख नहीं रहे हैं लेकिन इस रिकॉर्डिंग में कार के भीतर से बाहर, बगल से गुजरते लोग साफ दिख रहे थे।
पूरी फिल्म में लड़की इस बात की शिकायत कर रही थी कि लड़का उसके चेहरे की भी तस्वीरें ले रहा है और वह पिछली बार की तरह बदनाम हो जाएगी। लड़का उसे तरह-तरह की कसमें देकर आगे बढ़ता जा रहा था इस भावनात्मक ब्लैक मेलिंग के साथ ही वह ऐसा नहीं करेगी तो वह जिंदगी में कभी दुबारा नहीं मिलेगा। सेक्स के अंत में लड़की को गर्भवती होने की फिक्र भी होती है। लेकिन न बीमारी न गर्भ, किसी भी फिक्र से कंडोम का इस्तेमाल होता।
एक लड़का, एक लड़की, एक बंद कार या कमरा या सूना मैदान और एक मोबाइल फोन। एक-दूसरे को एड्स लेने-देने, लड़की के गर्भवती होने, दोनों के एक-दूसरे से या एक साथ ब्लैक मेल होने, ब्लैक मेलिंग के चलते वेश्यावृत्ति में धकेले, जाने, शादियां टूटने, हत्याएं या आत्महत्याएं होने, सबको सामान इस छोअे से फोन में जुट गया था।
यह जोड़ा देश के ऐसे करोड़ों जोड़ों की तरह का है जो इस किस्म के खतरे में पड़ सकते हैं। और इस वीडियो क्लिप में तो सिरे से ही मूर्ख एक लड़की अपने तमाम कपड़े उतारकर सारे खतरे में अपने को खुले कैमरे के सामने खड़ा कर चुकी थी, बहुत से मामलों में तो कैरा और माइक्रोफोन छिपा हुआ भी हो सकता है।
इस एकदम साफ वीडियो क्लिप को देख-सुन कर मैं बेचैन था कि हमारे अपने बच्चे अगर इस तरह फोन, इंटरनेट और कम्प्यूटरों पर दिख रहे हों तो क्या हो? आज कौन से मां-बाप, कौन से टीचर अपने बच्चों को खुलासे से इन खतरों के बारे में समझाते हैं? एक तरफ टेक्नालॉजी खतरनाक बीमारी की रफ्तार से निजी जिंदगी में घुसपैठ कर चुकी है, दूसरी तरफ बेकाबू बीमारियां ऐसी हो गई हैं कि जिन पर टेक्नालॉजी का कोई बस नहीं है। ऐसे खतरे जितने बढ़े हैं, नई और पुरानी पीढ़ी सबमें दुस्साहस भी उतना ही बढ़ गया हे। सारे प्रचार के बाद भी कंडोम अब तक एक फिजूल का सामान माना जा रहा है। लगभग हर कोई यह मानकर चल रहा है कि एड्स कुछ ही लोगों को होता है और वह इससे परे, सुरक्षित है।
पिछले कुछ हफ्तों से एक-दो मेडिकल कंपनियों के इश्तहार जोरों पर हैं जो ऐसी गोली बेच रहे हैं जिसे सेक्स के एक-दो दिन बाद लेकर भी गर्भ से बचा जा सकता है। इसके बाद गर्भधारण से बचने के लिए कंडोम एक किस्म से गैर जरूरी माना जा सकता हे और बीमारी वाला खतरा तो लोग अनदेखा करके ही चलते हैं। जिंदगी और मौत के बीच की दुनिया की इस सबसे महीन दीवार को इस एक गोली ने आधा तो ढहा ही दिया है और बचा आधा हिस्सा तो एक-दूसरे के एकदम करीब आने की चाह में लोग खुद लांघ लेते हैं।
क्या आज के मोबाइल युग में नौजवान पीढ़ी अपनी हिफाजत के लिए सचमुच तैयार है? क्या स्कूलों और कॉलेजों में, घरों और दोस्तों के बीच, बचाव की नसीहत मिलती है? या फिर नसीहतों की जगह ऐसी मोबाइल फिल्में हवा में तैर रही हैं जो बताती हैं कि किस तरह एक लड़का या लड़की, उसका परिवार, ब्लैकमेलिंग, सामाजिक अपमान या मौत के कगार पर खड़े हैं।
ह पूरा सिलसिला अधिक खतरनाक होते दिख रहा हे। जिस तरह भावनात्मक ब्लैकमेलिंग के सामने कम या अधिक उम्र के लोग कपड़े उतारते हैं, तस्वीरें खिंचवाते चलते हैं वह भयानक हे। डिजिटल टेक्नालॉजी के उपकरण इतने शानदार होते जा रहे हैं और उनके इस्तेमाल के खतरे इतने भयानक होते जा रहे हैं कि वे देखते ही बनते हैं। फिर एक फोन से दूसरे फोन पर पन्द्रह मिनट की वीडियो क्लिप दो-तीन मिनट में बिना किसी तार चली जा रही है। जिसके ऐसे बदनीयत कैमरे के सामने लापरवाही दिखाई उसके मानो पोस्टर ही छप गए।
कल्पना करें कि एक गलती से एक लड़की या महिला एड्स पा सकती है और एड्स का शिकार बच्चा भी। फिर उसकी फिल्म उसके घर-शहर के लोग देखेंगे और वह गली की मोबाइल दूकानों पर दस-दस रुपयों में डाऊन लोड होने लगेगी। परिवार अगर बहुत बेशर्म होगा तो वह बस्ती छोडऩे बेबस हो जाएगा और अगर शर्म वाला हुआ तो शायद दुनिया छोडऩे को बेबस हो जाएगा।
मैं इस बात को खुले और कड़े शब्दों में इसलिए लिख रहा हूं कि लोग इसे बेझिझक अपने आसपास के लोगों को पढ़वाएं। बड़ों को भी, और बच्चों को भी। जिस तरह कुछ लोग एड्स फैला रहे हैं, कुछ लोग ऐसी वीडियोक्लिप फैला रहे हैं, कुछ लोग तो सावधानी की नसीहत भी फैलाएं।
-सुनील कुमार

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