रिश्ते में पूरी ईमानदारी चाहिए तो...




मेरे एक परिचित खासे उदास बैठे थे। उनके मन का बोझ कुछ हल्का कर सकूं इस इरादे से मैंने पूछा कि क्या बात हे, कोई परेशानी?
उनका कहना था परेशानी कुछ नहीं, बस कुछ मन ही खिन्न हे। अपने आप पर कोसते हुए उन्होंने कहा कि एक लड़के को पढऩे में उन्होंने खुद होकर मदद की, कॉलेज का खर्च उठाया, पढऩे को विदेश गया तो उसे स्कॉलरशिप तो मिली लेकिन बाकी कई तरह की मदद उन्होंने की। लौटकर आया तो बंगलौर में एक विदेशी कंपनी में काम करने लगा, लाखों रुपए महीने की कमाई लगा, लाखों रुपए महीने की कमाई है, लेकिन तबसे अब तक कई बार मुलाकात हो चुकी, कभी एक डॉटपेन तक लाकर देने की उसे नहीं सूझी। यहां तक भी बात ठीक थी लेकिन अब उन्हें कुछ लोगों ने आकर कहा कि वह उनके बारे में चर्चा छिडऩे पर कहता है कि दो नंबर का पैसा रहा होगा जो कुछ लोगों की मदद कर देते हैं या फिर टैक्स बचाने का कोई जरिया निकाल लिया होगा।
सुनकर मेरा मन भी टूट गया। दुनिया में ईमानदारी और इंसानियत से जब ऐसा बलात्कार देखता हूँ तो बाकी मासूम दिखती दुनिया के लिए भी कुछ करने की चाह पल भर को ठिठक जाती है। ऐसा ही नहीं कि उनकी बात से मैंने इंसानों का यह रंग पहली बार देखा। मन में कालिख वाले लोग खासी गिनती में हैं। मुझे जब दावतों में लोग, शाम का मेरा पसंदीदा रंग, काला पहने देखते हैं और उसके बारे में कुछ कहने या पूछते हैं तो मैं कहता हूँ कि डॉक्टर ने मुझे मेरे दिल के रंग के कपड़े पहनने की पर्ची लिखकर दी है।
यह बात आधी हकीकत आधा फसाना किस्म की रहती है। कभी मैं सामने या साथ खड़े किसी के बारे में सुनाने के लिए ऐसा कहता हूँ, तो कभी इनमें से किसी के बारे में मेरे मन की उस पल की सोच के मुताबिक कहता हूँ।
दूसरे की मदद करके या उसका साथ देकर, और अब उदास बैठे अपने उस परिचित की तकलीफ को हल्का करने के लिए मैंने उनको अपने कुछ अनुभव बताए। किस तरह कुछ दोस्तों और कुछ परिचितों की मदद के लिए उनकी जरूरत के वक्त मैंने अपने आप को झोंक दिया, फिर बरसों बाद कभी मेरी जरूरत पड़ी तो उनमें से कुछ काम आए कुछ ने मुंह मोड़ लिया। कुछ बिल्कुल ही नए और अनजान ऐसे लोग मदद करने, साथ देने आगे आए जिनको पहले कभी मेरी जरूरत पड़ी भी नहीं थी और आगे तुरंत कोई जरूरत सामने थी भी नहीं।
मेरा मन अधिक मलाल से इसलिए नहीं भरा रहता कि कुछ लोगों ने मेरी पूरी जिंदगी की भलमानसाहत के जवाब में धोखा दिया तो बहुत से और लोगों ने मेरे किसी उपकार के बिना मेरे लिए बहुत कुछ किया।
लेकिन उस पल की तकलीफ मेरी नहीं, मेरे परिचित की थी और इतनी जायज थी कि मुझे भी उससे बिना हैरानी वाली तकलीफ हुई थी। हैरानी इसलिए नहीं कि कई बार इंसान इसी तरह मेरे सामने आकर खड़ा हो जाता है, तख्ती लिए हुए- ''मैं ऐसा ही हूँ।ÓÓ
लेकिन मेरा मन इंसानियत पर से उठ जाए इसके पहले कुछ भले लोग भी आकर खड़े हो जाते हैं, तख्ती लिए हुए- ''मैं हूँ ना...ÓÓ।
अपने परिचित को मैंने अपनी तकलीफों में से कुछ एक गिनाईं, बिना कि उनके काम आते वक्त मैंने उनसे मोलभाव तो किया हुआ नहीं था कि इसके एवज में वे मेरे आड़े वक्त क्या करेंगे। मेरी बात खत्म होने तक उनका मन हल्का हुआ हो या न हुआ हो, मेरा मन इतना भारी हो गया कि मैंने दो बरसों में बीसवीं बार तय किया कि किसी की गमी को हल्का करने के लिए भी मैं अपने मातमी जख्म लेकर नहीं बैठूंगा। लेकिन मन को भी कुछ बातों की लत पड़ी रहती हे, आज फिर मैं उसी पुरानी टीस को लेकर बैठ गया।
इस थोड़ी-बहुत जिंदगी का सबक मुझे यह मिला है कि किसी महान विद्वान की इस बात पर अमल हो सके तो ही किसी के काम आना चाहिए- नेकी कर, दरिया में डाल।
मतलब यह कि कोई भी नेक काम करो तो उसे तुरंत भूल जाओ। एक दूसरी जुबान में ऐसी ही बात कही गई है- गुप्तदान महाकल्याण।
यहां दान का बहुत तंग मतलब धार्मिक दान या भिखारी को दान निकाल लेना गलत होगा।
नेकी उतनी ही करो, उसी के लिए करो, जिसके नाशुकरे होने जाने पर भी मलाल न हो। हो भी तो भी वह बंजारों सा कुछ दिन रहे और आगे बढ़ ले। मजबूत सीमेंट के इश्तहार की तरह पक्का मकान बनाकर बस न जाए मन में।
लेकिन इतना काबू जिसका मन पर हो जाए, वह तो वैसे ही अलौकिक सुख पाने लगेगा। धर्मालु लोगों की जुबान में वह ईश्वरीय आनंद पाने लगेगा।
मैंने अपने भीतर इस लगभग असंभव अलौकिक सुख को भी महसूस किया है और अपने शाम के कपड़ों के रंग वाले मन को भी। इनके बीच में शटल ट्रेन की तरह आते-जाते मैंने पाया है कि जब मन काला होता है तो मेरे आज और आने वाले कल, दोनों पर अंधेरा छा जाता है, केवल बीते हुए कल पर रौशनी रहता है, जख्मों पर, ऑपरेशन टेबिल के ऊपर से गिरती तेज रौशनी की तरह।
एक दिक्कत मुझे यह लगी अपने खुद के साथ कि कुछ प्रभावित, कुख्यात अहसान फरामोशों की जरूरत के वक्त उनके काम आते हुए मुझे लगते रहा कि वैसी मक्कारी शायद वे मेरे साथ न करें। लेकिन यह कुछ वैसी ही खुशफहमी थी जैसी एक खतरनाक औरत के साथ सोने की उत्तेजना में आतुर मर्द की रहती है कि एड्स उसे नहीं होगा। यह आत्मविश्वास, यह दुस्साहस अक्सर गलत साबित होता है। किसी के लिए जी-जान देने के पहले, अपनी सीमा से अधिक उसका भला करने के पहले यह जरूर सोच लेना चाहिए कि उस इंसान ने अपनी जिंदगी में अपने दोस्तों, अपने पे्रमी या प्रेमिकाओं, पति या पत्नी, भाई-बहनों, मां-बाप, अपने मालिक या नौकर, अपनी नौकरी या पेशे के साथ कितनी ईमानदारी या बेईमानी की है।
किसी संदिग्ध औरत या मर्द के साथ सोने के पहले यह तौल लेने की जरूरत रहती है कि उसे अपने किन जगहों पर, किन हालातों में, किस हालत में, कैसे लोगों के साथ, कितनी बार, देखा है? इनसे अपने तय करना चाहिए कि उसके साथ हमबिस्तर होना कितना सुरक्षित और सही होगा, कितना खतरनाक और गलत होगा।
ऐसे ही कुछ लोगों ने सदियों पहले एक टुकड़ा बात सही की है कि कुपात्र को दान देना पाप होता है। दाऊद इब्राहीम के यतीमखाने को दिया चंदा किस काम आएगा यह जो न समझे वह इंसानियत का नुकसान ही करेगा।
घूम-फिरकर मैं शुरू की बात पर आऊं तो किसी का अहसान करना मुझे इंसानियत की सबसे बड़ी खूबी लगती है और अहसनफरामोश होना सबसे बड़ी खामी। इन दो शब्दों को मैं आपसी इंसानी रिश्तों के दायरे से बाहर भी देखता हूँ। जो अपनी धरती के अहसान मानेगा, अपने मां-बाप के अहसान मानेगा, दोस्त दुनिया के अहसान मानेगा, अपने मालिक या नौकर का अहसान मानेगा, वह एक अच्छा इंसान होगा। धरती और दुनिया अगर बेहतर बनेंगे तो ऐसे ही भले इंसानों से बनेंगे भगवानों से नहीं। आज होता यह है कि इंसान हर बात के लिए ईश्वर का अहसानमंद होकर रह लेता है क्योंकि वह सस्ता पड़ते है, एक नारियल या चादर से ईश्वर के धरती के अहसानों को एक मानेंगे तो उनका चुकारा खासा महंगा पड़ता है।
मैंने अब धीरे-धीरे अपने दु:खों से किनारा करना शुरू कर लिया है। जो शिनाख्तशुदा अहसानफरामोश हैं उनके कटे पर मूतने के बजाय मैं कह देता हूँ कि आज सुबह से पानी ही नहीं पिया हे। इस पेशाब के जाने से कोई नुकसान नहीं होता लेकिन खाली टंकी में मलाल भर जाता तो पूरी जिंदगी में कई बार सिर उठाकर मुंह चिढ़ाता।
जिंदगी इतनी छोटी होता है मानो छोटी तनख्वाह वाले की छोब्ी बचत। और दुनिया में अहसानफरामोश शेयर बाजार की फर्जी कंपनियों की तरह भरे पड़े हैं। ऐसे में कहां इंसान के पास गुंजाइश हो सकती है कि वह फर्जी कंपनियों के शेयरों पर निवेश करे? जाने-पहचाने अहसानफरामोश के जले पर फूंकने से बेहतर है अनजान मरीज को खून देकर आ जाना। मन में अफसोस तो नहीं रहेगा।
इस सबके बीच एक बात पहले शब्द से लेकर अब तक मन में कौंध रही है और मैं डर भी रहा था कि अंत तक इसे भूल न जाऊं-
''रिश्ते में पूरी ईमानदारी चाहिए तो कुत्ता पाल लो।ÓÓ
-सुनील कुमार

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