कल फिर बच्चन कुनबा किसी दरगाह पर था। जब इस कुनबे का जिक्र हो तो जाहिर है कि अमरसिंह तो साथ होंगे ही। इस बरस शायद यह पचीसवां ऐसा मौका रहा होगा जब इस कुनबे की धार्मिक यात्राएं टीवी समाचार बुलेटिनों का गला घोंटते वहां लदी हुई थीं। और गला घोंटने का यह काम बच्चन परिवार का खुद का किया हुआ नहीं है, यह फंदा समाचार चैनलों ने अपने दर्शकों की अक्ल के गले में डालकर उस अक्ल को टांग दिया है।
अपने शहर के इकलौते केबल ऑपेटर की मर्जी से मुझे जिन समाचार चैनलों को देखने की इजाजत है, उनमें इन दिनों मुझे बाजार और उद्योग का सीएनबीसी सबसे ईमानदार लगता है जो अपने नाम के मुताबिक काम करता है और जिस पर ज्योतिष नाम का पाखंड, फिल्मी गुपचुप या फिर जुर्म के विशेषांक देखने की बेबसी नहीं होती। इनके अलावा हंसी के पहले आ चुके कार्यक्रमों को दस-दस बार फिर से दिखाना, संगीत के हो चुके मुकाबिलों को फिर से दिखाना, मानो समाचार चैनलों की बैसाखी बन गया है। एक अखबार मानो चौबीस पेज में से बारह पेज, पेज थ्री निकालने लगे, फिल्मी गॉसिप और ग्लैमर की चकाचौंध के पन्ने।
मैंने आज सुबह कोशिश की कि इस हफ्ते का यह कॉलम लिखने के पहले समाचार चैनलों पर कुछ पा जाऊं, लेकिन एक पर अपराध चल रहे थे, एक पर फिल्म, एक पर सरकारी प्रचार फिल्म और एक पर एक महिला भविष्यवक्ता मूर्खों को उनका दिन बताते बैठी थी। उसकी बातें सुनकर लोगों का भविष्य अच्छा होगा या उसके उघड़े भरे-पूरे बदन को देखकर लोगों का वर्तमान अच्छा हो रहा होगा, इस बारे में मेरा सोचना साफ है।
जो कुरूप, वीभत्स, राक्षसों से लगते पुरुष ज्योतिषी भविष्य बताते हैं, उनकी बात सुनकर भविष्य कैसा भी हो, वर्तमान तो तबाह हो ही जाता है। ऐसे में खुले कपड़ों में जब कोई महिला ज्योतिषी सुबह से बन-ठनकर लोगों का वर्तमान ठीक करने बैठती है तो मुझे वह रूसी समाचार चैनल याद आता है जिसमें एक मादक युवती समाचार पढ़ते हुए हर समाचार के साथ एक-एक कपड़ा उतारते जाती है और दर्शक बंधे रह जाता है कि आज घटनाएं अधिक निकलेंगी या कपड़े!
भारत की ऐसी उदार महिला ज्योतिषी भी बारह (बारह ही होती हैं न?) राशियों में से एक-एक का दिन बताते हुए ऐसी कोई उदारता सोच सकती है, उससे बहुत से लोग रात देर तक जागने के बजाय सुबह जल्द उठना शुरू कर देंगे।
अखबार के धंधे में होने के कारण मैं सुखी हूँ कि जो बुलेटिन तीन-चौथाई से अधिक कूड़े से भरे हों, उनसे छपे हुए शब्दों को खतरा नहीं है। इसीलिए भारत में अखबारों का धंधा तेजी से फल-फूल रहा है और लोग टीवी की खबरों से, दूरदर्शन, बीबीसी जैसे एक-दो जिम्मेदार चैनलों को छोड़कर, हिकारत जाहिर करने लगे हैं। जो ईडियट नहीं हैं, वे अब पहले के मुकाबिले अखबार अधिक पढऩे लगे हैं, यह शायद बिना प्रयास की प्रतिक्रिया है इस हिकारत को जाहिर करने के लिए।
मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के एक-दो समाचार चैनलों से मिलने वाली इक्का-दुक्का सूचनाओं की चाह न हो तो मैं पलभर में किसी कंपनी की डीटीएच सेवा ले लूं और केबल ऑपरेटर द्वारा नियंत्रित जिंदगी जीना बंद कर दूं। और अब घटिया भारतीय समाचार चैनलों का मानो विरोध करने के लिए मैं इस फेर में हूँ कि वह टीवी सर्विस लूं जिसमें कुछ समझदार टीवी चैनल साफ-सुथरे दिखें, और दिखें।
टेलीविजन चैनलों का व्यापार अपनी दर्शक संख्या साबित करने के लिए टीआरपी नाम का कोई पैमाना इस्तेमाल करता है। अखबारों की प्रसार संख्या और पाठक संख्या स्थापित करने के लिए भी ऐसे ही कुछ फर्जी पैमाने हैं जिनमें बेईमानी, रिश्वतखोरी देखते अब मेरी जिंदगी गुजरने आ गई है। बाजार की दौड़ में जो अखबार एक-दूसरे का गला काटने को उतारू हैं, उनका भला करके प्रसार और पाठक तय करने वाली एजेंसियां अपना कैसा भला करती हैं उसे मीडिया के धंधे के गैर धंधेबाज लोग भी जानते हैं।
लेकिन इस खूनी मुकाबिले से परे भी अखबारों के पाठक ऐसे हैं जो अच्छे और बुरे में फर्क करना जानते हैं। ये लोग आज की बिपाशा के मुकाबिले प्रेमचंद की निर्मला की अहमियत को जानते हैं और जो टीवी के मुकाबिले अखबारों का महत्व समझते हैं। अखबारों के बीच भी अच्छे और बुरे का फर्क करने वाले लोग हैं जिनकी वजह से एक अच्छा अखबार जिंदा भी रह सकता है।
अच्छे और बुरे अखबार चूंकि बाजार में केबल ऑपरेटर के एकाधिकार के बिना भी बंट जाते हैं इसलिए बाजार में खड़े भी रह जाते हैं। गलाकाट मुकाबिले में एक बाहुबली, दबंग, अखबार आस-पास पहुंचते अखबार को कुचलने की कोशिश कर सकता है, लेकिन उसे खत्म नहीं कर सकता है। टेलीविजन केबल पर समाचार चैनल (शायद बाकी भी) जिस तरह ऊपर-नीचे होते हैं, जिस तरह शुरू और बंद होते हैं, वह देखते ही बनता है।
मेरी बात टीवी और प्रिंट, केबल और डीटीएच, अच्छे ओर बुरे के बीच भटक रही है, लेकिन इन सबके बीच कोई सीधे रास्ते नहीं हैं, बिना पगडंडी वाला खुला मैदान ही है जिस पर टहलते हुए आपको पता नहीं होता कि आप किस तरफ मुड़े और कितना आगे बढ़े। इस चर्चा को हर कुछ हफ्तों में छेडऩे का मेरा मकसद यह है कि लोग अच्छे और बुरे में फर्क करना सीखें। उन्हें जो अच्छा लगता हो उसे भी वे लोगों को बताएं और जो बुरा लगता हो उसे भी। जब तक दुनिया में फलों के रस के फायदे लोगों की समझ नहीं आएंगे, लोग पीने की खराब चीजों से बंधे भी रहेंगे। अच्छा अखबार, अच्छी पत्रिका, अच्छे चैनल को जिंदा रखने के लिए यह जरूरी है कि आप उस बारे में औरों को बताएं। इसी तरह जो खराब लगता है उस बारे में भी लोगों को बताएं। ऐसा इसलिए भी करना चाहिए कि बबूल के बारे में लोगों को सावधान न करते चलें तो आम के लिए कहीं जगह ही न बचे।
केबलों के बीच, चैनलों के बीच, अखबारों के बीच अच्छों को छांटना शुरू नहीं करेंगे तो मीडिया की हालत तो आज ही देश की दबंग, बाहुबली होती संसद सरीखी हो चली है। यह क्या हाल हो गया है टीवी का कि एक भविष्यवक्ता एक मादक, उघड़े वर्तमान के सहारे लोगों को बांधकर रख रही है। वैसे पाठक अखबारों में भी ऐसी डोरियों की शिनाख्त करें जो फंदे की शक्ल में ईडियटों को टांगने के लिए टंगी हैं और उनकी गिनती का आंकड़ा अखबार की सफलता का पैमाना भी है।
-सुनील कुमार
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