सुबह-सुबह सेटेलाइट रेडियो पर बीबीसी की हिंदी में खबरें आ रही हैं। इस वक्त श्रोताओं के पूछे सवालों के जवाब दिए जा रहे हैं। पहली ही जानकारी थी कि दो लोगों के बीच डीएनए कुल दशमलव एक फीसदी (एक फीसदी का दसवां हिस्सा) अलग होता है बाकी पूरा एक सा होता है। मतलब यह कि वैज्ञानिक स्थापित कर चुके हैं कि दुनिया के लोग निन्यानवे दशमलव नौ फीसदी (99.9त्न) एक से हैं और सारा फर्क कुल 0.1 त्न है।
अब हैरानी यह है कि गोरे-काले, लंबे-नाटे, हिंदू-मुस्लिम, शिया-सुन्नी, कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट, इनके बीच जहां कहीं तना-तनी चलती है, वह शरीर के हजारों हिस्से के फर्क को लेकर है। अगर कोलकाता में इन दिनों एक हिंदू लड़की से मुसलमान लड़के की शादी के बाद लड़के की संदिग्ध मौत की सीबीआई जांच चल रही हे तो वह पूरी की पूरी एक हजारवें हिस्से के फर्क से उपजी है। नौ सौ निन्यानवे हिस्सा समानता काम नहीं आई और एक हिस्सा शायद एक जान ले बैठा।
ईश्वर या कुदरत, जिस किसी ने इंसानी नस्ल बनाई है, उसने सोने के इस गहने में यह कैसी हजारवां हिस्सा खोट डाली है कि सारा सुनहलापन खो गया और खोट ही खोट दिखने लगी? यह कौन सा हजारवां हिस्सा हे जो लोगों के बीच लहू बिखरा रहा है जो 99.9त्न एक सा है। शायद साधारण जांच इनके बीच का फर्क भी नहीं बता सकें, लेकिन एक खून कब दूसरे खून का प्यासा हो जाता है यह देखना हैरानी खड़ी करता है।
दूसरी बात अभी मुझे लग रही है कि नारियल खाने के पहले हमें उसके लगभग तीन चौथाई हिस्से को निकाल फेंकना होता है तब जाकर जरा सा हिस्सा काम आता हे। सीताफल खाएं तो छिलका और बीज मिलकर तीन-चौथाई हो जाते हैं। इंसान खुद अपने बदन का कुछ हिस्सा नाखूनों और बालों की शक्ल में लगातार निकाल फेंकता है। इंसान क्या, बदन ही इसे निकाल फेंकता है। लेकिन फिर भी यह हजारवां हिस्सा खीरे की कडूवाहट की तरह नहीं निकल पा रहा। कितना भला होता कि इंसान के सिर के बालों के साथ-साथ उसके दिमाग का यह फर्क का जहर भी निकल जाता? यह सिर ऐसी जमीन सा लगता है जिसके भीतर दिमाग नाम की कंद जमी हुई है, बालों की फसल को पैदा किए जा रही है लेकिन हजारों हिससे वाला यह जहर बिल्कुल भी बाहर नहीं जाने दे रही।
यह कैसा तिकड़मी, शातिर और छुआ-छूत मानने वाला हजारवां हिस्सा है जो बाकी समानताओं पर लात धरकर राज करता है और बाकी नौ सौ निन्यानवे समानताओं को आपस में लड़वाता है! और यह पूरा हजारवां हिस्सा भी नफरत, तिकड़म में नहीं लगे रहता क्योंकि इसी हजारवें हिस्से का फर्क तो रूप-रंग, कद-काठी, चेहरे-मोहरे का भी फर्क करता है, मतलब यह कि इंसान के भीतर-बाहर की बहुत सी ऐसी मौन बातें हैं जो उसके अपने भीतर कोई नफरत पैदा नहीं करतीं, हजारवें हिस्से में से इन तमाम मौन विविधताओं के घटा देने के बाद हजारवें का और जो छोटा सा हिस्सा बचता होगा, उसी के भीतर कहीं एक दुष्टï छिपा है!!
मैं जब इस फर्क की कल्पना कर रहा हूँ, और इसे लिख पाना मेरे लिए आसान नहीं है, मैं कल्पना के हजारों हिस्से से भी कम को बयां कर पा रहा हूँ। हजारों हिस्से का एक हिस्सा उत्तर भारत के कुछ इलाकों में लगातार पे्रमी जोड़ों की हत्या कर रहा है क्योंकि वे अलग-अलग जातियों के हैं। हर बरस ऐसी कुछ दर्जन हत्याएं होती हैं। मध्यप्रदेश कुछ करीब है इसलिए वहां की खबरों पर कुछ अधिक नजर पड़ती है, वहां आए दिन दबंग दलितों पर ज्यादती करते दिखते हैं। ये दबंग अनिवार्य रूप से ऊंची समझी जाने वाली जातियों के होते हैं क्योंकि उनकी मौजूदगी में दलित तो दबंग हो भी नहीं सकता।
गुजरात में नरेन्द्र मोदी के भीतर के हजारों हिस्से के किसी छोटे हिस्से ने ऐसी हजारों जानें ले लीं जो 999 मामलों में नरेन्द्र मोदी जैसी ही दीं। वह फर्क सिर चढ़कर हिंसा करवाने लगा और अपने ही बदन से और बदन काट डाले गए।
गुजरात के मेरे कुछ मित्र मुझे बार-बार कहते हैं कि मुझे अब इस मुद्दे पर लिखना बंद कर देना चाहिए क्योंकि गुजरात अब उन जख्मों से उबर गया है। मेरे ये मित्र वहां के मोदी वाली हजारवें हिस्से जैसे हैं जिन्होंने सत्ता की हिंसा में कुछ खोया नहीं है। सत्ता के कड़े बूटों तले, कहीं गहराइ्र में सुलगते जख्मों की गर्मी नहीं आती, लेकिन उससे वह सुलगना खत्म तो नहीं होता। जब तक हिंसा करने वाले एक हजारवें हिस्से को सजा न मिले, तब तक वह सत्ता में हो या सत्ता के बाहर हो, समाज तो सौ फीसदी असुरक्षित रहेगा।
यह कैसा हजारवां हिस्सा हे जो दलितों को अछूत मानता है? जिस हजारवें हिस्से को साधारण आंखें देख भी नहीं पातीं, उसी हिस्से से पैदा रूप-रंग, कद-काठी का फर्क ऐसा सिर चढ़कर बोलता है कि सारे सामाजिक संबंधों को वही तय करने लगता है, सामाजिक हिंसा लगभग सौ फीसदी इसी पर टिक जाती है।
इस हजारों हिस्से की शिनाख्त और उसकी मरम्मत जरूरी है। मरम्मत शब्द का इस्तेमाल दो किस्म का होता है, एक तो पीटना, दूसरा सुधारना। इस हजारवें हिस्से को पीट-पीटकर सुधारने की जरूरत है। इसे खत्म नहीं करना है क्योंकि इंसानों के बीच यह हजारवें हिस्से का फर्क भी नहीं रह जाएगा तो फिर समाज तो बाल्टी के कारखाने के गोदाम सा हो जाएगा लेकिन इस हजारवें हिस्से से जहर को उसी तरह निकाल फेंकने की जरूरत है जिस तरह खीरा किनारे से काटकर उसके टुकड़ों को रगड़कर कड़वाहट को निकाल दिया जाता है और तब खीरा तरावट देने वाला हो जाता है।
और इस हजारवें हिस्से की फितरत देखनी हो तो दो अलग-अलग बिरादरियों तक जाने की भी जरूरत नहीं है। एक घर के भीतर भी औरत और मर्द के रिश्तों को देखें तो समझ आ जाता है कि मर्द के इस हजारवें हिस्से के भीतर एक दबंग बैठा है और दूसरी तरफ औरत के इस हजारवें हिस्से के भीतर एक दबा-कुचला सहमा सा बैठा है। इन दिनों चारों तरफ दीवाली के दियों की रौशनी बिखरी है, एक कोई किरण इस हजारों हिस्से के उस किसी काले-अंधेरे हिस्से तक जाकर उसे आईना दिखा पाएंगी कि उसका जहर किस तरह पूरे खीरे को खराब किए जा रहा है?
-सुनील कुमार
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