कानून हाथ में लें...


कुछ समय से हम अपने अखबार में जन जागरण अभियान के तरह लोगों को कानून अपने हाथ में लेने के लिए उकसा रहे हैं। एक विज्ञापन अभियान हम डिजाइन करते हैं जिसमें सामाजिक जागरूकता के मुद्दों के लिए हम लोगों को सोचने पर मजबूर करने वाली बात उठाते हैं। जब ट्रकों पर रोक का वक्त होता है और भ्रष्टï पुलिस रिश्वत लेकर ट्रकों को घूसने देती है जिनसे कुचलकर लोग मरते हैं, तो हम लोगों को उकसाते हैं कि वे कानून अपने हाथ में लें। प्रतिबंधित समय में घुसी ट्रकों को घेरकर रोकें और फिर प्रशासन से शिकायत करें।
लेकिन बोलचाल और फिल्मों की जुबान के चलते कानून हाथ में लेने का एक खास किस्म का मतलब स्थापित हो चुका है कि कानून को तोडऩे के लिए हाथ में लेना। जबकि कानून को हाथ में लेना उस वक्त भी ठीक या जरूरी हो जाता है जब कोई और उसे कुचल रहा हो। लोग जब कानून को तोड़ रहे हैं, कुचल रहे हैं तो उसे आप अपने हाथ में लिए बिना और केसे बचा सकते हैं? एक पाठक ने ईमेल करके मुझसे पूछा कि देश में जगह-जगह लोग अपराधियों को या जिन पर महज शक हो उनको पीट-पीटकर मार डाल रहे हैं। ऐसे में कानून को हाथ  में लेने की हमारी सलाह कितनी सही है? इस पाठक ने मुझसे इस पर जवाब भी मांग था लेकिन लिखने का मौका अब जाकर मिला।
प्रचलित भाषा के मतलब से परे कानून के हाथ में लेना कई मौकों पर जरूरी भी हो जाता है। जब कानून के रखवाले उसे बेच खाने पर उतारू हो जाते हैं तब उसे उनके हाथ से छीनकर बचाने का काम कानून विरोधी नहीं होता। आज दिल्ली में ब्लू लाईन बसों के कहर की खबरें टेलीविजन समाचार चैनलों पर लदी हुई हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित इसके लिए अपनी सरकार को नहीं, ट्रैफिक पुलिस को जिम्मेदार करार दे रही हैं जो कि दिल्ली के मामले में केंद्र सरकार के मातहत है, ये एक और बात है कि वह सरकार भी शीला दीक्षित की पार्टी को ही है।
यह इसलिए हो रहा है कि खूनी रफ्तार से दौड़ती बसों ने पुलिस या ट्रांसपोर्ट विभाग को खरीद रखा है। ऐसे में जब अदालत ठंडा भी बेअसर, कपास की पानी सा साबित हो रहा है तो जनता खुद बेकाबू बसों को काबू न करे? उनकी गूंडागर्दी की --- के लिए रफ्तार जांचने वाले उपकरण खुद क्यों न लागए? पीछा करके आप घेरकर उन बसों को क्यों न रोके? मैं नहीं जानता कि ऐसा करने में लोग कौन सा कानून न तोड़ेंगे?
कानून को लेकर यह बेबसी भी लोकतांत्रिक नहीं है कि कानून का जिनको रखवाला बनाया गया है, कानून उनके रहमोकरम पर --- क्या जाए। यह वैसा ही होगा कि अपने बच्चे को हॉस्टल में दाखिल कर देने के बाद उसे प्रताडि़त होते देखना कि हॉस्टल का जिम्मा वार्डन पर है। कानून को भी अपनी ही बच्चा समझना चाहिए और उसे बचाने के लिए लीक से हटकर कोशिश भी करनी चाहिए।
लोग अदालतों या सरकारी दफ्तरों में जाकर स्ट्रिंग ऑपरेशन करने से सहमते हैं। मेरा मानना है कि अदालतों में जजों के ठीक सामने बैठे बाबू जब आने वाले हर व्यक्ति से वसूली करते हैं, तो उसका भांडाफोड़ करना कानून तोडऩा नहीं कानून बचाना होगा। अदालती अवमानना ने हमको आतंक से जकड़ रखा है, इस हद तक कि अदालती भ्रष्टïाचार के खिलाफ एक स्ट्रिंग ऑपरेशन भी अब तक नहीं हुआ। अदालती कमरों में घुसकर इसे करना कानून को बचाना होगा, तोडऩा नहीं, वेसे भी सरकारी या अदालती कुर्सियों पर बैठने वालों को अपने दफ्तरी काम-काज के बारे में गोपनीयता का कोई हक क्यों मिलना चाहिए जब तक कि उनके काम को गोपनीयता का कोई दर्जा हासिल न हो?
अदालतों में, खासकर बड़ी अदालतों में जज अपने लिखे हुए आदेश से परे भी बहुत सी जुबानी बातें करते हैं। इनमें वह खड़े लोगों के साथ कई बार बड़ी बेइंसाफी की बातें भी होती हैं। लेकिन जब मैंने लोगों से कहा कि वे इसकी रिकॉर्डिंग क्यों न ईमेल से तो अदालत द्वारा अवमानना समझ लिए जाने के आतंक से दहशत में थे।
कैसे कोई जज अपनी कुर्सी पर बैठकर किए काम को पारदर्शिता से परे रखने पर अड़ सकता है? यह कानून को बचाना नहीं होगा, कानून तोडऩे को बचाना होगा। जब रिश्वत लेने वाले अफसर की रिकॉर्डिंग करवाने के बाद ही एंटीकरप्शन विभाग उस पर हाथ डालता है तो ऐसी रिकॉर्डिंग अदालतों में गलत कैसे कही जा सकती है? एक नागरिक के रूप में जब मेरे कुछ अधिकार सरकारी दफ्तर में हैं, तो अदालत जाने पर वे क्यों जाएंगे? अदालतों को पारदर्शिता से मुक्त रहने की ऐसी छूट क्यों मिलनी चाहिए?
देश की संसद और विधानसभा के जो कि अदालतों के लिए कानून बनाती हैं, उनकी कार्रवाई का पल-पल दर्ज होता है और एक-एक शब्द छपकर उनकी लाइबे्ररी में रख दिया जाता है, मीडिया में छपता है। संसदीय जांच समितियों या बाकी समितियों की सारी कार्रवाई भी रिकॉर्ड होती है और जनता के सामने रख दी जाती है। ऐसे में अदालतों में सुर्खाब का कौन सा ऐसा पर लगा है कि वहां का भ्रष्टïाचार, वहां की अन्यायपूर्ण टिप्पणियां रिकॉर्ड न की जा सकें़ यह ढाल पूरी तरह अलोकतांत्रिक है और संसद को, अगर जरूरत हो तो, इसे जल्द से जल्द खत्म करना चाहिए?
इस बीच मेरा मानना है कि सरकारी, संसदीय या अदालती भ्रष्टïाचार, अहंकार रिकॉर्ड करने के लिए लोगों को कानून उसी तरह हाथ में लेना चाहिए जिस तरह कि लोग कानून तोड़ती ट्रकों या बसों को घेरकर रोक सकते हैं और फिर सरकार को मजबूर कर सकते हैं कि वह कार्रवाई करे।
समय-समय पर बहुत से कानून चुनौती झेलने के बाद उससे हारकार ही बदले हैं। गांधी का भारत हो या नेल्सन मंडेला का दक्षिण अफ्रीका, रंगभेदी, गुलामी की व्यवस्था का अमरीका रहा हो या महिलाओं को मताधिकार से दूर रखने वाला ब्रिटेन हो, चुनौती पाने के बाद, सड़क को लड़ाई के बाद ही मौजूदा हालात में फेरबदल हो पाया। लोकतंत्र आ जाने के बाद भी संघर्ष की यह जरूरत खत्म नहीं हो जाती, वह जारी रहती है।
मेरा यह भी मानना है कि जनता को मौजूदा कानूनों या उसकी सत्ता द्वारा की गई व्याख्याओं को चुनौती देनी चाहिए। सायरन, लालबत्ती, या बड़े से काफिले में चलने वाले नेता अफसर या जजों के इस हमलावर, अलोकतांत्रिक अहंकार को चुनौती देनी चाहिए। इनसे पूछना चाहिए कि ये क्या दिन भर आग बुझाने को यूं दौड़ भाग करते हैं?
किसी भी देश प्रदेश या समाज के लिए भ्रष्टïाचार उतना बुरा नहीं होता जितना कि जनता में भ्रष्टïाचार के लिए पनप चुका बर्दाश्त होता है। जब लोग बेइंसाफी को सहन करने लगते हैं तो वे अधिक बेइंसाफी, बड़ी बेइंसाफी लिए स्वागत में पलक पावले न बिछा देते हैं। यह सहनशीलता थमनी चाहिए। कानून को बचाने के लिए कानून को हाथ में लेना ही होगा, खासकर तब जब ताकतवर बूट उस कानून को कूचलने को अपना हक मान चुके हैं।
- सुनील कुमार

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