17 फरवरी 08
अमरीका की वर्जीनिया टेक यूनिवर्सिटी में कुछ महीने पहले जब एक छात्र ने बंदूक लेकर 32 लोगों को मार डाला और खुद अपने आपको भी, तो पीछे की पड़ताल से पता लगा कि वह रचनात्मक लेखन की क्लास में भी बहुत हिंसक लेखन के नमूने पेश करते आया था। कुछ लोगों को यह मलाल भी हुआ कि उसकी खूंखार दिमागी हालत को देखते हुए ऐसी किसी संभावित हिंसा का अंदाज लगाकर उसका पहले ही कोई इलाज किया जाना था। लेकिन एक एशियाई मूल से आया हुआ, दिखने में अच्छा नहीं, यह छात्र अपने दायरे में उपेक्षा का शिकार रहा और वही तिरस्कार या अकेलापन उसे आगे ले जाकर, चर्चा में आने की लालसा पर चढ़कर सामूहिक हत्या तक ले गया। लेकिन यह सब तो कई महीने पहले की बात है, अभी उस पर लिखने की जरूरत इसलिए लगी कि अमरीका की पत्र-पत्रिकाओं में अभी यह दुविधा चली कि उसका उस वक्त का हिंसक लेखन अभी छापा जाए या नहीं? आखिर में एक पत्रिका ने एक लेख इस हत्यारे नौजवान और उसके लेखन पर छापा है जिसका एक हिस्सा इंटरनेट पर मौजूद है, बाकी हिस्सा चूंकि ग्राहक बनने पर ही पढ़ा जा सकता है, मैं उसे देख नहीं पाया। लेकिन आज की इस धुंधली चर्चा के लिए उतना पढऩा काफी था।
दरअसल कुछ हफ्तों पहले जब हमारे अखबार 'छत्तीसगढ़Ó में पुलिस प्रमुख विश्वरंजन और नक्सली प्रवक्ता के बीच बहस छिड़ी तो उससे विचलित होकर एक भाजपाई-लेखक ने एक दूसरे अखबार में लिखा था कि हम पर नक्सलियों को जगह देने के लिए विशेष जनसुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। तभी से मैं इस मुद्दे पर लिखना चाह रहा था कि अपराधों में लगे या उनसे जुड़े लोगों के लिखे का क्या करना चाहिए? नक्सलियों के लिखे को लेकर यह कोई बड़ी दुविधा नहीं थी क्योंकि उनके बारे में काफी सोचविचार के बाद मैंने अपना मन बना लिया था कि क्या करना है। लेकिन और कई तरह के अपराधी, अभियुक्त या संदिग्ध लोग जब लिखते हैं तो उनका क्या करना चाहिए।
यहां पर आकर मेरे सामने कुछ मिसालें हैं और कुछ मेरी अपनी सोच, लेकिन कुल मिलाकर आखिर में एक साफ नतीजा नहीं दिखता, धुंध दिखती है। मैं अपनी थोड़ी बहुत पढ़ी किताबों और बातों को याद करूं तो सबसे अधिक छूने वाला मामला मुझे याद पड़ता है नाथूराम गोडसे की लिखी किताब, जिसका नाम शायद- 'मैंने गांधी को क्यों माराÓ है। इस किताब में गोडसे ने गांधी हत्या के पूरे षडय़ंत्र के साथ-साथ अपनी सोच को भी सौ-पचास पन्नों पर लिखा है और भाजपा-संघ परिवार के एक बड़े आयोजन के बुक स्टॉल से खरीदी यह किताब मुझसे कोई ले गया इसलिए उसके हिस्से में यहां नहीं दे पा रहा हूं। लेकिन जब भाजपा की छत्तीसगढ़ की पत्रिका के संपादक ने पुलिस के जवाब में नक्सली बयान छापने के लिए हम पर कार्रवाई की मांग की तो मुझे याद आने लगा युगधर्म।
अखबार नवीसी के अपने शुरूआती बरसों में ही मुझे संघ परिवार के अखबार युगधर्म की याद है जिसमें लालकिला केस की सुनवाई एक लंबे धारावाहिक के रूप में हफ्तावार छपती थी शायद हर बार आधा-आधा पेज। आज के हमारे नियमित लेखक बबन प्रसाद मिश्र युगधर्म के संपादक थे और उनसे मैंने पुरानी कॉपियां मांगी भी थीं। लाल किले में गांधी हत्याकांड की सुनवाई एक विशेष अदालत में हुई थी और गोडसे ने गांधी को क्यों मारा, इसके तर्क और इसके पीछे की सोच नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे की कलम से हफ्तावार छपते रहती थी।
मुझे गोडसे की इसी किताब या किसी और किताब में गांधी के एक बेटे द्वारा नाथूराम गोडसे को लिखे गए लंबे, सम्मानपूर्ण, पत्र भी छपे हैं, जिनमें उन्होंने यह जानना चाहा था कि गोडसे ने उनके पिता को क्यों मारा। यह पत्र व्यवहार कुछ बार तो चला ही था और दोनों के बीच शिष्टïाचार आखिर तक कायम रहा। जब हमारे अखबार में पुलिस प्रमुख विश्वरंजन और नक्सल प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी के बीच के सवाल-जवाब में शिष्टïाचार पर भी भाजपाई-संपादक ने आपत्ति की, तो मुझे गोडसे को गांधी-पुत्र द्वारा लिखे पत्रों की याद आ रही थी।
लेकिन अपने अखबार का जवाब यहां देना मकसद नहीं है। मैं इसे अमरीका से शुरू हुई एक दुविधा के संदर्भ में लिख रहा हूँ। मुझे एक-दो बरस पहले छत्तीसगढ़ के ही अमित जोगी की जेल डायरी याद पड़ रही है जो अखबारों में छपी थी। यह जेल यात्रा अमित जोगी को जग्गी हत्या कांड के अभियुक्त की हैसियत से करनी पड़ी थी जिसमें बाद में निचली अदालत ने उन्हें बरी किया और अब हाईकोर्ट ने फिर उन्हें अदालत में खड़ा किया है। अमित जोगी ने शायद बाद में भी इंटरनेट पर अपनी बेगुनाही की बात लिखी और वह कुछ और जगहों पर छपी।
अपराधों में फंसे लोगों ने दुनिया के बहुत से देशों में लिखा, कभी वह छापने लायक समझा गया, तो कभी नहीं छापा गया, किसी ने उसे छापा, किसी ने नीतिगत रूप से उसे नहीं छापा। कई बार लोग अपने अपराध को न्यायोचित ठहराने की कोशिश करते हैं तो कभी-कभी उसे अपनी उपलब्धि बताने का काम भी। मैंने आज लिखना शुरू करते हुए ही धुंध का जिक्र किया है। मैं अभी ऐसे मामलों के लिए कोई सीधा पैमाना नहीं सोच पाता लेकिन मुझे लगता है कि देश और काल के मुताबिक हर मामले में, उस वक्त, अपने पाठक, दर्शक, श्रोता को देखते हुए जनहित और जनरूचि के मिले-जुले पैमाने पर हर लेखन को आंकना होगा।
नीतिगत और सैद्घांतिक बहस को छोड़ दें, तो मुझे लगता है कि जान-बूझकर लिखे गए झूठ को जानते हुए भी छापना गलत है और अपराधी को अपने अपराध को महिमा मंडित करने का मौका देना भी गलत है। मुझे याद पड़ रहा है कि जब एक बड़े पश्चिमी अखबार ने एक बहुत चर्चित अपराधी से उसके अपराध के बारे में लिखने के लिए मेहनताना देने का इरादा किया तो उसका बड़ा विरोध हुआ। यह वैसा ही होता जैसा हर्षद मेहता का अपने शेयर घोटाले पर लिखकर किसी पत्र-पत्रिका से मेहनताना पाना होता। अपने अपराध से कोई कमाए यह हर जगह गलत माना जाता है, चाहे वह लूटकर हो या लिखकर।
लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी के तहत तो हिटलर की आत्मकथा भी हिंदी में बिक रही है कल को नरेन्द्र मोदी भी गुजरात दंगों पर लिखेंगे तो वह किताब छपने और बिकने की आजादी होगी। आपातकाल के दलालों ने भी उस दौर के बारे में लिखा और वह बिकने की छूट रही, और किताब आपातकाल की जेलों में बंद नेताओं की जेल डायरी के साथ-साथ दूकानों पर बिकी।
लेकिन यहां मैं एक अलग तर्क की जरूरत भी देखता हूं। किताब मीडिया का हिस्सा नहीं है और उसे लिखना, उसका छापना और बेचना, एक अलग आजादी है। लेकिन मीडिया एक अलग कानून के तहत, अलग रीति-नीति के तहत काम करता है, इसलिए उससे अलग पैमानों पर उम्मीदें की जाती हैं। मीडिया के सामने बुलेटिन के समय से लेकर अखबार के पन्नों तक आकार की सीमा भी रहती है और पाठक की व्यापक रूचि और उसकी व्यापक जरूरत की सीमाएं भी रहती हैं। इन सबको इश्तहारों की सीमाएं भी झेलनी पड़ती हैं और उस दिन की बाकी घटनाओं, बाकी खबरों को सैलाब को भी। मीडिया का आपसी गलाकाट मुकाबला भी उसके फैसले तय करता है और पाठकों का दबाव भी। किताबों की दुनिया इनमें से बहुत सी तंग सीमाओं से आजाद रहती है।
मुझे फिर लाल किला केस की सुनवाई का किस्सा याद पड़ता है जो किताब में छपने के चौथाई सदी बाद युगधर्म ने शायद सालभर तक आधा पेज हर हफ्ते छापी थी। वह वक्त शायद मध्यप्रदेश में जनसंघ घटक के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार का था। हो सकता है कि उस समय का वह फैसला गांधी हत्या के बाद देश में पहले गैर कांगे्रस शासन के आने से प्रभावित रहा हो। लेकिन सत्ता ने कब मीडिया के फैसले प्रभावित नहीं किए?
आज की यह बात बहुत सी और बातों तक खिंच सकती है, लेकिन मैं तो इस मुद्दे पर लोगों का सोचना शुरू करने के लिए कुछ कहकर चुप रह जाना चाहता हूँ।
-सुनील कुमार
अमरीका की वर्जीनिया टेक यूनिवर्सिटी में कुछ महीने पहले जब एक छात्र ने बंदूक लेकर 32 लोगों को मार डाला और खुद अपने आपको भी, तो पीछे की पड़ताल से पता लगा कि वह रचनात्मक लेखन की क्लास में भी बहुत हिंसक लेखन के नमूने पेश करते आया था। कुछ लोगों को यह मलाल भी हुआ कि उसकी खूंखार दिमागी हालत को देखते हुए ऐसी किसी संभावित हिंसा का अंदाज लगाकर उसका पहले ही कोई इलाज किया जाना था। लेकिन एक एशियाई मूल से आया हुआ, दिखने में अच्छा नहीं, यह छात्र अपने दायरे में उपेक्षा का शिकार रहा और वही तिरस्कार या अकेलापन उसे आगे ले जाकर, चर्चा में आने की लालसा पर चढ़कर सामूहिक हत्या तक ले गया। लेकिन यह सब तो कई महीने पहले की बात है, अभी उस पर लिखने की जरूरत इसलिए लगी कि अमरीका की पत्र-पत्रिकाओं में अभी यह दुविधा चली कि उसका उस वक्त का हिंसक लेखन अभी छापा जाए या नहीं? आखिर में एक पत्रिका ने एक लेख इस हत्यारे नौजवान और उसके लेखन पर छापा है जिसका एक हिस्सा इंटरनेट पर मौजूद है, बाकी हिस्सा चूंकि ग्राहक बनने पर ही पढ़ा जा सकता है, मैं उसे देख नहीं पाया। लेकिन आज की इस धुंधली चर्चा के लिए उतना पढऩा काफी था।
दरअसल कुछ हफ्तों पहले जब हमारे अखबार 'छत्तीसगढ़Ó में पुलिस प्रमुख विश्वरंजन और नक्सली प्रवक्ता के बीच बहस छिड़ी तो उससे विचलित होकर एक भाजपाई-लेखक ने एक दूसरे अखबार में लिखा था कि हम पर नक्सलियों को जगह देने के लिए विशेष जनसुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। तभी से मैं इस मुद्दे पर लिखना चाह रहा था कि अपराधों में लगे या उनसे जुड़े लोगों के लिखे का क्या करना चाहिए? नक्सलियों के लिखे को लेकर यह कोई बड़ी दुविधा नहीं थी क्योंकि उनके बारे में काफी सोचविचार के बाद मैंने अपना मन बना लिया था कि क्या करना है। लेकिन और कई तरह के अपराधी, अभियुक्त या संदिग्ध लोग जब लिखते हैं तो उनका क्या करना चाहिए।
यहां पर आकर मेरे सामने कुछ मिसालें हैं और कुछ मेरी अपनी सोच, लेकिन कुल मिलाकर आखिर में एक साफ नतीजा नहीं दिखता, धुंध दिखती है। मैं अपनी थोड़ी बहुत पढ़ी किताबों और बातों को याद करूं तो सबसे अधिक छूने वाला मामला मुझे याद पड़ता है नाथूराम गोडसे की लिखी किताब, जिसका नाम शायद- 'मैंने गांधी को क्यों माराÓ है। इस किताब में गोडसे ने गांधी हत्या के पूरे षडय़ंत्र के साथ-साथ अपनी सोच को भी सौ-पचास पन्नों पर लिखा है और भाजपा-संघ परिवार के एक बड़े आयोजन के बुक स्टॉल से खरीदी यह किताब मुझसे कोई ले गया इसलिए उसके हिस्से में यहां नहीं दे पा रहा हूं। लेकिन जब भाजपा की छत्तीसगढ़ की पत्रिका के संपादक ने पुलिस के जवाब में नक्सली बयान छापने के लिए हम पर कार्रवाई की मांग की तो मुझे याद आने लगा युगधर्म।
अखबार नवीसी के अपने शुरूआती बरसों में ही मुझे संघ परिवार के अखबार युगधर्म की याद है जिसमें लालकिला केस की सुनवाई एक लंबे धारावाहिक के रूप में हफ्तावार छपती थी शायद हर बार आधा-आधा पेज। आज के हमारे नियमित लेखक बबन प्रसाद मिश्र युगधर्म के संपादक थे और उनसे मैंने पुरानी कॉपियां मांगी भी थीं। लाल किले में गांधी हत्याकांड की सुनवाई एक विशेष अदालत में हुई थी और गोडसे ने गांधी को क्यों मारा, इसके तर्क और इसके पीछे की सोच नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे की कलम से हफ्तावार छपते रहती थी।
मुझे गोडसे की इसी किताब या किसी और किताब में गांधी के एक बेटे द्वारा नाथूराम गोडसे को लिखे गए लंबे, सम्मानपूर्ण, पत्र भी छपे हैं, जिनमें उन्होंने यह जानना चाहा था कि गोडसे ने उनके पिता को क्यों मारा। यह पत्र व्यवहार कुछ बार तो चला ही था और दोनों के बीच शिष्टïाचार आखिर तक कायम रहा। जब हमारे अखबार में पुलिस प्रमुख विश्वरंजन और नक्सल प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी के बीच के सवाल-जवाब में शिष्टïाचार पर भी भाजपाई-संपादक ने आपत्ति की, तो मुझे गोडसे को गांधी-पुत्र द्वारा लिखे पत्रों की याद आ रही थी।
लेकिन अपने अखबार का जवाब यहां देना मकसद नहीं है। मैं इसे अमरीका से शुरू हुई एक दुविधा के संदर्भ में लिख रहा हूँ। मुझे एक-दो बरस पहले छत्तीसगढ़ के ही अमित जोगी की जेल डायरी याद पड़ रही है जो अखबारों में छपी थी। यह जेल यात्रा अमित जोगी को जग्गी हत्या कांड के अभियुक्त की हैसियत से करनी पड़ी थी जिसमें बाद में निचली अदालत ने उन्हें बरी किया और अब हाईकोर्ट ने फिर उन्हें अदालत में खड़ा किया है। अमित जोगी ने शायद बाद में भी इंटरनेट पर अपनी बेगुनाही की बात लिखी और वह कुछ और जगहों पर छपी।
अपराधों में फंसे लोगों ने दुनिया के बहुत से देशों में लिखा, कभी वह छापने लायक समझा गया, तो कभी नहीं छापा गया, किसी ने उसे छापा, किसी ने नीतिगत रूप से उसे नहीं छापा। कई बार लोग अपने अपराध को न्यायोचित ठहराने की कोशिश करते हैं तो कभी-कभी उसे अपनी उपलब्धि बताने का काम भी। मैंने आज लिखना शुरू करते हुए ही धुंध का जिक्र किया है। मैं अभी ऐसे मामलों के लिए कोई सीधा पैमाना नहीं सोच पाता लेकिन मुझे लगता है कि देश और काल के मुताबिक हर मामले में, उस वक्त, अपने पाठक, दर्शक, श्रोता को देखते हुए जनहित और जनरूचि के मिले-जुले पैमाने पर हर लेखन को आंकना होगा।
नीतिगत और सैद्घांतिक बहस को छोड़ दें, तो मुझे लगता है कि जान-बूझकर लिखे गए झूठ को जानते हुए भी छापना गलत है और अपराधी को अपने अपराध को महिमा मंडित करने का मौका देना भी गलत है। मुझे याद पड़ रहा है कि जब एक बड़े पश्चिमी अखबार ने एक बहुत चर्चित अपराधी से उसके अपराध के बारे में लिखने के लिए मेहनताना देने का इरादा किया तो उसका बड़ा विरोध हुआ। यह वैसा ही होता जैसा हर्षद मेहता का अपने शेयर घोटाले पर लिखकर किसी पत्र-पत्रिका से मेहनताना पाना होता। अपने अपराध से कोई कमाए यह हर जगह गलत माना जाता है, चाहे वह लूटकर हो या लिखकर।
लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी के तहत तो हिटलर की आत्मकथा भी हिंदी में बिक रही है कल को नरेन्द्र मोदी भी गुजरात दंगों पर लिखेंगे तो वह किताब छपने और बिकने की आजादी होगी। आपातकाल के दलालों ने भी उस दौर के बारे में लिखा और वह बिकने की छूट रही, और किताब आपातकाल की जेलों में बंद नेताओं की जेल डायरी के साथ-साथ दूकानों पर बिकी।
लेकिन यहां मैं एक अलग तर्क की जरूरत भी देखता हूं। किताब मीडिया का हिस्सा नहीं है और उसे लिखना, उसका छापना और बेचना, एक अलग आजादी है। लेकिन मीडिया एक अलग कानून के तहत, अलग रीति-नीति के तहत काम करता है, इसलिए उससे अलग पैमानों पर उम्मीदें की जाती हैं। मीडिया के सामने बुलेटिन के समय से लेकर अखबार के पन्नों तक आकार की सीमा भी रहती है और पाठक की व्यापक रूचि और उसकी व्यापक जरूरत की सीमाएं भी रहती हैं। इन सबको इश्तहारों की सीमाएं भी झेलनी पड़ती हैं और उस दिन की बाकी घटनाओं, बाकी खबरों को सैलाब को भी। मीडिया का आपसी गलाकाट मुकाबला भी उसके फैसले तय करता है और पाठकों का दबाव भी। किताबों की दुनिया इनमें से बहुत सी तंग सीमाओं से आजाद रहती है।
मुझे फिर लाल किला केस की सुनवाई का किस्सा याद पड़ता है जो किताब में छपने के चौथाई सदी बाद युगधर्म ने शायद सालभर तक आधा पेज हर हफ्ते छापी थी। वह वक्त शायद मध्यप्रदेश में जनसंघ घटक के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार का था। हो सकता है कि उस समय का वह फैसला गांधी हत्या के बाद देश में पहले गैर कांगे्रस शासन के आने से प्रभावित रहा हो। लेकिन सत्ता ने कब मीडिया के फैसले प्रभावित नहीं किए?
आज की यह बात बहुत सी और बातों तक खिंच सकती है, लेकिन मैं तो इस मुद्दे पर लोगों का सोचना शुरू करने के लिए कुछ कहकर चुप रह जाना चाहता हूँ।
-सुनील कुमार
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