छत्तीसगढ़ का सनसनी-शो




छत्तीसगढ़ के पिछले मुख्यमंत्री, भोपाल के मशहूर इंजीनियरिंग कॉलेज के एक सफल छात्र अजीत जोगी ने कल गुरु घासीदास जयंती पर कहा कि उनकी दुर्घटना सामान्य नहीं थी, इसके लिए जादू-टोना करवाया गया था। जोगी सतनामी समाज के बीच खासे लोकप्रिय नेता हैं और जाहिर है कि इस सालाना जलसे में भारी भीड़ रही होगी। उनका बोलने का अंदाज भी असर डालने वाला होता है और कल वहां मौजूद बहुत से लोग यह पक्का मानकर लौटे होंगे कि जादू-टोना करके किसी का एक्सीडेंट करवाया जा सकता है, बुरा किया जा सकता है। वैसे यह मानने के लिए छत्तीसगढ़ की आबादी के एक बड़े हिस्से को किसी जोगी की जरूरत नहीं है क्योंकि यहां हर बरस कोई दर्जन भर महिलाएं तो टोनही करार देकर मार ही डाली जाती हैं। इनसे परे प्रताडि़त होने वाली महिलाएं हजारों में होंगी।
अभी चार दिन पहले ही कांगे्रस पार्टी के एक कार्यक्रम में अजीत जोगी ने अपनी कई बार की कही बात माइक से फिर दुहराई थी कि कांगे्रस की चुनावी टिकट के लिए किसी को मेहनत नहीं करनी चाहिए क्योंकि जिसके माथे पर लिखा है जिसकी किस्मत है, उसी को टिकट मिलेगी। उस दिन भी यह पढ़कर मुझे कुछ अजीब सा लगा था क्योंकि भाग्यवादियों के बारे में मेरा यह मानना है कि अपनी निजी आस्था से परे जब वे मेहनत करते हैं तभी उन्हें सफलता मिलती है, फिर चाहे वे खुद भी भाग्य को उसका श्रेय देते हैं। मुझे यह भी लगता है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को अपनी निजी आस्था के प्रदर्शन के पहले यह सोचना चाहिए कि ऐसा करके, ऐसा कहके वे अपने असर के दायरे में क्या करने जा रहे हैं।
जिस छत्तीसगढ़ में जादू-टोने पर भरोसा करने वालों के हाथों गाँवों की कमजोर महिलाएं मारी जाती हैं, उस छत्तीसगढ़ में लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहा व्यक्ति अगर अपनी निजी दुर्घटना को जादू-टोने का असर बताएगा, तो अंधविश्वास से रखने वाली जनता के मन में तो बात और पुख्ता हो जाएगी।
हो सकता है कि छत्तीसगढ़ के लाखों और अंधविश्वासी लोगों की तरह जोगी सचमुच ही इसे सच मानते हों, लेकिन इंजीनियरिंग की शिक्षा, आईएएस की नौकरी, काँगे्रस की सदस्यता और मुख्यमंत्री का पद मिलकर भी अगर उनके इस निजी अंधविश्वास या इस अंधविश्वासी बयान, को खत्म न कर सके, तो फिर छत्तीसगढ़ में नियमित रूप से मारी जाने वाली बेकसूर महिलाओं की मौतें तो जारी ही रहेंगी।
यह बात अजीत जोगी शायद पहले भी सार्वजनिक रूप से बोल चुके हैं लेकिन अभी मुझे इस पर लिखना इसलिए जरूरी लगा कि एक प्रमुख राष्टï्रीय समाचार चैनल के साथी पत्रकार ने दो दिन पहले ही मुझसे सवाल किया कि क्या टोनही होती हैं? वे एक रिपोर्ट तैयार कर रहे थे और मुझे इस विषय का जानकार मानकर वे कुछ जवाब रिकॉर्ड कर रहे थे। मैंने इस सवाल को आज के जमाने में अप्रासंगिक कहा था और गैर जरूरी भी। लेकिन उसके चौबीस घंटे के भीतर अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से अब तक का सबसे अधिक शिक्षित-प्रशिक्षित मुख्यमंत्री जादू-टोने को स्थापित करने में लगा था!!
इस कांगे्रस पार्टी के आज तक के सबसे बड़े नेता जवाहरलाल नेहरू को यूं तो पूरी पार्टी ने ही ताक पर धर दिया है। अपना आनंद भवन अब राष्टï्र को कोई नहीं देता, राष्टï्रीय भवनों में स्थायी आनंद मनाना ही कांगे्रस की संस्कृति हो गई है। रूढिय़ों से लदे इस देश में नेहरू ने जो वैज्ञानिक सोच विकसित करने की बात कही थी उसे जोगी और उन जैसे बहुत से और कांगे्रसी नेताओं ने पूरी तरह घूरे पर डाल दिया है अवांछित बच्चे की तरह? जोगी के राजनीतिक गुरू अर्जुन सिंह तो अपने गुरू और अपने पूजा-पाठ को निजी आस्था के दायरे में रखते आए लेकिन जोगी ने भीड़ के बीच एक सनसनी की तरह अपने इस निजी अंधविश्वास को घातक अंदाज में पेश किया।
मेरा ख्याल है कि सार्वजनिक जिम्मेदारियों वाले लोगों को यह ध्यान करना चाहिए कि उनकी बातों का क्या असर होगा? कल जब गुरू घासीदास जयंती के कार्यक्रम में जोगी अपनी सड़क दुर्घटना के पीछे षडय़ंत्र पूर्वक जादू-टोना करवाने की बात कही तो उन्होंने अपने अनगिनत विरोधियों पर एक गंभीर तोहमत भी लगाई और छत्तीसगढ़ में अंधविश्वास भी फैलाया। ये बात भी आज की राजनीति की और अनगिनत महीन बातों की तरह आई गई हो जाएगी, न कोई इसके आलोचना करेगा, न दूसरे लोग इससे परहेज करेंगे, इतना जरूर होगा कि जिन तबको की जो महिलाएं टोनही करार देकर मारी जाती हैं, उनको मारने वाले हाथों में अब एक नया हथियार होगा जोगी का दिया हुआ।
जादू-टोने पर आस्था के खिलाफ देश में कुछ कानून हैं। मेरा ख्याल है कि नेता या कोई और ऐसे बयान न दें इसके लिए कानूनी विचार विमर्श भी होना चाहिए। इसी छत्तीसगढ़ में डॉ. दिनेश मिश्र जैसा एक नौजवान लगातार अंधश्रद्घा के खिलाफ अभियान चला रहा है। जोगी की कही बात को लेकर अभी मैं फोन पर कानून के एक जानकार से बात कर रहा था तो उनका कहना था कि जोगी लंबे समय से कानून बनाने वाली संस्था संसद में रहे हैं जिसने जादू-टोने को स्थापित करने उस नाम पर किसी को प्रताडि़त के खिलाफ कानून बनाया है। ऐसे में अपनी सड़क दुर्घटना को किसी के षडय़ंत्रपूर्वक जादू-टोने का नतीजा बताना, संसंद की भावना के खिलाफ भी जाता है। इस संवैधानिक संस्था की सोच और उसके एक सदस्य की सोच में एक विरोधाभास दिखता है, जिससे संसद का अहित हो न हो, छत्तीसगढ़ की अनगिनत महिलाओं का अहित इससे जरूर होगा।
-सुनील कुमार

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