पिरामिड में ऊपर के लोग



'इतवारी अखबारÓ को पसंद करने वालों को लगता है कि इसकी छपाई में रंगीन पन्ने बढ़ें और कागज कुछ महंगा इस्तेमाल हो और आकार कुछ बढ़े। सुझााव देने वालों का कहना है कि इस पत्रिका के लिए वे अधिक दाम देने तैयार हैं। इसे देखकर देश के कई जगहों से पाठकों ने बंद हो चुकीं कुछ पत्रिकाओं का जिक्र किया कि इससे फलां पत्रिका की कमी दूर हुई या फलां पत्रिका याद आने लगी। महान पत्रिकाओं से तुलना में उनकी उदारता अधिक होगी, सच्चाई कम, इसलिए हम उनके नामों का जिक्र नहीं करना चाहते। लेकिन सस्ते के बारे में कहना चाहते हैं।
भारत में ग्राहकों का तबका एक पिरामिड के आकार का है। आसमान की ओर नोंक किए हुए त्रिभुज की कल्पना करें। सबसे सम्पन्न तबका नोंक सा छोटा सा उसके करीब का है। फिर जैसे-जैसे कमाई कम की जाए, आबादी तेजी से बढ़ती है। पिरामिड का नीचे का खासा बड़ा हिस्सा गरीबी की रेखा के नीचे वाले लोगों का है।
जब भी बाजार में कोई सामान आता है या सुविधा शुरू होती है तो उसके इस्तेमाल की ताकत रखने वाले तबके के बीच नीते उससे कई गुना अधिक बड़ा ऐसा तबका होता है जो उस खर्च को नहीं उठा पाता। दाम थोड़ा सा कम होता तो ग्राहक एकदम बढ़ जाते। मोबाइल फोन सेवाओं को देखें तो उन्होंने रेट गिराकर ग्राहक बटोरे। अब एक बार जब ग्राहक बढ़ गए तो कंपनी उसी लागत में अधिक कमाई करने लगी। खर्च थोड़ा सा बढ़ा, कमाई कदम से।
किताबों और पत्रिकाओं का भी यही हाल हे। दाम थोड़े अधिक रहे तो ग्राहक एकदम कम हो जाते हैं। आज साहित्य और बाकी किस्म की किताबों को खरीदने वाले गिने-चुने रह गए हैं। अखबारी कागज में बिना कड़े जिल्द के जो किताब बीस रुपए में तैयार होकर साठ रुपए में बिक सकती थी, लेखक, प्रकाशक और बेचने वाला दस-दस रुपए से अधिक कमा सकते थे, वह किताब चालीस रुपए में तैयार करके तीन सौ रुपए में बेची जाती है। पाठक से हर हफ्ते सोने का एक अंडा लेने के बजाय किताबों के धंधेबाज मुर्गी का पेट चीर दे रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि एक हिन्दी उपन्यास को साठ रुपए में खरीदने वाले देश में एक लाख लोग निकलते, जो तीन सौ रुपयों में तीन हजार ही रह गए।
किसी किताब का सौ बरस जिंदा रहने जैसा मजबूत होना जरूरी नहीं है, उसका अधिक लोगों तक पहुंच पाना महत्वपूर्ण है। मजबूती, उत्कृष्टïता, टिकाऊपन चूंकि महंगे दाम के साथ आते हैं, इसलिए ग्राहकों से उसे दूर भी ले जाते हैं। दो ग्राहकों से अधिक दाम मिले, दो सौ संभावित ग्राहक उनकी गरीबी के कारण दूर धकेल दिए गए। इसी सिलसिले का नतीजा है कि गरीबों ने किताबों को देखना भी बंद कर दिया, उन्होंने समझ लिया कि ये उनके बस के बाहर की चीज हैं।
इसका एक नुकसान यह भी मेरे हिसाब से हुआ है कि जिन लेखकों की किताबों के पाठक धीरे-धीरे करके एक आय वर्ग से ऊपर के लोग ही रह गए, उन लेखकों की सोच में भी फर्क आया। अपने ग्राहक तबके का ख्याल रखकर वह शायद उसके सरोकारों का ख्याल करके लिखने लगा। एक सवर्ण ग्राहक-पाठक तबके में बिकने वाली किताब का लेखक अपनी सोच को इस तबके के सरोकारों से कब तक अछूता रख पाएगा। शायद यही वजह है कि दलित साहित्य के लेखक भी अलग हो गए और प्रकाशक भी। और दलित साहित्य के बिकने का नेटवर्क भी अलग ही है।
हिन्दी या मराठी का बाकी साहित्य जो गैर दलित तबका लिखता है या खरीदता है या पढ़ता है वह बिल्कुल अलग है। शायद इसीलिए दलित साहित्यकार बीच-बीच में यह आक्रामक मांग भी रखते हैं कि गैर दलित लेखक दलित मुद्दों पर न लिखें। यह कुछ उसी तरह की मांग है जिस तरह कांशीराम अपनी चुनावी सभाओं में एक वक्त कहा करते थे कि बाम्हन-बनिया उनकी सभा छोड़कर चले जाएं। उन्हें लगता था कि इन तबकों के हित इतने अलग हैं कि वो कभी बसपा के मुद्दों को समझ ही नहीं पाएंगे। कुछ ऐसा ही दलित साहित्यकारों का सोचना था कि गैर दलितों ने दलित जिंदगी की तकलीफ देखी नहीं है वे क्या खाकर इन मुद्दों पर लिखेंगे। मैं यहां पर अभी बसपा या दलित साहित्यकारों की सोच के बारे में नहीं लिख रहा क्योंकि उससे किताबों का मुद्दा धरे रह जाएगा। मैं यहां एक प्रसंग के रूप में इसका जिक्र कर रहा हूं ताकि किताबों के आज के मुख्य खरीददार और उनका सामाजिक परिवेश, उनकी सोच देखते हुए उनकी खरीदी किताबों के लेखकों के हित पर भी एक नजर डाली जाए।
लेकिन यह खतरा भी उतना बड़ा नहीं है जितना बड़ा है पाठकों का कम होते चले जाना। हिंदी भाषी इलाकों में लाइबे्ररी भी कम ही दिखती हैं और महंगी किताबें खरीदने वाला बची जिंदगी उन पर सोकर उनकी रखवाली करते मरता है, उन्हें किसी को छूने नहीं देता। ऐसे में जनता की पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसी आती जा रही है जो सिवाय स्कूल-कॉलेज और कहीं साहित्य नहीं पढ़ पाती। और स्कूल-कॉलेज में पढ़ा हुआ भी परीक्षा के नजरिए से पढ़ा हुआ होता है जहां किसी बरस पे्रमचंद 'इंपार्टेन्टÓ नहीं रह जाते, किसी बरस निराला।
बढ़े-बूढ़े कहते थे कि मोटा खाओ, मोटा पहनो। मोटा अनाज सस्ता होता है और मोटा कपड़ा भी। वही सोच पढऩे के बारे में भी होनी चाहिए कि सस्ते, पेपर बैंक संस्करण खरीदें।
मुर्गियों की कई पीढिय़ों का पेट तो लेखक-प्रकाशक चीर चुके हैं, लेकिन नई पीढ़ी आती ही रहती है। उसका ख्याल करके किताबों, पत्रिकाएं सस्ती रखें ताकि पढऩे वाले बढ़ें।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें