होशियार गूगल और बेहोश सरकार



27 मई 2011

भारत पर गूगल का हमला सड़कों तक पहुंच गया है। गूगल अर्थ के नाम से आने वाले इस इंटरनेट नक्शे में सड़कों पर की गई शूटिंग को डाला जाता है और दुनिया के कई देशों में गूगल की इस हरकत का विरोध भी हुआ है। भारत चूंकि बहुत सी गोरी चीजों पर फिदा रहता है इसलिए अमरीकी गूगल उसे गुदगुदा रहा है और भारत में इस बात पर सोच-विचार भी नहीं किया गया कि इसके खतरे क्या-क्या हैं। जब गूगल यह कहता है कि उसके बनाए हुए ऐसे नक्शों से सुरक्षा एजेंसियों को सुविधा मिलेगी तो यह बात भी जाहिर है कि इससे अपराधियों को भी सुविधा मिले। दुनिया में जितने तरह के हथियार, औजार या दूसरे उपकरण सुरक्षा एजेंसियों के लिए बनते हैं, उन सबका फायदा अपराधियों को भी होता है। गूगल के रिक्शे घूम-घूमकर कैमरों से भारत के शहरों में शूटिंग करेंगे और उन्हें इंटरनेट पर डाला जाएगा। इससे क्या फायदा होगा यह तो हमें नहीं मालूम लेकिन भारत जिस तरह के आतंकी निशाने पर जी रहा है, उसे नुकसान तो कई तरह का हो ही सकता है। दुनिया के दूसरे देशों में अगर ऐसी किसी टेक्नालॉजी से सार्वजनिक जानकारी को और अधिक सार्वजनिक किया जाता है तो वहां पर इससे होने वाले खतरों से निपटने के लिए तैयारी भी रहती है। भारत की सुरक्षा तैयारियों के बारे में हमें गहरा शक है और यह वह देश है जहां पर मुंबई हमले के वक्त दिल्ली से कमांडो कई घंटे देर से निकल पाए क्यों उनके लिए विमान का इंतजाम नहीं हो पाया और फिर उस वक्त के मॉडलिंग के शौकीन केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल यह तय नहीं कर पाए कि वे कौन से कपड़े पहनकर इन कमांडो के साथ जाएं।
आज उपग्रह से लोगों के घरों में झांक लेने की टेक्नालॉजी की बात अलग है जिसके चलते भारत के राष्ट्रपति भवन के भीतर की जानकारी भी गूगल दिखा देता है। लेकिन जब भारत की जमीन पर कोई काम होता है तो भारत सरकार को इतनी जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए कि वह उसमें अपना नफा-नुकसान भी देखे और उससे अगर कोई खतरे खड़े होने जा रहे हैं तो उसे भी देखे। टेक्नालॉजी के कारोबारी तो ऐसे होते हैं जो किसी की खुफिया कैमरे से खींची गई निजी तस्वीर को भी इंटरनेट पर दिखाने के लिए हजारों किस्म की मुफ्त की वेबसाईटें पेश करते हैं ताकि उनके साथ ईश्तहारों को जोड़कर कमाई कर सकें। लेकिन ऐसे गूगल की बाजारू नीयत का अंदाज अगर भारत की सरकार नहीं लगाती है तो वह एक चूक कर रही है। हमारा मानना है कि इस देश में नागरिकों की निजता के हक के हिमायती लोगों को ऐसे मौकों पर सामने आकर विरोध करना चाहिए और हम एक बार फिर अपनी एक पसंदीदा नसीहत देना चाहेंगे कि लोगों को इसके खिलाफ अदालत भी जाना चाहिए क्योंकि सरकार सावधानी बरतने को तैयार नहीं है।
सार्वजनिक जगहों पर भी चलने वाले लोगों के अपने निजी जीवन के अधिकार होते हैं। कहने को गूगल यह कह रहा है कि वह इंटरनेट पर ऐसी तस्वीरों को डालने के पहले लोगों के चेहरों को धुंधला कर देगा। लेकिन ये ताजा-ताजा मिसाल है कि दुनिया के सबसे विकसित देश अमरीका की सबसे सुरक्षित जानकारियां किस तरह से विकीलीक्स ने बाजार में लाकर खड़ी कर दीं इसलिए गूगल का गोपनीयता का दावा किसी काम का नहीं है क्योंकि आज के डिजिटल जमाने में कोई भी चीज गोपनीय होने की गारंटी नहीं हो सकती और जब तक सार्वजनिक जीवन या दूसरे लोगों के व्यक्तिगत जीवन की बात है उसे लेकर गूगल हो या टेक्नालॉजी का कोई दूसरा ईश्वर हो उसे कैसे ऐसी किसी जगह की ऐसी रिकॉर्डिंग करने दी जा सकती है जिसे कल कोई दूसरा विकीलीक्स गूगल के रिकॉर्ड से चुराकर मनचाहा इस्तेमाल करे। किसी पर्यटक द्वारा कहीं पर खींची गई तस्वीरों का एक अलग दर्जा होता है लेकिन जब बाजार के कारोबारी ऐसा काम करते हैं तो उनकी नीयत के बारे में भारत सरकार को एक मासूम बच्चे की तरह भरोसा नहीं करना चाहिए। हमारा यह भी मानना है कि जिस राज्य में जाकर गूगल ऐसा करना चाह रहा है उस राज्य की सरकार को भी इस पर रोक लगानी चाहिए, क्योंकि राज्य की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिरकार उसी राज्य के सिर पर आती है। भारत में निजी जीवन की निजता के सम्मान की समझ अभी लोगों में कम है क्योंकि जहां नून-तेल-लकड़ी की दिक्कतें जारी हों, जहां देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आए दिन किसी न किसी कतार में खड़े रहकर अपना वक्त बर्बाद करने को बेबस हो वहां पर निजी जीवन के अधिकार जैसी बातें बेमायने लगती हैं। लेकिन अब जो रिकॉर्डिंग इस देश में शुरू हो रही है वह तो हमेशा के लिए कम्प्यूटरों में दर्ज होने वाली है और उसके खतरे जाने बिना उसकी इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।

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